कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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रश्क गुल्शनको ॥ गममें गिरियां खबर न उरियानी । प्यार तिनको न रहे इस तनको ॥ दिल चपल चुलबुला हुआ साकिन । मार कर मुर्दा कर दिया मनको ॥ खसो खासाकसे जब हुआ पाक । पार आ बैठे मार आसनको ॥ तुझसा कादर व मुझसा बे मकदूर । संग पारस मिला जो आहनको ॥ यह गलत मसलए आह और कहो । जिनको पहनाव खास जौशनको ॥ जरूम सब भर व इक नजर न हजर । पारचा पाट टाट सोजनको ॥ कोई बाकी रहे न सरमें शोर । कहो सतगुरु कबीर बन्दी छोर ॥४॥
दे बसा आन गैबका घेरा । जल्द कर मेरे कूचेमें फेरा ॥ जाल खंजर न छोड़ बिस्मिलको । ऐ दिलराम काम कर मेरा ॥ कारपरदाज तू गरीब निवाज । खानये दिल मेरे करो देरा ॥ हूय खुरशेदकी झलक झिलमिल । नूर हों पूर दूर अंधेरा ॥ भागजा जहां पड़े व पा जंजीर । सब जवानिब है कालका घेरा ॥ रुबाब गफलत्से कर कर दिया बेदार । बेहद अहसान बन्दः पर तेरा ॥ बिन तेरे कौन कब जग जीव । तूही साहब है और सब चितेरा ॥ हाथ थर कर जिसे उठाया तू ॥ बेगुमाँ उसका पारहो बेरा ॥
कोई बाकी रहे न सरमें शोर । कहो सतगुरु कबीरबन्दी छोर ॥६॥
बरुश तू दयाल मुझको किन्लेगाह । रोजो शब तूही तू है शाम पगाह ॥ कीजै सुहरम व दीजै अकल हिलाल । रख मेरा जामः पाक जेर निगाह ॥ होत गाफिल न तुझसे लमह कोई । बरुशदे मुझको मेरे शाहन्शाह ॥ यह दगाबाज दिल ये सुरदारा । रख पनह खुद जे हीलये रोबाह ॥ ऐ मेरे जान ऐ जानाँ । मुन्तजिर जलवः तेरे दीदः बराह ॥ हूबहु तेरे हूँ मैं किस ढबसे । हूँ पशेमाँ फेलनामा स्याह । कोई बाकी रहा नहीं चारा । लैक