भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(२६२)

कवीरपंथी—

हैं, सत्य मूल सत भाव ॥३६॥ नाम सजीवन देत गुरु, करिके दाय़ा जाहि । गुरु गोविंद बताव जिहि, मिलत गोविंद ताहि ॥३७॥ गुरु गुरु में भेद है, गुरु गुरु में भाव । गुरु सदा सो बन्दिये, शब्द बतावे दाव ॥ ३८ ॥ कहै कवीर तजि भ्रमको, नान्हा करिके पीव । तजि अहं गुरु चरण गहू, यमसो वांचे जीव ॥ ३९ ॥ कनफुका गुरु देहका, बेहदका गुरु और । बेहदका गुरु जब मिलै, लहै ठिकाना ठौर ॥ ४० ॥ तीन लोक नौ खण्डमें, गुरुते बड़ा न कोय । करता करै न करिसकै, गुरु करै सो होय ॥४१॥

गुरु शिष्य पारखका अंग ॥

गुरु मिला न शिष्य मिला, दोऊ खेलैं दाव । दोऊ बूढ़े बापुरे, चढ़ि पाथरके नाव ॥४२॥ जाका गुरु है आंधरा, चेला निपट निरन्ध । अन्धे अन्धा ठेलिया, दोऊ कूप परन्ध ॥४३॥ काका गुरु है आंधरा, चेला खरा निरंध । अन्धेको अन्धा मिला, परे कालके बन्ध ॥ ४४ ॥ जानता पूछी नहीं, पूछि किया नहि गौन । अन्धेको अन्धा मिला, राह बतावे कौन ॥ ४५ ॥ माई मूढ़ी तेहि गुरुकी, जाते भ्रम ना जाय । आप बूढ़ा मझधारमें, चेला दिया बहाय ॥ ४६ ॥ पूरा कवीर गुरु बिना, पूरा शिष्य न होय । गुरु लोभी शिष्य लालची, दूनी दाइन होय ॥ ४७ ॥ पूरा सतगुर ना मिला, रहा अधूरा सीख (शिष्य) । स्वांग यतीका पहिरकै, घर घर मांगै भीख ॥ ४८ ॥ पूरा सहजै गुण करै, गुण नहि आवै छेह । सायर पोषै सर भरे, डांड न मांगै मेह ॥४९॥ गुरु किया है देहका, सतगुरु चीन्हा नाहि । भवसागरके जालमें, फिरि फिरि गोता खाहि ॥ ५० ॥ गुरुवाते भय ना मिटै, आन्ति न जिवका जाय । गुरु तो ऐसा चाहिये, देवे ब्रह्म बताय ॥५१॥

१ आप बूढ़ा चहुँबंदमें, चेले दिया बहाय ।

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