कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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( २५९ )
यँ और है । कहत कवीर धर्म धरत न धीर, करे अचल शरीर न लगत हीम जोर है ॥ पशु पंछी तारत है निगम पुकारत है, आरतको देखिके निहार रिग कोर है ॥ पीरो पयम्बर है धीरजो दिगम्बर हैं, वेद वेद वानीहू विरद बन्दीछोर है ॥ १ ॥ तजत न वानी सुर मुनिन बखानी प्रभु, शरणमें आनी जो करत निहोर है । तीन लोक दूँढ जाये दूसरे कई न पाये, लगसो चरण दुख हरण जो शोर है । नहीं शुभ करनी है बहु दुख भरनी है, उस गुरु शरणी है कलि काल घोर है । अधम उधारनको जगत सुधारनको, भक्ति सुक्ति धारण कवीर बन्दी छोर है ॥ २ ॥ बूढे बड़ ज्ञानी सिद्ध साधक जो ध्यानी, विन नाम सहिदानी जिन्हे आशा न तोर है । बलबीज चूसत है सिद्ध साधु दूसत है, निशि दिन मूसत है अन चीन्ह चोर है ॥ जीवको है ठौर नहीं सुरमुनि दौर नहीं, परमानन्द पौर नहीं पाव न जो दौड है । बन्दी छोर बन्दी छोर बन्दी छोर एक भजु, साहब कवीर टेक सोई बन्दी छोर है ॥ ३ ॥
सद्गुरुकी महिमा ।
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गुरुको कीजै दण्डवत, कोटि कोटि प्रणाम । कीट न जाने भुंगको, वह ( गुरु ) करले आप समान ॥ १ ॥ जगत जनायो जिहि सकल, सो गुरु प्रगटे आय । जिन गुरु आंखिन देखिया, सो गुरु दिया लखाय ॥ २ ॥ भली भई जो गुरु मिला, नातर होती हानि । दीपक ज्योति पतंग ज्यों, पडत्यो पूरा जानि ॥ ३ ॥ भली भई जो गुरु मिला, जासो पाया ज्ञान । घटहि माहि चबूतरा, घटही माहि दिवान ॥ ४ ॥ कवीर गुरु गुरुआ मिला, रूल गया आटे लौन । जाति पांति कुल मिट गया, नाम धरेगा कौन ॥ ५ ॥