कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंशम्बरवल्ली
(२४९)
मुबन्धनस
जुज मिहर तुम्हारी कहीं आराम न होवे । इस द्वार फना नेक सरन्जाम न होवे ॥ तदबीर व तकदीरसे कुछ काम न होवे । जिस जायमें इकता वह गुलन्दाम न होवे ॥ दोजख है सरापा जहाँ सत्तनाम न होवे ॥ १ ॥ जब किशबरे हस्तीसे चले हन्स अदमको । किस शान व शौकतसे लिये शब्द अलमको ॥ तब ब्रह्म विचारा फिर जा चूम कदमको । बाजारमें आकरके जो पहचान सनमको ॥ फिर आशिके सौदा यह कभीखाम न होवे ॥ दोजख है सरापा जहाँ सत्तनाम न होवे ॥ २ ॥ बहदत है तुझे और नहीं कोई है सानी । सब ओर भ्रम लअवत इस देर दुखानी । गह खुशक गहे सञ्ज गहे सुबक गिरानी । वे वर्गसमर बाम चले बाद खिजानी ॥ पुर खार वह गुल्शन जहाँ गुल्फाम न होवे ॥ दोजख है सरापा जहाँ सत्तनाम न होवे ॥ ३ ॥
गलतान सदहा बिसमिले नखचीरमें देखे । सुरगां बकफस जेरके जंजीरमें देखे ॥ जर्ब व जखम व कारी इस तीरमें देखे । तासीर अजब जालिमें रहगीरमें देखे ॥ वह राह था मुझको जहाँ दाम न होवे ॥ दोजख है सरापा जहाँ सत्तनाम न होवे ॥ ४ ॥
ऐ मेरे खिजर हाथ पकड़ आन हमारा । जुज तेरे करम फजल नहीं हमको सहारा ॥ है तेरी पनह आजिजे मिसकी विचारा । दिन गुजर गया यों है न कुछ काम सिधारा ॥ रुख अपना दिखा जल्दतर शाम न होवे ॥ दोजख है सरापा जहाँ सत्तनाम न होवे ॥ ५ ॥
अव नसियां करम तेरे असर है कि नहीं । सदफे बाहर तेरे कोई गोहर है कि नहीं ॥ बागबां बागमें उल्फत का शजर है कि नहीं । कोई नखले मुहब्बतमें समर है कि नहीं ॥ मन मिस की तरफ तेरी नजर है कि नहीं ॥ १ ॥