कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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सिखादे । किताबें अछकी ताको रखादे ॥ रहे बाकी न कोई सब उठादे । खयाले खाम अज दिल चन्द दर चन्द ॥ छुडाले बन्देको अज हस्तिये बन्द । खुदावन्दा खुदावन्दा खुदावन्द ॥३॥ बबजमें खुद परिस्तां कौन जावे वहांकी ला खबर हमको सुनावे ॥ गया जो फिर कभी कोई न आवे । जो आवे सो खबर पिछली भुलावे । न भूले तौ कभी इकता कहावे । मिहर तेरीसे पावें जीव आनन्द ॥ छुडाले बन्देको अब हस्तिये बन्द । खुदावन्दा खुदावन्दा खुदावन्द ॥४॥ इस आसी बन्दःको अपने करमसे बचाले पाँच और तीनों भरमसे ॥ गिरह दिल खोलकर महरम मरमसे । के रखलीजे पनह अपनी शरमसे ॥ अरज करता है आजिज दीदः नमसे । कदम बरकत तेरी हो फाल फरखुन्द ॥ छुडाले बन्देको अज हस्तिये बन्द । खुदावन्दा खुदावन्दा खुदावन्द ॥५॥२१॥
छन्द ।
अब सन्त सुरति सम्हाल देखो कन्त निज पहचानिये । अगम अबिचल अलख लखि निह अन्त वाको जानिये ॥ लखि वार पार है सोई साहब ज्ञान आँख जो तानिये । देख दो तीर कबीर जहाँ तहाँ दूसरो नहीं मानिये ॥ १ ॥ अविगत अलेख भौ लेख नहीं सो एक बन्दी छोर है । नर देह वाते नेह काजे भयो अब निसि भोर है ॥ जो नाम रत काल डरत है हरत सो जम जोर है । बड भाग अटल सुहाग उनको जिहि भरोसा तोर है ॥२॥ लोमस भुशुंडके झुंड ऋषिमुनि जासु गुन वर्णन करें । सनकादि नारद धनुक गुप्त सेवत चित् चरणन धरे ॥ ऋषभ आदि योगेश्वर जनक नृप सत पद चरणन परे । बहु कवीरपंथी शब्दावली ९