कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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जानते, चरणामृत सो पानि । ते नर नरके जायँगे, जन्म जन्म हैँ शानि ॥ २२ ॥
कविरा ते नर अन्ध हैं, गुरु को कहते और । हरि रुठे गुरु ठौर है, गुरु रुठे नहिँ ठौर ॥ २३ ॥ गुरु हैं बड़े गोविन्द ते, मनमें देखु विचार । हरि सुमरै सो वार है, गुरु सुमरै सो पार ॥ २४ ॥ गुरु सीधी ते उत्तरे, शब्द बिहूना होय । ताको काल घसीटि हैं, राखि सकै नहिँ कोय ॥ २५ ॥ अहम अग्नि निशि दिन जरे, गुरु सो चाहे मान । ताको यम नेवता दियो, होहु हमार मेहमान ॥ २६ ॥ गुरु पारस गुरु परस है, चन्दन बास सुवास । सतगुरु पारस जीवको, दीना मुक्ति निवास ॥ २७ ॥ गुरु सो भेद जो लीजिये, शीश दीजिये दान । बहुतक भोंडू बहि गये, राखि जीव अभिमान ॥ २८ ॥ गुरु समान दाता नहीं, जाचक शिष्य समान । तीन लोककी सम्पदा, सो गुरु दीना दान ॥ २९ ॥ गुरु बतावे साधुको, साधु कहै गुरु पूज । अरस परसके खेलमें, भई अगमकी सूज ॥ ३० ॥ यम गरजे बल बाघके, कहै कवीर पुकार । गुरु कृपा ना होत जो, तौ यम खाता फार ॥ ३१ ॥ अवर्ण वरण अमूर्ति जो, कहौँ ताहि किन पेख । गुरु दयाते पावई, सुरति निरति करि देख ॥ ३२ ॥ यह धन जो गुरुकी अहै, भाग बड़े जिन पाय । कह कवीर टोटा नहीं, जब परे तबहि लखाय ॥ ३३ ॥ कह कवीर दरगाह सो, जेहि उत्तरी हैँ भार । सोइ करै गुरुआइया, झकि २ मरै गँवार ॥ ३४ ॥ पंडित पठि गुनि पचि मुये, गुरु बिन मिलै न ज्ञान । ज्ञान बिना नहि मुक्ति है, सत्य शब्द प्रमान ॥ ३५ ॥ मूल ध्यान गुरु रूप है, मूल पूजा गुरु पाव । मूलनाम गुरु बचन
१ पारसमें अह गुरुमें, बडो अंतरों जान । वह लोहा कंचन करे, यह करे आपु समान ।