भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(२६३)

कवीर जानता ब्रह्मा नहीं, पैडा दिया बताय । चलते चलते तहँ गया, जहाँ निरंजन राय ॥ ५२ ॥ बंधेको बंधा मिलै, छुटै कौन उपाय । कर सेवा निर्बंधकी, पलमें लेत छुडाय ॥ ५३ ॥ गुरु सिकलीगर कीजिये, मनहि मसकला देह । मनके मैल छुडाइके, चित्त दर्पण करिलेह ॥ ५४ ॥ झूठे गुरुके पक्षको, तजत न कीजै बार । राह न पावै शब्दका, भटकै द्वारहि द्वार ॥ ५५ ॥ जाका गुरु गेही अहे, चेला गेही होय । कीच कीचके धोवते, दाग न छूटे कोय ॥ ५६ ॥ गुरु नाम है ज्ञानका, शिष्य सीखले सोह । ज्ञान मर्याद जाने बिना, गुरु शिष्य न कोह ॥ ५७ ॥ सिख तो ऐसा चाहिये, गुरुको सब कछु देह । गुरु तो ऐसा चाहिये, शिखसे कछु न लेह ॥ ५८ ॥ गुरु पूरा शिष्य सुरा, बागं मोर रन पैठ । सत सुकृतको चीन्हके, एक तरुत चढि बैठ ॥ ५९ ॥

॥ सतगुरुका अंग ॥

सतगुरु समान को सगा, साधु समान को दात । हरि समान को हीतु है, हरिजन सम को जात ॥ ६० ॥ सतगुरुको महिमा अनंत, अनंत किया उपकार । लोचन अनन्त उधारिया, अनन्त दिखावन हार ॥ ६१ ॥ सब जग भर्मा यों फिरै, ज्यों रामाका रोज । सतगुरु सो सुधि भयी, पाया हरिका खोज ॥ ६२ ॥ थापन पाईं थिति भई, सतगुरु दीना धीर । हीरा कवीर बनीजिया, मान सरोवर तीर ॥ ६३ ॥ थिति पाय मन थिर भयो, सतगुरु कीन्ह सहाय । और कथा मन ना रुचै, हिरदय रमिता राय ॥ ६४ ॥ चेतन चौकी बैठि करि, सतगुरु दीनी धीर । निर्भय है निःशंक भजु, केवल कहैं कवीर ॥ ६५ ॥ बहे बहाये जात थे, लोक वेदके साथ । पैडामें सतगुरु मिले, दीपक दीन्हा हाथ ॥ ६६ ॥ दीपक दीन्हा तेल भरी, बाती दर्ई अघह । पूरा किया बिसाहिना, बहुरि