भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(२५८)

कवीरपंथी-

सिद्ध सो ऋषि गुरुड गोरख आय तुम शरणन तरे ॥३॥ कोटिन पयम्बर पीर गये भव तीर नाम कवीरते । केहि कहत बनत अगनित ऋषि भये अमर सत शरीरते ॥ धरमदासको प्रभु खास निजकर बिलग नीरो छीरते । सत्तनाम मिल निज धाम दीनो काम एक पद थीरते ॥४॥ विष बेलि फल संसार है यह झार विष जेहि तेहि भरा । विष अण्ड पिण्ड समस्त है विष वारिमय भव सागरा ॥ बिलगाय विषते कौन ऐसो भवन तीनमें नागरा । करि कोटियतन नज्ञान रतन है मिटे किमियहझा रा ॥५॥ जहाँ काम क्रोध और लोभ मोहते सकल पूरण पावई । सब रोम रोममें विष भरा है अमृत नाहि समावई ॥ जग विषम आग है लागि तुम बिनु ताहि कौन बुझावई । जीव कठिन काल कराल वशते बन्दीछोर छुडावई ॥६॥ स्तुति करें और आरति सब हंस मिलि सत लोकमें । सतपुरुष आय बचाय खुद जीव जरत यमकी झोंकमें ॥ न पाव कोइ उपाय साहब धाय धर जीव शोकमें । अरुझा सबहिं सरुझा न कोई जीव लोक वेद अथोकमें ॥७॥ सत्तलोक हंस विलोक आनंद बजत खनहद तूर है । प्रभु आरति अरु स्तुति करत सब सहज और अंकूर है । इच्छा सोहं अचित्त अक्षर शिरधरे पद धूर है । यक रोम जासु प्रकाश ऐसो कोटि चन्दा सूर है ॥ ८ ॥ यह तीन लोक सशोक देखिये आय आनन्द कन्द है । दशदिशि षसर यम जाल है सब जीव फन्द तेहि फन्द है । गुरु वैद्य साँचा वेदवाचा हर लियो दुख द्रन्द है । भव भीर हरण कवीर दासन दास परमानन्द है ॥ ९ ॥

कवित ।

पावन पतित जीव दीननके हितु प्रभु, तुही गुरु पुरुष कहायो