भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(२५६)

कबीरपंथी—

दम सर्द तोबः नालः व आह ॥ रू रहई रही न राह गुरेज । बन्दः नाचारः को है तेरी पनाह ॥ न राह गुरेज । बन्दः नाचारः को है तेरी पनाह ॥

कोई बाकी रहे न सरमें शोर । कहो सतगुरु कबीर बन्दी छोर ॥६॥

इस जहाँ का न काम बाकी । एक तेरा सत्य नाम बाकी है । कुल पानी जो दीदः मनजरमें । सार शब्द पयाम बाकी है ॥ हक तेरेसे अदा न कोई ऐ हक । हक तेरा लाकलाम बाकी है ॥ सब चले जायँगे रहे न कोई । इक तेराही कयाम बाकी है ॥ देता है तू जो खास खासोंको । शरबते नोश जाम बाकी है ॥ परदेसे पैरुवाँका रहबर है । जल्सए खासों आम बाकी है ॥ तेरी हमदो सना रहै कायम । जब तलक सुबह व शाम बाकी है ॥ होखुका जोर दूरका आजिज । अब तेरा यह तमाम बाकी है ॥ कोई बाकी रहे न सरमें शोर । कहो सतगुरु कबीर बन्दी छोर ॥७॥

तरजिआ बन्द ॥ २ ॥

न तुझ बिन कोई सीधी राह पाया । भटकते मरगया घरको न आया ॥ जो कुफ़रस्तानमें खुद खुद फँसाया । रहे पुरखार दौरों ने दिखाया ॥ पकड़ जमराजने उसको भुलाया । पड़े सुरगों सब सध्यादके फंद ॥ छुडाले बन्देको अज हस्तिये बन्द । खुदावन्दा खुदावन्दा खुदावन्द ॥१॥ कभी तुझ बिन न जिवका कुफ़रूटे यह फिर फिर जाय कर उसहीसे जूटे ॥ यह दानाईकी दौलत सारि लूटे । तमीज और अकू दानिश उसकी छूटे ॥ हुआ सरमस्त इसमें फिर न फूटे । मिलाया बागवान्ने उससे पैबन्द ॥ छुडाले बन्देको अज हस्तिये बन्द ॥ खुदावन्दा खुदा- वन्दा खुदावन्द ॥ २ ॥ पकड़ कर हाथ अपनी रह दिखादे । सफीना सीनः पर नाम लिखादे ॥ न भूलूं फिर सबक सुझको