कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
शम्बरवल्ली
(२४९)
मुबन्धनस
जुज मिहर तुम्हारी कहीं आराम न होवे । इस द्वार फना नेक सरन्जाम न होवे ॥ तदबीर व तकदीरसे कुछ काम न होवे । जिस जायमें इकता वह गुलन्दाम न होवे ॥ दोजख है सरापा जहाँ सत्तनाम न होवे ॥ १ ॥ जब किशबरे हस्तीसे चले हन्स अदमको । किस शान व शौकतसे लिये शब्द अलमको ॥ तब ब्रह्म विचारा फिर जा चूम कदमको । बाजारमें आकरके जो पहचान सनमको ॥ फिर आशिके सौदा यह कभीखाम न होवे ॥ दोजख है सरापा जहाँ सत्तनाम न होवे ॥ २ ॥ बहदत है तुझे और नहीं कोई है सानी । सब ओर भ्रम लअवत इस देर दुखानी । गह खुशक गहे सञ्ज गहे सुबक गिरानी । वे वर्गसमर बाम चले बाद खिजानी ॥ पुर खार वह गुल्शन जहाँ गुल्फाम न होवे ॥ दोजख है सरापा जहाँ सत्तनाम न होवे ॥ ३ ॥
गलतान सदहा बिसमिले नखचीरमें देखे । सुरगां बकफस जेरके जंजीरमें देखे ॥ जर्ब व जखम व कारी इस तीरमें देखे । तासीर अजब जालिमें रहगीरमें देखे ॥ वह राह था मुझको जहाँ दाम न होवे ॥ दोजख है सरापा जहाँ सत्तनाम न होवे ॥ ४ ॥
ऐ मेरे खिजर हाथ पकड़ आन हमारा । जुज तेरे करम फजल नहीं हमको सहारा ॥ है तेरी पनह आजिजे मिसकी विचारा । दिन गुजर गया यों है न कुछ काम सिधारा ॥ रुख अपना दिखा जल्दतर शाम न होवे ॥ दोजख है सरापा जहाँ सत्तनाम न होवे ॥ ५ ॥
अव नसियां करम तेरे असर है कि नहीं । सदफे बाहर तेरे कोई गोहर है कि नहीं ॥ बागबां बागमें उल्फत का शजर है कि नहीं । कोई नखले मुहब्बतमें समर है कि नहीं ॥ मन मिस की तरफ तेरी नजर है कि नहीं ॥ १ ॥
( २५० )
कवीरपंथी—
टूँढे मुल्क आदम और जिन्नो परी । तुझ बिन नहीं चैन सद आफत भरी ॥ शबे फुरकत न कटी हाय कटी उग्र मेरी । बस्लकी रात की हयहात न तू बातकरी ॥ इस शबे हिजका आखिर को तो सेहू है कि नहीं ॥ २ ॥
गौवास जो सद गीतः लगातेही सुआ । मुहरा हाथ लगा और न कुछ काम हुआ ॥ जब बहर करम लुत्फ तेरा मौजमें आया । बैठेही साहिल पर न सो नअम इनआम दिया ॥ दिल दरियामें तेरे कोई लहर है कि नहीं ॥ ३ ॥
ऐबरुत बरुखाव होवे बेदार कभी । मुझगहगारको हो यार की दीदार कभी ऐ परदःनशी राज कर अफशार कभी निगह नेक होवे सोई गिरफ्तार कभी ॥ इस बन्देपर अगली सी मिहर है कि नहीं ॥ ४ ॥
दरपेशा सफर मुझको वफाकेश जता । शाफी मेरे हामी मेरे कर इल्म अता ॥ मुजरिम हूँ तेरा गरक गुनहगार खता । ऐ चश्मए फैज व रहमत मुझको बता ॥ आजिजका तेरी राहमें गुजर है कि नहीं ॥ ५ ॥
तरकीबबन्द ।
जबान मेरी बयान नुत्क असरदे । बदीद जाहिर व वातिन बसर दे ॥ न भूलूँ एक पल तुझ रह तेरी याद । शबो रोज हर शमो सहरदे ॥ जो नेमत दो जहां सो सब खदफ कर दिल सदफ नाम गोहरदे ॥ न सदीं दिनबदिन गर्मी तरकी। मुहब्बत मुर्शिदे अब्दुल देहदे ॥ खुदीको भूलकर बाखुद हूँ सरमस्त । शराबे इश्कका अपने खुमरदे । न जाहिर जिलवः दिखलाता परीह । उठाता इश्क आतश बोल परदे ॥ रुख खुर छिप रहा है अब कन्दर । खुश आँ वकतेके बुरकःदौर दिहरदे । न मुझसा
शब्दावली
(२५१)
और नालायक व नादार। तु सब लायक है खाली पूर करदे ॥ हमारे बद अमल पर मत नजर कर। सरन और नाम अपनेका अजरदे ॥ बहुत दिनका सगे दर हूँ मैं तेरा। न दुर दुर कर न दुर कर पेट भरदे ॥ ना जाऊँ दर बदर इक दरे उम्मीद। बचाले जान और जिवदान बरदे। मिहरकी बहर तू बेहद न पायान। मिहर कीजे मिहर कीजे अपनी लहरदे ॥ सगे दरको फिरा हरगिज न दर दर। मिहर कीजे मिहर कीजे मिहरकर॥१॥
तुही कुनसे किया कूनों मकाँको। तुही बरपा किया सब जिस्म व जाँको ॥ तुही सतपुर्ण ज्ञानी नाम तेरा। तुही बतला दिया नामे निशाँको ॥ किया तुहीने मलकुल मौत पैदा। तुही भेजा है सुरशिव मिहवाँको ॥ कहरेके वास्ते कर काल ज्वार। मिहर कर फिर किया अमनो अमाँको ॥ बनजमे इस जहाँ निर- गुन बनाना। किया पैदा हरी हर वेदरुवाँको। किय मकबूल और मकरुह व मरदूद। तुही खूबी दिया जन्नत जनाँको ॥ तेरे सब नाम हैं आराम बरुशें। वले सब वरुफ सतनाम सुबहाँको ॥ तेरे औसाफ लायक न मलायक। है क्या इमकान इन्साँकी जबाँको ॥ न जाना भेद कुछ हम्दे सरायां। बयों किस तौर कीजे लाबयाँको ॥ तुही बेमिस्ल साहब सबका सरदार। तुही बरुशे अद् और दोस्ताँको ॥ अलख तुही है कोई लख न पाया। ना जाने भेद तुझ राजे निहाँको ॥ तुही सब कुछ किया है सबमें मौजूद। तुही देता है हरकस हर जमाँको ॥ बहर खानो बहर शानो बहरशे। तुही था और तुही होगा तुही है ॥ २ ॥
हजारों पीर गैगाँबर बनाये। जुदा सब मजहबो मिह्वत चलाये ॥ नहीं वह नूर सद मासूर तारे। मिहर तुझ रुख मिहर दैजूर जाये ॥ नहीं लमअ सौसद शमअ शविस्तां। कि बरकत
(२५२)
कबीरपंथी—
तेरी दिन मशअल जलाये । शरीअत शाखकर शारी मुखालिफ नजाते राह इन्साँकों बताये ॥ नबी पीरों फकीरों कैल फरजन्द। सभी औतार धर अछह जताये ॥ सभोंमें बरतरी हैं राम और कृष्ण । निरंजन राय खुद धर देह आये ॥ जिते मजहब हैं इस आलममें जारी । न राहे रुस्तगारी कोई दिखाये ॥ नहीं मज- हब सो सारे कालके जाल । किया मंसूख इक दूजा चलाये ॥ किया सुरगाने जेरक दर कफस बन्द । जो दानांकी तरपा दिल को झुकाये ॥ फँसे उसदाममें आराम जानाँ । जपे सब रामनहि सतनाम पाये पड़ीं सब गाय दरकाबू कसाई । जिधर जावें उधर छूरी उठाये ॥ किया तब रहम तू शुशैद हकीकी । जो साहब था सो सत सुकृत कहाये ॥ करे सब जीवके दुख दन्द तू दूर । तेरा है नाम बन्दी छोर मशहूर ॥ ३ ॥
तेरे मस्तोंकी मस्तीको न जाना । हुआ मदहोश बे खुद और दीवाना ॥ अनलहक भी न पहुँचे अपने हकको । हुआ था यह अनलहकका बहाना ॥ कोई नागा कोई भागा बियाबाँ । कोई अन्दर जमीके जा छिपाना ॥ कोई गावे बजावे तान तोडे । नकल भांडोंकी सबने अकू ठाना ॥ हुए बेगानः सब अपने अमलसे । न पहचाने कोई अपनायगाना ॥ तेरे प्यालेसे इक कतरा जो पीया लिया सो जान मुर्दोंका जिलाना ॥ नहीं भगवा तिलक कन्ठी न माला । निराला भेष धर तुझमें समाना ॥ हुआ जब अरुल से वह वरुल अपने । हुआ तब कतरये दरिया जमाना ॥ तेरी बेमिस्ल सागर मुश्कबूसे । रहे क्या अकू आदमके ठिगाना ॥ मुअत्तर मगज-उसबूसे हुआ जब । तो दानाईको खो बैठे हैं दाना ॥ हुए बेखुद खुदीको खोय बैठे । अब तक तीर पहुँचा बरनिशाना ॥
शब्दावली
(२५३)
किते पर पा किये परवाज बाला । जमींपर फिर फिर उनको है आना ॥ ४ ॥
पिला पुर प्याला कर ऐ मेरे साकी । रहेगा नाम बन्दी छोर बाकी ॥ यह चक्की चल रही गरदून गरदाँ । जो खायो पीसकर सब नेक मुर्दा ॥ बले जाते हैं पीरोपीर दामाँ । हकीकत क्या वहाँ फरऊन धामाँ चर्खे चक्की है और सब जीव दाना । मियाँन मेख मुर्शिद मिहरबानाँ ॥ मियामे मेख मुर्शिदके कदमाँ लग । अलग बच जायगा मत हो हिरासाँ ॥ जिधर जावे उधर धर पीस डाले । जमीन और आसमाँ घर बन बियाबाँ ॥ पिये ब्रह्मा हरी हर कृष्ण राघो । पिये नौनाथ और जाहिद बुजुरगाँ ॥ बचे कोई न कर सदहा जो तदबीर । बचौपानी बनाया मेश गुरगाँ ॥ किया कब्जेमें सबके जिस्म व जाँ को । पड़ा पीछे कवी यह नफ़श शैताँ ॥ यह सब खिलकत खोरिश जमकी रोजीनः ॥ मलायक क्या परी और जिन्नोइन्साँ ॥ यह बैठा अकृपर सबके दिल भूत । जिधर चाहे उधर करदे परीशों ॥ जिधर यह भाग जावे आदमीजाद । चमकती सैफ हर जानिब नुमायाँ ॥ बले दन्दान जेरीं कालके सब । यह मुश्किल तुझ सिवा होवे न आसाँ ॥ वहाँ कैल मकाँ आजिजमुकीमाँ । तुही गफ़फ़ूर और तुही रहीमाँ ॥ ५ ॥
॥ तरजीआ बन्द ॥
ऐके दर परदये शुक्र गुफ़्तार । जल्द वह जलवः कोजिये इजहार ॥ सुझे वह जाम भर पिला साकी । मस्त हूँ तेरे इश्कमें सरशार ॥ हर तरफ़ लौलियान लछामा । इस्तलात इनका है अजाबुन्नार ॥ जाहिदोंके जहदमें मिलादे खाक । आबिदोंके न दिलमें सबों करार ॥ ओट तेरी बचाव चोट उनके । मैं हूँ इन्तहा व दुश्मनाने बकन्नार ॥ मंजिले दूर तोशए राह नहीं । मैं पियादा
(२५४)
कबीरपंथी-
व वह हमरहान सवार ॥ दस्तगीरी कर ऐ खुजिस्तः हकीर । दूईका परदःअज मियान बरदार ॥ मैं फकीर और मेरा गनीम गनी । न मुकाबिल हो मुफलिसो जरबार ॥
कोई बाकी रहे न सबमें शोर । कहो सतगुरु कबीर बन्दीछोर ॥१॥ जिस्की जुल्फोंको देखकर लाला । दाग हसरतसे दिल हुआ काला ॥ सद गुलिस्ताँ निसार खाक कदम । बुलबुलें जिस लिये करे नाला ॥ दीद बरदीद है न दीद बदीद । माह पर आन कर पड़ा हाला ॥ तुही खालिक हुआ तुही मखलूक । तुही पैदा किया तुही पाला ॥ जब उठा पांच तीनका झंडा । सारे नामो निश्राँ मिटा डाला ॥ तुही जाहिर है और तुही बातिन । तुही जेरीन और तुही बाला ॥ कदम खाक तेरेकी बरकात । दुश्मने सद ब जेर पामाला ॥ सिर्फ तेरी मिहरसे यह जग जीव । वे गुमाँ लामकान ऊपर चाला ॥
कोई बाकी रहे न सरमें शोर । कहो सतगुरु कबीर बन्दीछोर ॥२॥ वे अदद आलमीन् परवर है । ओलिया अम्बियाय सरवर है ॥ बन्दः मुजरिमका जुर्म करदे मुआफ । तू रहीमो करीम बरतर है ॥ जंग मैदानमें हूँ पड़ा घायल न सनाम सैफ ढाल बकतर है ॥ मन मजह्म का तू है जर्गाह । दिले दिलगीरका तू दिलबर है ॥ मने मिसकीन से अपना रुख मत फेर । मुझ ले जाय तेराहि दर है ॥ अब किधर जाऊं छोड दामन को । तेरी साये कदम मेरा घर है कर जफा या वफा तुझे सब जेब । मुझे मनजूर जो तेरी सिर है ॥ हैं हुमायूँ नसीब सो जिनके । मूनिसे महे मुदाम दरबर है ॥ कोई बाकी रहे न सरमें शोर । कहो सतगुरु कबीर बन्दी छोर ॥३॥
देख उस रंग रूप रोगनको । तब लिया जान बाजी गर फनको ॥ शरर अफसाने दीदः हों ताजः । देख जब अपने
शब्दावली
(२५५)
रश्क गुल्शनको ॥ गममें गिरियां खबर न उरियानी । प्यार तिनको न रहे इस तनको ॥ दिल चपल चुलबुला हुआ साकिन । मार कर मुर्दा कर दिया मनको ॥ खसो खासाकसे जब हुआ पाक । पार आ बैठे मार आसनको ॥ तुझसा कादर व मुझसा बे मकदूर । संग पारस मिला जो आहनको ॥ यह गलत मसलए आह और कहो । जिनको पहनाव खास जौशनको ॥ जरूम सब भर व इक नजर न हजर । पारचा पाट टाट सोजनको ॥ कोई बाकी रहे न सरमें शोर । कहो सतगुरु कबीर बन्दी छोर ॥४॥
दे बसा आन गैबका घेरा । जल्द कर मेरे कूचेमें फेरा ॥ जाल खंजर न छोड़ बिस्मिलको । ऐ दिलराम काम कर मेरा ॥ कारपरदाज तू गरीब निवाज । खानये दिल मेरे करो देरा ॥ हूय खुरशेदकी झलक झिलमिल । नूर हों पूर दूर अंधेरा ॥ भागजा जहां पड़े व पा जंजीर । सब जवानिब है कालका घेरा ॥ रुबाब गफलत्से कर कर दिया बेदार । बेहद अहसान बन्दः पर तेरा ॥ बिन तेरे कौन कब जग जीव । तूही साहब है और सब चितेरा ॥ हाथ थर कर जिसे उठाया तू ॥ बेगुमाँ उसका पारहो बेरा ॥
कोई बाकी रहे न सरमें शोर । कहो सतगुरु कबीरबन्दी छोर ॥६॥
बरुश तू दयाल मुझको किन्लेगाह । रोजो शब तूही तू है शाम पगाह ॥ कीजै सुहरम व दीजै अकल हिलाल । रख मेरा जामः पाक जेर निगाह ॥ होत गाफिल न तुझसे लमह कोई । बरुशदे मुझको मेरे शाहन्शाह ॥ यह दगाबाज दिल ये सुरदारा । रख पनह खुद जे हीलये रोबाह ॥ ऐ मेरे जान ऐ जानाँ । मुन्तजिर जलवः तेरे दीदः बराह ॥ हूबहु तेरे हूँ मैं किस ढबसे । हूँ पशेमाँ फेलनामा स्याह । कोई बाकी रहा नहीं चारा । लैक
(२५६)
कबीरपंथी—
दम सर्द तोबः नालः व आह ॥ रू रहई रही न राह गुरेज । बन्दः नाचारः को है तेरी पनाह ॥ न राह गुरेज । बन्दः नाचारः को है तेरी पनाह ॥
कोई बाकी रहे न सरमें शोर । कहो सतगुरु कबीर बन्दी छोर ॥६॥
इस जहाँ का न काम बाकी । एक तेरा सत्य नाम बाकी है । कुल पानी जो दीदः मनजरमें । सार शब्द पयाम बाकी है ॥ हक तेरेसे अदा न कोई ऐ हक । हक तेरा लाकलाम बाकी है ॥ सब चले जायँगे रहे न कोई । इक तेराही कयाम बाकी है ॥ देता है तू जो खास खासोंको । शरबते नोश जाम बाकी है ॥ परदेसे पैरुवाँका रहबर है । जल्सए खासों आम बाकी है ॥ तेरी हमदो सना रहै कायम । जब तलक सुबह व शाम बाकी है ॥ होखुका जोर दूरका आजिज । अब तेरा यह तमाम बाकी है ॥ कोई बाकी रहे न सरमें शोर । कहो सतगुरु कबीर बन्दी छोर ॥७॥
तरजिआ बन्द ॥ २ ॥
न तुझ बिन कोई सीधी राह पाया । भटकते मरगया घरको न आया ॥ जो कुफ़रस्तानमें खुद खुद फँसाया । रहे पुरखार दौरों ने दिखाया ॥ पकड़ जमराजने उसको भुलाया । पड़े सुरगों सब सध्यादके फंद ॥ छुडाले बन्देको अज हस्तिये बन्द । खुदावन्दा खुदावन्दा खुदावन्द ॥१॥ कभी तुझ बिन न जिवका कुफ़रूटे यह फिर फिर जाय कर उसहीसे जूटे ॥ यह दानाईकी दौलत सारि लूटे । तमीज और अकू दानिश उसकी छूटे ॥ हुआ सरमस्त इसमें फिर न फूटे । मिलाया बागवान्ने उससे पैबन्द ॥ छुडाले बन्देको अज हस्तिये बन्द ॥ खुदावन्दा खुदा- वन्दा खुदावन्द ॥ २ ॥ पकड़ कर हाथ अपनी रह दिखादे । सफीना सीनः पर नाम लिखादे ॥ न भूलूं फिर सबक सुझको
शरवनाथ
चैत्र शुद्ध ५, संवत् १९८४ वि० की कबीरपंजी महासभा कौदरमालके कसियथ सत बहुरोश फोटो
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शब्दावली
(२५७)
सिखादे । किताबें अछकी ताको रखादे ॥ रहे बाकी न कोई सब उठादे । खयाले खाम अज दिल चन्द दर चन्द ॥ छुडाले बन्देको अज हस्तिये बन्द । खुदावन्दा खुदावन्दा खुदावन्द ॥३॥ बबजमें खुद परिस्तां कौन जावे वहांकी ला खबर हमको सुनावे ॥ गया जो फिर कभी कोई न आवे । जो आवे सो खबर पिछली भुलावे । न भूले तौ कभी इकता कहावे । मिहर तेरीसे पावें जीव आनन्द ॥ छुडाले बन्देको अब हस्तिये बन्द । खुदावन्दा खुदावन्दा खुदावन्द ॥४॥ इस आसी बन्दःको अपने करमसे बचाले पाँच और तीनों भरमसे ॥ गिरह दिल खोलकर महरम मरमसे । के रखलीजे पनह अपनी शरमसे ॥ अरज करता है आजिज दीदः नमसे । कदम बरकत तेरी हो फाल फरखुन्द ॥ छुडाले बन्देको अज हस्तिये बन्द । खुदावन्दा खुदावन्दा खुदावन्द ॥५॥२१॥
छन्द ।
अब सन्त सुरति सम्हाल देखो कन्त निज पहचानिये । अगम अबिचल अलख लखि निह अन्त वाको जानिये ॥ लखि वार पार है सोई साहब ज्ञान आँख जो तानिये । देख दो तीर कबीर जहाँ तहाँ दूसरो नहीं मानिये ॥ १ ॥ अविगत अलेख भौ लेख नहीं सो एक बन्दी छोर है । नर देह वाते नेह काजे भयो अब निसि भोर है ॥ जो नाम रत काल डरत है हरत सो जम जोर है । बड भाग अटल सुहाग उनको जिहि भरोसा तोर है ॥२॥ लोमस भुशुंडके झुंड ऋषिमुनि जासु गुन वर्णन करें । सनकादि नारद धनुक गुप्त सेवत चित् चरणन धरे ॥ ऋषभ आदि योगेश्वर जनक नृप सत पद चरणन परे । बहु कवीरपंथी शब्दावली ९
(२५८)
कवीरपंथी-
सिद्ध सो ऋषि गुरुड गोरख आय तुम शरणन तरे ॥३॥ कोटिन पयम्बर पीर गये भव तीर नाम कवीरते । केहि कहत बनत अगनित ऋषि भये अमर सत शरीरते ॥ धरमदासको प्रभु खास निजकर बिलग नीरो छीरते । सत्तनाम मिल निज धाम दीनो काम एक पद थीरते ॥४॥ विष बेलि फल संसार है यह झार विष जेहि तेहि भरा । विष अण्ड पिण्ड समस्त है विष वारिमय भव सागरा ॥ बिलगाय विषते कौन ऐसो भवन तीनमें नागरा । करि कोटियतन नज्ञान रतन है मिटे किमियहझा रा ॥५॥ जहाँ काम क्रोध और लोभ मोहते सकल पूरण पावई । सब रोम रोममें विष भरा है अमृत नाहि समावई ॥ जग विषम आग है लागि तुम बिनु ताहि कौन बुझावई । जीव कठिन काल कराल वशते बन्दीछोर छुडावई ॥६॥ स्तुति करें और आरति सब हंस मिलि सत लोकमें । सतपुरुष आय बचाय खुद जीव जरत यमकी झोंकमें ॥ न पाव कोइ उपाय साहब धाय धर जीव शोकमें । अरुझा सबहिं सरुझा न कोई जीव लोक वेद अथोकमें ॥७॥ सत्तलोक हंस विलोक आनंद बजत खनहद तूर है । प्रभु आरति अरु स्तुति करत सब सहज और अंकूर है । इच्छा सोहं अचित्त अक्षर शिरधरे पद धूर है । यक रोम जासु प्रकाश ऐसो कोटि चन्दा सूर है ॥ ८ ॥ यह तीन लोक सशोक देखिये आय आनन्द कन्द है । दशदिशि षसर यम जाल है सब जीव फन्द तेहि फन्द है । गुरु वैद्य साँचा वेदवाचा हर लियो दुख द्रन्द है । भव भीर हरण कवीर दासन दास परमानन्द है ॥ ९ ॥
कवित ।
पावन पतित जीव दीननके हितु प्रभु, तुही गुरु पुरुष कहायो
शब्दावली ।
( २५९ )
यँ और है । कहत कवीर धर्म धरत न धीर, करे अचल शरीर न लगत हीम जोर है ॥ पशु पंछी तारत है निगम पुकारत है, आरतको देखिके निहार रिग कोर है ॥ पीरो पयम्बर है धीरजो दिगम्बर हैं, वेद वेद वानीहू विरद बन्दीछोर है ॥ १ ॥ तजत न वानी सुर मुनिन बखानी प्रभु, शरणमें आनी जो करत निहोर है । तीन लोक दूँढ जाये दूसरे कई न पाये, लगसो चरण दुख हरण जो शोर है । नहीं शुभ करनी है बहु दुख भरनी है, उस गुरु शरणी है कलि काल घोर है । अधम उधारनको जगत सुधारनको, भक्ति सुक्ति धारण कवीर बन्दी छोर है ॥ २ ॥ बूढे बड़ ज्ञानी सिद्ध साधक जो ध्यानी, विन नाम सहिदानी जिन्हे आशा न तोर है । बलबीज चूसत है सिद्ध साधु दूसत है, निशि दिन मूसत है अन चीन्ह चोर है ॥ जीवको है ठौर नहीं सुरमुनि दौर नहीं, परमानन्द पौर नहीं पाव न जो दौड है । बन्दी छोर बन्दी छोर बन्दी छोर एक भजु, साहब कवीर टेक सोई बन्दी छोर है ॥ ३ ॥
सद्गुरुकी महिमा ।
—*—
गुरुको कीजै दण्डवत, कोटि कोटि प्रणाम । कीट न जाने भुंगको, वह ( गुरु ) करले आप समान ॥ १ ॥ जगत जनायो जिहि सकल, सो गुरु प्रगटे आय । जिन गुरु आंखिन देखिया, सो गुरु दिया लखाय ॥ २ ॥ भली भई जो गुरु मिला, नातर होती हानि । दीपक ज्योति पतंग ज्यों, पडत्यो पूरा जानि ॥ ३ ॥ भली भई जो गुरु मिला, जासो पाया ज्ञान । घटहि माहि चबूतरा, घटही माहि दिवान ॥ ४ ॥ कवीर गुरु गुरुआ मिला, रूल गया आटे लौन । जाति पांति कुल मिट गया, नाम धरेगा कौन ॥ ५ ॥
(२६०)
कवीरपंथी—
ज्ञान प्रकाशीं गुरु मिला, सो जन विसरि न जाय । जब गोविन्द कृपा करी, तब गुरु मिलिया आय ॥६॥ गुरु गोविन्द कर जानिये, रहिये शब्द समाय । मिलै तो दण्डवत बन्दगी, पल २ ध्यान लगाय ॥ ७ ॥ गुरु गोविन्द तो एक हैं, दूजा सब आकार । आपा मेटै हरि भजै, तब पावै करतार ॥८॥ गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागौ पाय । बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय ॥ ९ ॥ बलिहारी गुरु आपने, घड़ि घड़ि सौ सौ बार । मानुषसे देवता किया, करत न लागा बार ॥१०॥ बूडा था पर ऊबरा, गुरुकी लहरि चमक । वेरा देखा झांझरा, उतरि भया फरक ॥११॥ पहिले दाता शिष्य भये, तन मन अरप्यो शीझ । पाछे दाता गुरु भये, नाम दियो बखशीश ॥ १२ ॥ राम नामके पटतरे, देवे को कछु नाहिं । क्या लै गुरु संतोषिये, हवस रही मनमाहिं ॥ १३ ॥ निज मन तो नीचा किया, चरण कमलकी ठौर । कहैं कवीर गुरुदेव बिन, नजर न आवै और ॥ १४ ॥ मन दिया तिन सब दिया, मनके लार शरीर । अब देवेको कछु नहीं, यों कथि कहे कवीर ॥ १५ ॥ तन मन दिया तो भल किया, शिरका जासी भार । कबहुँ कहै कि मैं दिया, घनी सहैगा मार ॥१६॥ गुरु सिकलीगर कीजिये, मनहिं मस्कला देइ । मनका मैल छुडाइके, चित दर्पण करि लेइ ॥ १७ ॥ गुरु धोवी शिष कापडा, साबुन सिरजन हार । सुरति शिला पर धोइये, निकसै ज्योति अपार ॥ १८ ॥ गुरु कुलाल शिष्य कुम्भ हैं, गढ गढ काटै खोट । अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहे चोट ॥ १९ ॥ ज्ञान समागम प्रेम सुख, दया भक्ति विश्वास । गुरु सेवा ते पाइये, सतगुरु चरण निवास ॥ २० ॥ गुरु मानुष करि जानते, ते नर कहिये अन्ध । यहाँ दुखी संसारमें, आगे यमके बन्ध ॥ २१ ॥ गुरुको मानुष
शब्दावली
(२६१)
जानते, चरणामृत सो पानि । ते नर नरके जायँगे, जन्म जन्म हैँ शानि ॥ २२ ॥
कविरा ते नर अन्ध हैं, गुरु को कहते और । हरि रुठे गुरु ठौर है, गुरु रुठे नहिँ ठौर ॥ २३ ॥ गुरु हैं बड़े गोविन्द ते, मनमें देखु विचार । हरि सुमरै सो वार है, गुरु सुमरै सो पार ॥ २४ ॥ गुरु सीधी ते उत्तरे, शब्द बिहूना होय । ताको काल घसीटि हैं, राखि सकै नहिँ कोय ॥ २५ ॥ अहम अग्नि निशि दिन जरे, गुरु सो चाहे मान । ताको यम नेवता दियो, होहु हमार मेहमान ॥ २६ ॥ गुरु पारस गुरु परस है, चन्दन बास सुवास । सतगुरु पारस जीवको, दीना मुक्ति निवास ॥ २७ ॥ गुरु सो भेद जो लीजिये, शीश दीजिये दान । बहुतक भोंडू बहि गये, राखि जीव अभिमान ॥ २८ ॥ गुरु समान दाता नहीं, जाचक शिष्य समान । तीन लोककी सम्पदा, सो गुरु दीना दान ॥ २९ ॥ गुरु बतावे साधुको, साधु कहै गुरु पूज । अरस परसके खेलमें, भई अगमकी सूज ॥ ३० ॥ यम गरजे बल बाघके, कहै कवीर पुकार । गुरु कृपा ना होत जो, तौ यम खाता फार ॥ ३१ ॥ अवर्ण वरण अमूर्ति जो, कहौँ ताहि किन पेख । गुरु दयाते पावई, सुरति निरति करि देख ॥ ३२ ॥ यह धन जो गुरुकी अहै, भाग बड़े जिन पाय । कह कवीर टोटा नहीं, जब परे तबहि लखाय ॥ ३३ ॥ कह कवीर दरगाह सो, जेहि उत्तरी हैँ भार । सोइ करै गुरुआइया, झकि २ मरै गँवार ॥ ३४ ॥ पंडित पठि गुनि पचि मुये, गुरु बिन मिलै न ज्ञान । ज्ञान बिना नहि मुक्ति है, सत्य शब्द प्रमान ॥ ३५ ॥ मूल ध्यान गुरु रूप है, मूल पूजा गुरु पाव । मूलनाम गुरु बचन
१ पारसमें अह गुरुमें, बडो अंतरों जान । वह लोहा कंचन करे, यह करे आपु समान ।
(२६२)
कवीरपंथी—
हैं, सत्य मूल सत भाव ॥३६॥ नाम सजीवन देत गुरु, करिके दाय़ा जाहि । गुरु गोविंद बताव जिहि, मिलत गोविंद ताहि ॥३७॥ गुरु गुरु में भेद है, गुरु गुरु में भाव । गुरु सदा सो बन्दिये, शब्द बतावे दाव ॥ ३८ ॥ कहै कवीर तजि भ्रमको, नान्हा करिके पीव । तजि अहं गुरु चरण गहू, यमसो वांचे जीव ॥ ३९ ॥ कनफुका गुरु देहका, बेहदका गुरु और । बेहदका गुरु जब मिलै, लहै ठिकाना ठौर ॥ ४० ॥ तीन लोक नौ खण्डमें, गुरुते बड़ा न कोय । करता करै न करिसकै, गुरु करै सो होय ॥४१॥
गुरु शिष्य पारखका अंग ॥
गुरु मिला न शिष्य मिला, दोऊ खेलैं दाव । दोऊ बूढ़े बापुरे, चढ़ि पाथरके नाव ॥४२॥ जाका गुरु है आंधरा, चेला निपट निरन्ध । अन्धे अन्धा ठेलिया, दोऊ कूप परन्ध ॥४३॥ काका गुरु है आंधरा, चेला खरा निरंध । अन्धेको अन्धा मिला, परे कालके बन्ध ॥ ४४ ॥ जानता पूछी नहीं, पूछि किया नहि गौन । अन्धेको अन्धा मिला, राह बतावे कौन ॥ ४५ ॥ माई मूढ़ी तेहि गुरुकी, जाते भ्रम ना जाय । आप बूढ़ा मझधारमें, चेला दिया बहाय ॥ ४६ ॥ पूरा कवीर गुरु बिना, पूरा शिष्य न होय । गुरु लोभी शिष्य लालची, दूनी दाइन होय ॥ ४७ ॥ पूरा सतगुर ना मिला, रहा अधूरा सीख (शिष्य) । स्वांग यतीका पहिरकै, घर घर मांगै भीख ॥ ४८ ॥ पूरा सहजै गुण करै, गुण नहि आवै छेह । सायर पोषै सर भरे, डांड न मांगै मेह ॥४९॥ गुरु किया है देहका, सतगुरु चीन्हा नाहि । भवसागरके जालमें, फिरि फिरि गोता खाहि ॥ ५० ॥ गुरुवाते भय ना मिटै, आन्ति न जिवका जाय । गुरु तो ऐसा चाहिये, देवे ब्रह्म बताय ॥५१॥
१ आप बूढ़ा चहुँबंदमें, चेले दिया बहाय ।
शब्दावली
(२६३)
कवीर जानता ब्रह्मा नहीं, पैडा दिया बताय । चलते चलते तहँ गया, जहाँ निरंजन राय ॥ ५२ ॥ बंधेको बंधा मिलै, छुटै कौन उपाय । कर सेवा निर्बंधकी, पलमें लेत छुडाय ॥ ५३ ॥ गुरु सिकलीगर कीजिये, मनहि मसकला देह । मनके मैल छुडाइके, चित्त दर्पण करिलेह ॥ ५४ ॥ झूठे गुरुके पक्षको, तजत न कीजै बार । राह न पावै शब्दका, भटकै द्वारहि द्वार ॥ ५५ ॥ जाका गुरु गेही अहे, चेला गेही होय । कीच कीचके धोवते, दाग न छूटे कोय ॥ ५६ ॥ गुरु नाम है ज्ञानका, शिष्य सीखले सोह । ज्ञान मर्याद जाने बिना, गुरु शिष्य न कोह ॥ ५७ ॥ सिख तो ऐसा चाहिये, गुरुको सब कछु देह । गुरु तो ऐसा चाहिये, शिखसे कछु न लेह ॥ ५८ ॥ गुरु पूरा शिष्य सुरा, बागं मोर रन पैठ । सत सुकृतको चीन्हके, एक तरुत चढि बैठ ॥ ५९ ॥
॥ सतगुरुका अंग ॥
सतगुरु समान को सगा, साधु समान को दात । हरि समान को हीतु है, हरिजन सम को जात ॥ ६० ॥ सतगुरुको महिमा अनंत, अनंत किया उपकार । लोचन अनन्त उधारिया, अनन्त दिखावन हार ॥ ६१ ॥ सब जग भर्मा यों फिरै, ज्यों रामाका रोज । सतगुरु सो सुधि भयी, पाया हरिका खोज ॥ ६२ ॥ थापन पाईं थिति भई, सतगुरु दीना धीर । हीरा कवीर बनीजिया, मान सरोवर तीर ॥ ६३ ॥ थिति पाय मन थिर भयो, सतगुरु कीन्ह सहाय । और कथा मन ना रुचै, हिरदय रमिता राय ॥ ६४ ॥ चेतन चौकी बैठि करि, सतगुरु दीनी धीर । निर्भय है निःशंक भजु, केवल कहैं कवीर ॥ ६५ ॥ बहे बहाये जात थे, लोक वेदके साथ । पैडामें सतगुरु मिले, दीपक दीन्हा हाथ ॥ ६६ ॥ दीपक दीन्हा तेल भरी, बाती दर्ई अघह । पूरा किया बिसाहिना, बहुरि
(२६४)
कवीरपंथी-
न आवै हह ॥ ६७ ॥ चौपड माडी चौहटे, सारी किया शरीर । सतगुरु दाव बताइया, खेलै दास कवीर ॥ ६८ ॥ सतगुरु हमसुँ रीझिके, एक कहा परसंग । बरषा बादल प्रेमका, भीजि गया सब अंग ॥ ६९ ॥ सतगुरुके उपदेशका, सुनिया एक विचार । जो सतगुरु मिलता नहीं, जाता यमके द्वार ॥ ७० ॥ यमद्वारे पर दूत सब, करते खींचा तानि । तिनते कबहुँ न छूटता, फिरता चारों खानि ॥ ७१ ॥ चारों खानिमैं भ्रमता, कबहुँ न लहता पार । सो तो फेरा मिटि गया, सतगुरुका उपकार ॥ ७२ ॥ सतगुरुके सिद्धके किया, दिल अपना कै सांच । कलियुग मोसे लडि पडा, मोहकिम मेरा बांच ॥ ७३ ॥ सतगुरु सांचा सूरमा, शब्द जो बाहा एक । लागतही भय मिटि गया, पडा कलेजे छेक ॥ ७४ ॥ सतगुरु शब्दका बाण ले, बाहन लागा तीर । एक जो बाहा प्रेम सुँ, भीतर विधा शरीर ॥ ७५ ॥ सतगुरु बाहा बाण भरी, धरकर सूधी मूठ । अंग उघाडे लागिया, गया धुवासुँ फूठ ॥ ७६ ॥ सतगुरु मारा बाण भरि, डोला नहीं शरीर । कह चुम्बक का करि सकै, सुख लागे वहि तीर ॥ ७७ ॥ लागी गांसी सुख भया, मरै न ज वै कोय । कह कवीरसो अमर भये, जीवत मृतक होय ॥ ७८ ॥ हंसि बोलै ना उन सुनी, चंचल मेला मार । कह कवीर अंतर विधौ, सतगुरुका हथियार ॥ ७९ ॥ गुँगा हूआ बावरा, बहिरा हूआ कान । पायनसे पंगुला हुआ, सतगुरु मारा बान ॥ ८० ॥ सतगुरु मेरा शूरमा, भेदा सकल शरीर । बाण दुवासुँ फूटिया, जीवै दास कवीर ॥ ८१ ॥ सतगुरु सांचा शूरमा, नख शिख मारा पूर । बाहर घाव न दीसई, भीतर चकना चूर ॥ ८२ ॥ सतगुरु मारा बाण भरि, टूटि गया सब जेव । कहुँ आदा कहुँ आपदा, तसवीः कहुँ कितेब ॥ ८३ ॥ सतगुरु मारा बाण भरि,
शब्दावली
(२६५)
शब्द सुरंगी बान । मेरा मारा फिर जिवै, हाथ न धहं कमान ॥ ८४ ॥ सतगुरु मारा बाण भारि, निरखि निरखि निज ठौर । राम अलखमें रमि रहा, चित्त न आवै और ॥ ८५ ॥ सतगुरु मारा प्रेमसुं, रही कटारो टूट । जैसी अनी न सालई, तैसी साजै मूट ॥ ८६ ॥ मान बडाई ऊरमी, यह जगका व्यवहार । दास गरीबी बन्दगी, सतगुरुका उपकार ॥ ८७ ॥ दिलहीमें दीदार है, बाद वहै संसार । सतगुरु शब्दका मसकला, सुझे दिखावनहार ॥ ८८ ॥ दीसै सो सब विनसि है, नाम धरे सो जाय । कहै कवीर सोइ सत्य है, सतगुरु दिया बताय ॥ ८९ ॥ कुदरत पाई खबर सों, सतगुरु दिया बताय । भँवर बिलम्बे कमलसे, अब कैसे उडिजाय ॥ ९० ॥ राम नाम छाई नहीं, सतगुरु सीख दिया । अविनाशीको परसिके, आतम अमर भया ॥ ९१ ॥ चौसठ दीवा जोयके, चौदह चन्दा माँहि । तेहि घर कैसा चाँदना, जेहि घर सतगुरु नाहि ॥ ९२ ॥ चित्त चोखा मन मसकला, बुधि उत्तम मति धीर । सो धोखा ना विरचई, सतगुरु मिलै कवीर ॥ ९३ ॥ कोटिक चन्दा ऊगवे, सूरज कोटि हजार । सतगुरु मेला बाहिरे, दीसत घोर अँधार ॥ ९४ ॥ सतगुरु मोहिं निवाजिया, दीना अम्बर बोल । शीतल छाया सुगम फल, हँसा करे कलोल ॥ ९५ ॥ सतगुरु सत्य कवीर है, संकट परा हजीर । हाथ जोड़ विनती कहूं, भवसागरके तीर ॥ ९६ ॥ चित्त चोखा दिल निर्मला, दयावन्त गंभीर । सो धोखा विच क्यों रहै, सतगुरु मिलै कवीर ॥ ९७ ॥ ज्ञान समागम प्रेम सुख, दया भक्ति विश्वास । सतगुरु मिलि एकै भया, रही न दूजी आस ॥ ९८ ॥ सतगुरु पारसके शिला, देखो सोच विचार । आई पडोसिन लै चली, दियो दिया सँवार ॥ ९९ ॥
१ कबीर सोइ तत्व गहो, सतगुरु दियो चैताय ।
(२६६)
कवीरपंथी—
जीव अधम अति कुटिल है, कहुँ नहीं पतिआय । ताका औगुन मेटिके, सतगुरु होत सहाय ॥ १०० ॥ सतगुरु बडा सराफ है, परखे खरा अरु खोट । भवसागर ते निकारिकै, राखै अपनी ओट ॥ १०१ ॥ सतगुरु शब्द जहाज है, कोइ कोइ पावै भेद । बुन्द ससुद एकै भया, किसका कहै निषेद ॥ १०२ ॥ सतगुरु महल बनाइया, ज्ञान गिलावा दीन । दूर दिखावन कारने, शब्द झरोखा कीन ॥ १०३ ॥ सतगुरु शब्द उलंघिके, जो कोई शिष जाय । जहां जाय तहाँ काल है, कहै कवीर समझाय ॥ १०४ ॥ सतगुरु बड़े जहाज हैं, जो कोइ बैठे आय । पार उतारै और को, आपना पारस लाय ॥ १०५ ॥ विन सतगुरु बांचे नहीं, फिर बूड़े भव मांहि । भव सागर के त्रासमें, सतगुरु पकड़े बांहि ॥ १०६ ॥ सतगुरु मिला तो क्या भया, जो मन पाडी भोल । पास कपड ठाके नहीं, क्या करे वपुरी चोल ॥ १०७ ॥ सब जग मुआ विषधर धरे, कहै कवीर विचार । जो सतगुरुको पाइया, सो जन उतरे पार ॥ १०८ ॥
विनु सतगुरु उपदेश, सुर नर मुनि नहिं निस्तरै । ब्रह्मा विष्णु महेश, और सकल जिव को गने ॥ १०९ ॥ कोटिन पटि गुनि पचि मुआ, योग यज्ञ तप लाय । विनु सतगुरु पावे नहीं, कोटिन करै उपाय ॥ ११० ॥ करहु छोड कुल लाज, जो सतगुरु उपदेश है । होय तवै जिव काज, निश्चय के प्रतीति कर ॥ १११ ॥ अक्षर आदि जगतमें, जाकर सब विस्तार । सतगुरु दया सो पाइये, सतनाम निज सार ॥ ११२ ॥ सतगुरु खोजो सन्त, जीव काज जो चाहहुँ । मेटो भवको अन्त, आवा-गवन निवारहुँ ॥ ११३ ॥ विनवै दोउ कर जोर, सतगुरु बन्दी छोर है । पावै नामकी डोर, जरा मरण भव काल मिटै ॥ ११४ ॥ सत नाम निज सोय, जो