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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

(२५६)

कबीरपंथी—

दम सर्द तोबः नालः व आह ॥ रू रहई रही न राह गुरेज । बन्दः नाचारः को है तेरी पनाह ॥ न राह गुरेज । बन्दः नाचारः को है तेरी पनाह ॥

कोई बाकी रहे न सरमें शोर । कहो सतगुरु कबीर बन्दी छोर ॥६॥

इस जहाँ का न काम बाकी । एक तेरा सत्य नाम बाकी है । कुल पानी जो दीदः मनजरमें । सार शब्द पयाम बाकी है ॥ हक तेरेसे अदा न कोई ऐ हक । हक तेरा लाकलाम बाकी है ॥ सब चले जायँगे रहे न कोई । इक तेराही कयाम बाकी है ॥ देता है तू जो खास खासोंको । शरबते नोश जाम बाकी है ॥ परदेसे पैरुवाँका रहबर है । जल्सए खासों आम बाकी है ॥ तेरी हमदो सना रहै कायम । जब तलक सुबह व शाम बाकी है ॥ होखुका जोर दूरका आजिज । अब तेरा यह तमाम बाकी है ॥ कोई बाकी रहे न सरमें शोर । कहो सतगुरु कबीर बन्दी छोर ॥७॥

तरजिआ बन्द ॥ २ ॥

न तुझ बिन कोई सीधी राह पाया । भटकते मरगया घरको न आया ॥ जो कुफ़रस्तानमें खुद खुद फँसाया । रहे पुरखार दौरों ने दिखाया ॥ पकड़ जमराजने उसको भुलाया । पड़े सुरगों सब सध्यादके फंद ॥ छुडाले बन्देको अज हस्तिये बन्द । खुदावन्दा खुदावन्दा खुदावन्द ॥१॥ कभी तुझ बिन न जिवका कुफ़रूटे यह फिर फिर जाय कर उसहीसे जूटे ॥ यह दानाईकी दौलत सारि लूटे । तमीज और अकू दानिश उसकी छूटे ॥ हुआ सरमस्त इसमें फिर न फूटे । मिलाया बागवान्ने उससे पैबन्द ॥ छुडाले बन्देको अज हस्तिये बन्द ॥ खुदावन्दा खुदा- वन्दा खुदावन्द ॥ २ ॥ पकड़ कर हाथ अपनी रह दिखादे । सफीना सीनः पर नाम लिखादे ॥ न भूलूं फिर सबक सुझको

शरवनाथ

चैत्र शुद्ध ५, संवत् १९८४ वि० की कबीरपंजी महासभा कौदरमालके कसियथ सत बहुरोश फोटो

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शब्दावली

(२५७)

सिखादे । किताबें अछकी ताको रखादे ॥ रहे बाकी न कोई सब उठादे । खयाले खाम अज दिल चन्द दर चन्द ॥ छुडाले बन्देको अज हस्तिये बन्द । खुदावन्दा खुदावन्दा खुदावन्द ॥३॥ बबजमें खुद परिस्तां कौन जावे वहांकी ला खबर हमको सुनावे ॥ गया जो फिर कभी कोई न आवे । जो आवे सो खबर पिछली भुलावे । न भूले तौ कभी इकता कहावे । मिहर तेरीसे पावें जीव आनन्द ॥ छुडाले बन्देको अब हस्तिये बन्द । खुदावन्दा खुदावन्दा खुदावन्द ॥४॥ इस आसी बन्दःको अपने करमसे बचाले पाँच और तीनों भरमसे ॥ गिरह दिल खोलकर महरम मरमसे । के रखलीजे पनह अपनी शरमसे ॥ अरज करता है आजिज दीदः नमसे । कदम बरकत तेरी हो फाल फरखुन्द ॥ छुडाले बन्देको अज हस्तिये बन्द । खुदावन्दा खुदावन्दा खुदावन्द ॥५॥२१॥

छन्द ।

अब सन्त सुरति सम्हाल देखो कन्त निज पहचानिये । अगम अबिचल अलख लखि निह अन्त वाको जानिये ॥ लखि वार पार है सोई साहब ज्ञान आँख जो तानिये । देख दो तीर कबीर जहाँ तहाँ दूसरो नहीं मानिये ॥ १ ॥ अविगत अलेख भौ लेख नहीं सो एक बन्दी छोर है । नर देह वाते नेह काजे भयो अब निसि भोर है ॥ जो नाम रत काल डरत है हरत सो जम जोर है । बड भाग अटल सुहाग उनको जिहि भरोसा तोर है ॥२॥ लोमस भुशुंडके झुंड ऋषिमुनि जासु गुन वर्णन करें । सनकादि नारद धनुक गुप्त सेवत चित् चरणन धरे ॥ ऋषभ आदि योगेश्वर जनक नृप सत पद चरणन परे । बहु कवीरपंथी शब्दावली ९

(२५८)

कवीरपंथी-

सिद्ध सो ऋषि गुरुड गोरख आय तुम शरणन तरे ॥३॥ कोटिन पयम्बर पीर गये भव तीर नाम कवीरते । केहि कहत बनत अगनित ऋषि भये अमर सत शरीरते ॥ धरमदासको प्रभु खास निजकर बिलग नीरो छीरते । सत्तनाम मिल निज धाम दीनो काम एक पद थीरते ॥४॥ विष बेलि फल संसार है यह झार विष जेहि तेहि भरा । विष अण्ड पिण्ड समस्त है विष वारिमय भव सागरा ॥ बिलगाय विषते कौन ऐसो भवन तीनमें नागरा । करि कोटियतन नज्ञान रतन है मिटे किमियहझा रा ॥५॥ जहाँ काम क्रोध और लोभ मोहते सकल पूरण पावई । सब रोम रोममें विष भरा है अमृत नाहि समावई ॥ जग विषम आग है लागि तुम बिनु ताहि कौन बुझावई । जीव कठिन काल कराल वशते बन्दीछोर छुडावई ॥६॥ स्तुति करें और आरति सब हंस मिलि सत लोकमें । सतपुरुष आय बचाय खुद जीव जरत यमकी झोंकमें ॥ न पाव कोइ उपाय साहब धाय धर जीव शोकमें । अरुझा सबहिं सरुझा न कोई जीव लोक वेद अथोकमें ॥७॥ सत्तलोक हंस विलोक आनंद बजत खनहद तूर है । प्रभु आरति अरु स्तुति करत सब सहज और अंकूर है । इच्छा सोहं अचित्त अक्षर शिरधरे पद धूर है । यक रोम जासु प्रकाश ऐसो कोटि चन्दा सूर है ॥ ८ ॥ यह तीन लोक सशोक देखिये आय आनन्द कन्द है । दशदिशि षसर यम जाल है सब जीव फन्द तेहि फन्द है । गुरु वैद्य साँचा वेदवाचा हर लियो दुख द्रन्द है । भव भीर हरण कवीर दासन दास परमानन्द है ॥ ९ ॥

कवित ।

पावन पतित जीव दीननके हितु प्रभु, तुही गुरु पुरुष कहायो

शब्दावली ।

( २५९ )

यँ और है । कहत कवीर धर्म धरत न धीर, करे अचल शरीर न लगत हीम जोर है ॥ पशु पंछी तारत है निगम पुकारत है, आरतको देखिके निहार रिग कोर है ॥ पीरो पयम्बर है धीरजो दिगम्बर हैं, वेद वेद वानीहू विरद बन्दीछोर है ॥ १ ॥ तजत न वानी सुर मुनिन बखानी प्रभु, शरणमें आनी जो करत निहोर है । तीन लोक दूँढ जाये दूसरे कई न पाये, लगसो चरण दुख हरण जो शोर है । नहीं शुभ करनी है बहु दुख भरनी है, उस गुरु शरणी है कलि काल घोर है । अधम उधारनको जगत सुधारनको, भक्ति सुक्ति धारण कवीर बन्दी छोर है ॥ २ ॥ बूढे बड़ ज्ञानी सिद्ध साधक जो ध्यानी, विन नाम सहिदानी जिन्हे आशा न तोर है । बलबीज चूसत है सिद्ध साधु दूसत है, निशि दिन मूसत है अन चीन्ह चोर है ॥ जीवको है ठौर नहीं सुरमुनि दौर नहीं, परमानन्द पौर नहीं पाव न जो दौड है । बन्दी छोर बन्दी छोर बन्दी छोर एक भजु, साहब कवीर टेक सोई बन्दी छोर है ॥ ३ ॥

सद्गुरुकी महिमा ।

—*—

गुरुको कीजै दण्डवत, कोटि कोटि प्रणाम । कीट न जाने भुंगको, वह ( गुरु ) करले आप समान ॥ १ ॥ जगत जनायो जिहि सकल, सो गुरु प्रगटे आय । जिन गुरु आंखिन देखिया, सो गुरु दिया लखाय ॥ २ ॥ भली भई जो गुरु मिला, नातर होती हानि । दीपक ज्योति पतंग ज्यों, पडत्यो पूरा जानि ॥ ३ ॥ भली भई जो गुरु मिला, जासो पाया ज्ञान । घटहि माहि चबूतरा, घटही माहि दिवान ॥ ४ ॥ कवीर गुरु गुरुआ मिला, रूल गया आटे लौन । जाति पांति कुल मिट गया, नाम धरेगा कौन ॥ ५ ॥

(२६०)

कवीरपंथी—

ज्ञान प्रकाशीं गुरु मिला, सो जन विसरि न जाय । जब गोविन्द कृपा करी, तब गुरु मिलिया आय ॥६॥ गुरु गोविन्द कर जानिये, रहिये शब्द समाय । मिलै तो दण्डवत बन्दगी, पल २ ध्यान लगाय ॥ ७ ॥ गुरु गोविन्द तो एक हैं, दूजा सब आकार । आपा मेटै हरि भजै, तब पावै करतार ॥८॥ गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागौ पाय । बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय ॥ ९ ॥ बलिहारी गुरु आपने, घड़ि घड़ि सौ सौ बार । मानुषसे देवता किया, करत न लागा बार ॥१०॥ बूडा था पर ऊबरा, गुरुकी लहरि चमक । वेरा देखा झांझरा, उतरि भया फरक ॥११॥ पहिले दाता शिष्य भये, तन मन अरप्यो शीझ । पाछे दाता गुरु भये, नाम दियो बखशीश ॥ १२ ॥ राम नामके पटतरे, देवे को कछु नाहिं । क्या लै गुरु संतोषिये, हवस रही मनमाहिं ॥ १३ ॥ निज मन तो नीचा किया, चरण कमलकी ठौर । कहैं कवीर गुरुदेव बिन, नजर न आवै और ॥ १४ ॥ मन दिया तिन सब दिया, मनके लार शरीर । अब देवेको कछु नहीं, यों कथि कहे कवीर ॥ १५ ॥ तन मन दिया तो भल किया, शिरका जासी भार । कबहुँ कहै कि मैं दिया, घनी सहैगा मार ॥१६॥ गुरु सिकलीगर कीजिये, मनहिं मस्कला देइ । मनका मैल छुडाइके, चित दर्पण करि लेइ ॥ १७ ॥ गुरु धोवी शिष कापडा, साबुन सिरजन हार । सुरति शिला पर धोइये, निकसै ज्योति अपार ॥ १८ ॥ गुरु कुलाल शिष्य कुम्भ हैं, गढ गढ काटै खोट । अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहे चोट ॥ १९ ॥ ज्ञान समागम प्रेम सुख, दया भक्ति विश्वास । गुरु सेवा ते पाइये, सतगुरु चरण निवास ॥ २० ॥ गुरु मानुष करि जानते, ते नर कहिये अन्ध । यहाँ दुखी संसारमें, आगे यमके बन्ध ॥ २१ ॥ गुरुको मानुष

शब्दावली

(२६१)

जानते, चरणामृत सो पानि । ते नर नरके जायँगे, जन्म जन्म हैँ शानि ॥ २२ ॥

कविरा ते नर अन्ध हैं, गुरु को कहते और । हरि रुठे गुरु ठौर है, गुरु रुठे नहिँ ठौर ॥ २३ ॥ गुरु हैं बड़े गोविन्द ते, मनमें देखु विचार । हरि सुमरै सो वार है, गुरु सुमरै सो पार ॥ २४ ॥ गुरु सीधी ते उत्तरे, शब्द बिहूना होय । ताको काल घसीटि हैं, राखि सकै नहिँ कोय ॥ २५ ॥ अहम अग्नि निशि दिन जरे, गुरु सो चाहे मान । ताको यम नेवता दियो, होहु हमार मेहमान ॥ २६ ॥ गुरु पारस गुरु परस है, चन्दन बास सुवास । सतगुरु पारस जीवको, दीना मुक्ति निवास ॥ २७ ॥ गुरु सो भेद जो लीजिये, शीश दीजिये दान । बहुतक भोंडू बहि गये, राखि जीव अभिमान ॥ २८ ॥ गुरु समान दाता नहीं, जाचक शिष्य समान । तीन लोककी सम्पदा, सो गुरु दीना दान ॥ २९ ॥ गुरु बतावे साधुको, साधु कहै गुरु पूज । अरस परसके खेलमें, भई अगमकी सूज ॥ ३० ॥ यम गरजे बल बाघके, कहै कवीर पुकार । गुरु कृपा ना होत जो, तौ यम खाता फार ॥ ३१ ॥ अवर्ण वरण अमूर्ति जो, कहौँ ताहि किन पेख । गुरु दयाते पावई, सुरति निरति करि देख ॥ ३२ ॥ यह धन जो गुरुकी अहै, भाग बड़े जिन पाय । कह कवीर टोटा नहीं, जब परे तबहि लखाय ॥ ३३ ॥ कह कवीर दरगाह सो, जेहि उत्तरी हैँ भार । सोइ करै गुरुआइया, झकि २ मरै गँवार ॥ ३४ ॥ पंडित पठि गुनि पचि मुये, गुरु बिन मिलै न ज्ञान । ज्ञान बिना नहि मुक्ति है, सत्य शब्द प्रमान ॥ ३५ ॥ मूल ध्यान गुरु रूप है, मूल पूजा गुरु पाव । मूलनाम गुरु बचन

१ पारसमें अह गुरुमें, बडो अंतरों जान । वह लोहा कंचन करे, यह करे आपु समान ।

(२६२)

कवीरपंथी—

हैं, सत्य मूल सत भाव ॥३६॥ नाम सजीवन देत गुरु, करिके दाय़ा जाहि । गुरु गोविंद बताव जिहि, मिलत गोविंद ताहि ॥३७॥ गुरु गुरु में भेद है, गुरु गुरु में भाव । गुरु सदा सो बन्दिये, शब्द बतावे दाव ॥ ३८ ॥ कहै कवीर तजि भ्रमको, नान्हा करिके पीव । तजि अहं गुरु चरण गहू, यमसो वांचे जीव ॥ ३९ ॥ कनफुका गुरु देहका, बेहदका गुरु और । बेहदका गुरु जब मिलै, लहै ठिकाना ठौर ॥ ४० ॥ तीन लोक नौ खण्डमें, गुरुते बड़ा न कोय । करता करै न करिसकै, गुरु करै सो होय ॥४१॥

गुरु शिष्य पारखका अंग ॥

गुरु मिला न शिष्य मिला, दोऊ खेलैं दाव । दोऊ बूढ़े बापुरे, चढ़ि पाथरके नाव ॥४२॥ जाका गुरु है आंधरा, चेला निपट निरन्ध । अन्धे अन्धा ठेलिया, दोऊ कूप परन्ध ॥४३॥ काका गुरु है आंधरा, चेला खरा निरंध । अन्धेको अन्धा मिला, परे कालके बन्ध ॥ ४४ ॥ जानता पूछी नहीं, पूछि किया नहि गौन । अन्धेको अन्धा मिला, राह बतावे कौन ॥ ४५ ॥ माई मूढ़ी तेहि गुरुकी, जाते भ्रम ना जाय । आप बूढ़ा मझधारमें, चेला दिया बहाय ॥ ४६ ॥ पूरा कवीर गुरु बिना, पूरा शिष्य न होय । गुरु लोभी शिष्य लालची, दूनी दाइन होय ॥ ४७ ॥ पूरा सतगुर ना मिला, रहा अधूरा सीख (शिष्य) । स्वांग यतीका पहिरकै, घर घर मांगै भीख ॥ ४८ ॥ पूरा सहजै गुण करै, गुण नहि आवै छेह । सायर पोषै सर भरे, डांड न मांगै मेह ॥४९॥ गुरु किया है देहका, सतगुरु चीन्हा नाहि । भवसागरके जालमें, फिरि फिरि गोता खाहि ॥ ५० ॥ गुरुवाते भय ना मिटै, आन्ति न जिवका जाय । गुरु तो ऐसा चाहिये, देवे ब्रह्म बताय ॥५१॥

१ आप बूढ़ा चहुँबंदमें, चेले दिया बहाय ।

शब्दावली

(२६३)

कवीर जानता ब्रह्मा नहीं, पैडा दिया बताय । चलते चलते तहँ गया, जहाँ निरंजन राय ॥ ५२ ॥ बंधेको बंधा मिलै, छुटै कौन उपाय । कर सेवा निर्बंधकी, पलमें लेत छुडाय ॥ ५३ ॥ गुरु सिकलीगर कीजिये, मनहि मसकला देह । मनके मैल छुडाइके, चित्त दर्पण करिलेह ॥ ५४ ॥ झूठे गुरुके पक्षको, तजत न कीजै बार । राह न पावै शब्दका, भटकै द्वारहि द्वार ॥ ५५ ॥ जाका गुरु गेही अहे, चेला गेही होय । कीच कीचके धोवते, दाग न छूटे कोय ॥ ५६ ॥ गुरु नाम है ज्ञानका, शिष्य सीखले सोह । ज्ञान मर्याद जाने बिना, गुरु शिष्य न कोह ॥ ५७ ॥ सिख तो ऐसा चाहिये, गुरुको सब कछु देह । गुरु तो ऐसा चाहिये, शिखसे कछु न लेह ॥ ५८ ॥ गुरु पूरा शिष्य सुरा, बागं मोर रन पैठ । सत सुकृतको चीन्हके, एक तरुत चढि बैठ ॥ ५९ ॥

॥ सतगुरुका अंग ॥

सतगुरु समान को सगा, साधु समान को दात । हरि समान को हीतु है, हरिजन सम को जात ॥ ६० ॥ सतगुरुको महिमा अनंत, अनंत किया उपकार । लोचन अनन्त उधारिया, अनन्त दिखावन हार ॥ ६१ ॥ सब जग भर्मा यों फिरै, ज्यों रामाका रोज । सतगुरु सो सुधि भयी, पाया हरिका खोज ॥ ६२ ॥ थापन पाईं थिति भई, सतगुरु दीना धीर । हीरा कवीर बनीजिया, मान सरोवर तीर ॥ ६३ ॥ थिति पाय मन थिर भयो, सतगुरु कीन्ह सहाय । और कथा मन ना रुचै, हिरदय रमिता राय ॥ ६४ ॥ चेतन चौकी बैठि करि, सतगुरु दीनी धीर । निर्भय है निःशंक भजु, केवल कहैं कवीर ॥ ६५ ॥ बहे बहाये जात थे, लोक वेदके साथ । पैडामें सतगुरु मिले, दीपक दीन्हा हाथ ॥ ६६ ॥ दीपक दीन्हा तेल भरी, बाती दर्ई अघह । पूरा किया बिसाहिना, बहुरि

(२६४)

कवीरपंथी-

न आवै हह ॥ ६७ ॥ चौपड माडी चौहटे, सारी किया शरीर । सतगुरु दाव बताइया, खेलै दास कवीर ॥ ६८ ॥ सतगुरु हमसुँ रीझिके, एक कहा परसंग । बरषा बादल प्रेमका, भीजि गया सब अंग ॥ ६९ ॥ सतगुरुके उपदेशका, सुनिया एक विचार । जो सतगुरु मिलता नहीं, जाता यमके द्वार ॥ ७० ॥ यमद्वारे पर दूत सब, करते खींचा तानि । तिनते कबहुँ न छूटता, फिरता चारों खानि ॥ ७१ ॥ चारों खानिमैं भ्रमता, कबहुँ न लहता पार । सो तो फेरा मिटि गया, सतगुरुका उपकार ॥ ७२ ॥ सतगुरुके सिद्धके किया, दिल अपना कै सांच । कलियुग मोसे लडि पडा, मोहकिम मेरा बांच ॥ ७३ ॥ सतगुरु सांचा सूरमा, शब्द जो बाहा एक । लागतही भय मिटि गया, पडा कलेजे छेक ॥ ७४ ॥ सतगुरु शब्दका बाण ले, बाहन लागा तीर । एक जो बाहा प्रेम सुँ, भीतर विधा शरीर ॥ ७५ ॥ सतगुरु बाहा बाण भरी, धरकर सूधी मूठ । अंग उघाडे लागिया, गया धुवासुँ फूठ ॥ ७६ ॥ सतगुरु मारा बाण भरि, डोला नहीं शरीर । कह चुम्बक का करि सकै, सुख लागे वहि तीर ॥ ७७ ॥ लागी गांसी सुख भया, मरै न ज वै कोय । कह कवीरसो अमर भये, जीवत मृतक होय ॥ ७८ ॥ हंसि बोलै ना उन सुनी, चंचल मेला मार । कह कवीर अंतर विधौ, सतगुरुका हथियार ॥ ७९ ॥ गुँगा हूआ बावरा, बहिरा हूआ कान । पायनसे पंगुला हुआ, सतगुरु मारा बान ॥ ८० ॥ सतगुरु मेरा शूरमा, भेदा सकल शरीर । बाण दुवासुँ फूटिया, जीवै दास कवीर ॥ ८१ ॥ सतगुरु सांचा शूरमा, नख शिख मारा पूर । बाहर घाव न दीसई, भीतर चकना चूर ॥ ८२ ॥ सतगुरु मारा बाण भरि, टूटि गया सब जेव । कहुँ आदा कहुँ आपदा, तसवीः कहुँ कितेब ॥ ८३ ॥ सतगुरु मारा बाण भरि,

शब्दावली

(२६५)

शब्द सुरंगी बान । मेरा मारा फिर जिवै, हाथ न धहं कमान ॥ ८४ ॥ सतगुरु मारा बाण भारि, निरखि निरखि निज ठौर । राम अलखमें रमि रहा, चित्त न आवै और ॥ ८५ ॥ सतगुरु मारा प्रेमसुं, रही कटारो टूट । जैसी अनी न सालई, तैसी साजै मूट ॥ ८६ ॥ मान बडाई ऊरमी, यह जगका व्यवहार । दास गरीबी बन्दगी, सतगुरुका उपकार ॥ ८७ ॥ दिलहीमें दीदार है, बाद वहै संसार । सतगुरु शब्दका मसकला, सुझे दिखावनहार ॥ ८८ ॥ दीसै सो सब विनसि है, नाम धरे सो जाय । कहै कवीर सोइ सत्य है, सतगुरु दिया बताय ॥ ८९ ॥ कुदरत पाई खबर सों, सतगुरु दिया बताय । भँवर बिलम्बे कमलसे, अब कैसे उडिजाय ॥ ९० ॥ राम नाम छाई नहीं, सतगुरु सीख दिया । अविनाशीको परसिके, आतम अमर भया ॥ ९१ ॥ चौसठ दीवा जोयके, चौदह चन्दा माँहि । तेहि घर कैसा चाँदना, जेहि घर सतगुरु नाहि ॥ ९२ ॥ चित्त चोखा मन मसकला, बुधि उत्तम मति धीर । सो धोखा ना विरचई, सतगुरु मिलै कवीर ॥ ९३ ॥ कोटिक चन्दा ऊगवे, सूरज कोटि हजार । सतगुरु मेला बाहिरे, दीसत घोर अँधार ॥ ९४ ॥ सतगुरु मोहिं निवाजिया, दीना अम्बर बोल । शीतल छाया सुगम फल, हँसा करे कलोल ॥ ९५ ॥ सतगुरु सत्य कवीर है, संकट परा हजीर । हाथ जोड़ विनती कहूं, भवसागरके तीर ॥ ९६ ॥ चित्त चोखा दिल निर्मला, दयावन्त गंभीर । सो धोखा विच क्यों रहै, सतगुरु मिलै कवीर ॥ ९७ ॥ ज्ञान समागम प्रेम सुख, दया भक्ति विश्वास । सतगुरु मिलि एकै भया, रही न दूजी आस ॥ ९८ ॥ सतगुरु पारसके शिला, देखो सोच विचार । आई पडोसिन लै चली, दियो दिया सँवार ॥ ९९ ॥

१ कबीर सोइ तत्व गहो, सतगुरु दियो चैताय ।

(२६६)

कवीरपंथी—

जीव अधम अति कुटिल है, कहुँ नहीं पतिआय । ताका औगुन मेटिके, सतगुरु होत सहाय ॥ १०० ॥ सतगुरु बडा सराफ है, परखे खरा अरु खोट । भवसागर ते निकारिकै, राखै अपनी ओट ॥ १०१ ॥ सतगुरु शब्द जहाज है, कोइ कोइ पावै भेद । बुन्द ससुद एकै भया, किसका कहै निषेद ॥ १०२ ॥ सतगुरु महल बनाइया, ज्ञान गिलावा दीन । दूर दिखावन कारने, शब्द झरोखा कीन ॥ १०३ ॥ सतगुरु शब्द उलंघिके, जो कोई शिष जाय । जहां जाय तहाँ काल है, कहै कवीर समझाय ॥ १०४ ॥ सतगुरु बड़े जहाज हैं, जो कोइ बैठे आय । पार उतारै और को, आपना पारस लाय ॥ १०५ ॥ विन सतगुरु बांचे नहीं, फिर बूड़े भव मांहि । भव सागर के त्रासमें, सतगुरु पकड़े बांहि ॥ १०६ ॥ सतगुरु मिला तो क्या भया, जो मन पाडी भोल । पास कपड ठाके नहीं, क्या करे वपुरी चोल ॥ १०७ ॥ सब जग मुआ विषधर धरे, कहै कवीर विचार । जो सतगुरुको पाइया, सो जन उतरे पार ॥ १०८ ॥

विनु सतगुरु उपदेश, सुर नर मुनि नहिं निस्तरै । ब्रह्मा विष्णु महेश, और सकल जिव को गने ॥ १०९ ॥ कोटिन पटि गुनि पचि मुआ, योग यज्ञ तप लाय । विनु सतगुरु पावे नहीं, कोटिन करै उपाय ॥ ११० ॥ करहु छोड कुल लाज, जो सतगुरु उपदेश है । होय तवै जिव काज, निश्चय के प्रतीति कर ॥ १११ ॥ अक्षर आदि जगतमें, जाकर सब विस्तार । सतगुरु दया सो पाइये, सतनाम निज सार ॥ ११२ ॥ सतगुरु खोजो सन्त, जीव काज जो चाहहुँ । मेटो भवको अन्त, आवा-गवन निवारहुँ ॥ ११३ ॥ विनवै दोउ कर जोर, सतगुरु बन्दी छोर है । पावै नामकी डोर, जरा मरण भव काल मिटै ॥ ११४ ॥ सत नाम निज सोय, जो

शब्दावली

(२६७)

सतगुरु दाय। और झूठ सब होय, काहेको भरमत फिरै॥ ११६ सतगुरु शरन न आवई, फिरि २ होय अकाज। जीव खोय सब जायँगे, काल तिहूँ पुर राज ॥ ११६ ॥ जो सतनाम समय, सतगुरुकी परतीति करि। यमको अमल मिटाय, हंस जाय सतलोक कहैं ॥ ११७ ॥ तत्त्व दर्शी जो होय, सो सत सार विचारई। पावै तत्त्व बिलोय, सतगुरुका चेला सोई ॥ ११८ ॥ जग भौसागर माहिं, कहो कैसे बूडत तरे। गहै नाम सतगुरु काहि, जो जल थल रक्षा करे॥ ११९ ॥ निज मत सतगुरु पास, जेहि पाय सब सुधि मिलै। जगत रहे उदास, ता कहैं क्यों नहिं खोजिये ॥ १२० ॥ यह सतगुरु उपदेश है, जो मानै परतीति। कर्म भर्म सब त्यागिके, चलै सो भव जल जीति ॥ १२१ ॥ सतगुरु तो सत भाव है, जो अस भेद बताय। धन्य शिष धन्य भाग तेहि, जो ऐसी सुधि पाय ॥ १२२ ॥

अथ 'गुरुमुख' लक्षण

गुरु मुख गुरु चित्तवत रहे, जैसे मणी भुवंग। कहैं कवीर बिसरे नहीं, यह गुरु मुखको अंग ॥ १२३ ॥ गुरु मुख गुरु चित्तवत रहे, जैसे शाह दिवान। और कर्वार नहिं देखता, है

१ जगतमें दो भाँतिके पुरुष होते हैं एक गुरु मुख, दूसरा मन मुख ॥

गुरु मुख वह है—जो अपने मनको सतगुरु सतपुरुषोंके आजा रीति भाँति चाल व्यवहारसे चलावे अर्थात् उनकी आजा और रीति यद्यपि प्रत्यक्षमें दुखदाई भी हो परंतु उसके अंतफलको सुखदायक समझके जेते हो सके वैसे मनको उनके अनुसार रखई ॥ इसमें कुछ सन्देह नहीं कि, सत्पुरुषोंके रीति उपदेश पर चलनेमें मन प्रथम कष्टको प्राप्त हो स्वच्छान्चारी बनना चाहिएा, परन्तु चलकरके मनको स्वतंत्रतासे रोक उसी तरफ लगाने फिर तो थोड़ेहो अभ्याससे मन चंचलताको छोड़ उसीमें प्रवृत्त होकर पूर्ण गुरुमुखताको धारण करेगा ॥

गुरु मुख बिना विचार नहिं करई।

जो कष्ट करै तासे नहिं टरई ॥

मन मत दो प्रकार घरम, है गृही अर साध।

दोहनको लाजिम है, गुरु मुख होहु अबाध ॥

परन्तु गुरु किते कहते हैं, यह भी सुनो कि जो शिष्यके शंकाओंको निवृत्त कर उतको उत्तम मार्ग पर लगाता हो तथा भयानक रोचक भूट बखेड़ोंमें फसाय केवल कानफूंक पूजा सालीनासे काम न रखता हो ॥

(२६८)

कवीरपंथी—

वाहीको ध्यान ॥ १२४ ॥ गुरुमुख गुरु आज्ञासे, छोड़ि देइ सब काम । कहे कवीर गुरुदेवको, तुरत करै परणाम ॥ १२५ ॥ उलटे सुलटे बचनको, शिष्य न माने दुःख । कहैं कवीर संसारमें, सो कहिय गुरुमुख ॥ १२६ ॥

अथ 'मनमुखका लक्षण ।

सेवक मुखहि कहावै, सेवामें टढ नाहि । कहैं कवीर सो सेवक, लख चौरासी मांहि ॥ १२७ ॥ फल कारण सेवा करे, निसदिन जांचे राम । कहै कवीर सेवक नहीं, चाहे चौगुन दाम ॥ १२८ ॥ सेवक स्वामी एक मत, जो मतिसे मति मिल जाय । चतुराई रीझे नहीं, रीझे मनके भाय ॥ १२९ ॥ सतगुरु शब्द उलंघिके, जो कोइ शिष्य जाय । जहां जायतहँ काल है, कहैं कवीर समझाय १३० गुरु सो करे कपट चतुराई । सो हँसा भव भरमे आई । जो जन गुरुकी निन्दा करई । झूकर स्वान गर्भमें परई ॥ १३१ ॥

अथ निगुराका लक्षण ।

नर निगुराके तीन गुण, भोपा भरडा भांड । रात राडाकी सेजमें, कहाँ पलापै राँड ॥ १३२ ॥ गुरु बिन माला फेरता, गुरु बिनु करता दान । गुरु बिन सब निष्फल गया, बूझो वेद पुराण ॥ १३३ ॥ जो निगुरा सुमरन करै, दिनमें सौ सौ बार । नगर नायका सत करै, जरे कौनकी लार ॥ १३४ ॥ गर्भ योगीश्वर गुरु बिना, लागा हरिके सेव । कहै कवीर बैकुण्ठसे, फेर दिया

१ मनमुख उसे कहते हैं कि, जो सतगुरु और महात्मा सत्पुरुषोंको बात कान न धर केवल मनके कहने पर चलता है और सत्पुरुषों को कृपासे विवेक उसे उन कर्मोंसे रोकता है तो भी उस पर ध्यान न देकर मन्द कर्मों में प्रवृत्त हो ही जात है । मन्द भोगोंमें प्रवृत्त रहनेवालोंको यदि वे भोग पहले कुछ कालतक अभूतके समान जान पड़ते हैं परन्तु पछोते वही अमृत विषरूप हो बिकराल दुःखरूपी राक्षसके स्वरूपको धारण कर पूर्ण नरका अनुभव कराते हैं और मनमुख पुरुष इन दुःखोंको देखता या अनुभव करता हुआ भी अपने मनके वश हुआ बारम्बार शिष्यासक्तिको प्राप्त होता है यन्मुख पुरुषको कुछ लज्जा, क्षय आदिक भी नहीं होते, कभी त्यागी, कभी गृही, कभी चोर, कभी साधु, कभी यति, कभी व्यभिचारी अनेक स्वार्थोंको धारण करता और अपनेको बड़ा बुद्धिमान्, न्यायी, धीर, साधु आदि विशेषणोंसे सम्पन्न जान अहंकारमें डूबा रहकर दूसरोंको निन्दा असुया किया करता है ।

शब्दावली

(२६९)

शुकदेव ॥ १३६ ॥ जनक विदेही गुरु किया, लगा हरिके सेव । कहै कवीर बैकुण्ठमें, उलटि मिला शुकदेव ॥ १३६ ॥ पूराको पूरा मिलै, पूरा पड़े सो दाव । निगुरा तो उम्भर चले, जब तब चलै कुदाव ॥ १३७ ॥ जो कामिनि परदे रहै, सुनै न गुरु मुख बात । होय जगतमें कूकरी, फिरै उधारै गात ॥ १३८ ॥

अब विनती (प्रार्थना)

विनवत हौं कर जोरिके, सुनियो कृपा निधान । साधु सँगति सुख दीजियो, दया गरीबी दान ॥ १३९ ॥ अबकी जो सतगुरु मिलै, सब दुख आँसू रोय । चरणों ऊपर सर धरूं, कहूं जो कहना होय ॥ १४० ॥ सुरति कर मोर साँइयाँ, हम हैं भवजल माँहि । आपेही बहि जायँगे, जो नहिं पकड़ो बाँहि ॥ १४१ ॥ क्या सुख लै विनती कहैं, लाज आवत है मोहिं । तुम देखत ओगुन किये, कैसे भाऊं तोहिं ॥ १४२ ॥ सतगुरु तोहिं विसारिके, किसके शरणे जाँय । शिव विरंचि मुनि नारदा, हृदय नाहिं समाय ॥ १४३ ॥ मैं अपराधी जनमका, नखशिख भरा विकार । तुम दाता दुख भंजना, मेरी करो उबार ॥ १४४ ॥ अवगुण मेरे बापजी, बखशो गरीब निवाज । जो हौं पूत कपूत हौं, तऊ पिताको लाज ॥ १४५ ॥ अवगुण किये तो बहु किये, करत न मानी हार । भावे बंदा बखशिये, भावे गर्दन मार ॥ १४६ ॥ कविरा भूल बिगाडियाँ, करि २ मैला चित्त । साहेब गरूआ चाहिये, नफर बिगाडे नित्त ॥ १४७ ॥ साईं तेरे बहुत गुण, अवगुण कोई नाहिं । जो दिल खोजूँ आपना, सब अवगुण मोहि माँहिं ॥ १४८ ॥ साहेब तुम जनि बीसरो, लाख लोग लगि जाँहि । हमसे तुमरे बहुत हैं, तुम सम हमरे नाहिं ॥ १४९ ॥ अवसर बीता अल्प तन, पीव रहा परदेश । कलंक उतारो रामजी,

( २७० )

कबीरपंथी—

मानो भरम सँदेश ॥ १५० ॥ कर जोडे बिनती कहूँ, भवसागर आपार । बन्दा ऊपर मिहर करो, आवा-गवन निवार ॥ १५१ ॥ अन्तर््यामी एक तू, आत्मके आधार । जो तुम छोड़ो साथको, कौन उतारे पार ॥ १५२ ॥ भव सागर भारा महा, गहिरा अगम अथाह । तुम दयाल दया करो, तब पाऊँ कछु थाह ॥ १५३ ॥ साहेब तुम्ही दयाल हो, तुम लग मेरी दौर । जैसे काग जहाजको, सूझै और न ठौर ॥ १५४ ॥ साईं तेरा कुछ नहीं, मेरा होय अकाज । बिरद तुम्हारे लाजकी, शरण परेकी लाज ॥ १५५ ॥ मेरा मन जो तोहि से, यों जो तेरा होय । अहिरण ताता लोह ज्यों, संधि लखै नहिं कोय ॥ १५६ ॥ मेरा मन जो तुझसे, तेरा मन कहिं और । कह कबीर कैसे निभै, एक चित्त दुइ ठौर ॥ १५७ ॥ मुझ अवगुण तुझ गुण घणा, तुझ गुण अवगुण मुझ ॥ जो मैं बिसरूँ तुझको, तू नहिं बिसरो मुझ ॥ १५८ ॥ तुझ विसारा सैर नहीं, किसके शरणें जाहि । शिव विरंचि मुनि नारदा, सो न हिरदय समाहि ॥ १५९ ॥ मैं अपराधी जनमका, नख शिख भरा विकार । दया करो तुम राम जी, तो मैं उतरूँ पार ॥ १६० ॥ साईं मेरा सावधान है, मैहीं भया अचेत । मन बच कर्म न हरि भजा, ताते निष्फल हेत ॥ १६१ ॥ मन प्रतीति न प्रेम रस, ना कोइ तनमें ढंग । ना जावूँ उस पीवसे, क्योंकर रहसी रंग ॥ १६२ ॥ जिनको साईं रंग दिया, कवहुँ न होय कुरंग । दिन दिन बाणी आगरी, चढ़ै सवाया रंग ॥ १६३ ॥ साईं जो मुझको मिलै, पूछैंगे कुशलात । आदि अन्त की सब कहूँ, उर अन्तर की बात ॥ १६४ ॥ कविरा तू तो गारुआ, हलकी अपनी चाल । रंग कुरंगी रंगिया, किया और लगवार ॥ १६५ ॥

शब्दावली ।

( २७१ )

अथ स्मरणका लक्षण और साहाय्य ।

सुमिरण मारग सहजका, सतगुरु दिया बताय । साँस उस्वाँस संभालता, यक दिन मिलसी आय ॥ १६६ ॥ माला स्वाँस उस्वाँस को, करै कोइ निजदास । चौरासी भरमें नहीं, कटे कर्मकी फाँस ॥ १६७ ॥ मन माला तन मेखला, भवकी करी बभूत । राम मिला सब देखता, सो योगी अवभूत ॥ १६८ ॥ अजपा सुमिरण घट विघै, दीना सिरजन हार । रण रोही संग्राम में, रहगई मारा मार ॥ १६९ ॥ बाहर क्या दिखलाइये, अन्तर जपिये राम । कैसा मोहिला खल्क स्रुं, सरे धनीको काम ॥ १७० ॥ सतगुरुका सारा नहीं, शब्द न लागा अंग । कोरा रहिगौ स दड़ा, सदा तेलके संग ॥ १७१ ॥ कविरा माला काठकी, बहुत जतनका फेरु । माला फेरो स्वाँसकी, जामे गाँठ न मेरु ॥ १७२ ॥ स्वासा सुमिरण होत है, ताहि न लगै बार । पल पल बन्दगी साधना, देखो दृष्टि पसार ॥ १७३ ॥ ओठ कण्ठ हालै नहीं, जिह्वा नहीं उचार । गुप्त वस्तुको जो लखै, सोई हंस हमार ॥ १७४ ॥ शून्य मंडलमें घर किया, बाजा शब्द रसाल । रोम रोम दीपक भया, प्रकटे दीन दयाल ॥ १७५ ॥ तूत करता तू भया, सुझमें रही न हूं । बारी तेरे नामकी, जित देखूं तित तू ॥ १७६ ॥ तूत करता तू मिला, तुझमें रहा समय । तुझही माहीं मिलि रहा, अब मन अन्त न जाय ॥ १७७ ॥ पाँच सखी पिव पिव करे, छट्टा सुमरे मन्न । आई सुरति कवीरकी, पाया नाम रतन्न ॥ १७८ ॥ चिंता तो यह नामकी, और न चितवै दास । जो कुछ चितवै नाम विनु सोई कालकी फाँस ॥ १७९ ॥ पहिले बुरा कमायके, बांधा विषको पोट । कोटि करम क्षणमें कटे, आया हरिकी ओट ॥ १८० ॥ कोटि कर्म फल पलकमें, रंचक आवै नाम ।

(२७२)

कवीरपंथी—

अनेक युग जो पुण्य करै, नहीं नाम बिन ठाम ॥ १८१ ॥ कवीर हरिके नाम से, कोटि विघ्न टरि जाय। राई समान वसंदरा, केता काठ जलाय ॥ १८२ ॥ होय नाम जो एक रती, पाप जु रती हजार। अर्द्ध नाम घट संचरै; जारि करै सब छार ॥ १८३ ॥ सत्य नामको खोजिले, जाते अग्नि बुझाय। बिना नाम बांचे नहीं, धरमराय धरि खाय ॥ १८४ ॥ गुण गाया गुण ना कटे, रटै न राम वियोग। अहि निशि हरि ध्यावै नहीं, क्यों पावै दुर्लभ योग ॥ १८५ ॥ कविरा कठिनाई खरी, लेता हरिको नाम। सूली ऊपर सेज है, गिरे तो नहीं ठाम ॥ १८६ ॥ कविरा रामहि ध्याइले, मन करि प्रेम प्रतीति। हरि सागर जनि बीसरे, छीलर देखु अनोति ॥ १८७ ॥ कविरा राम रिझायले, मनहीमें गुण गाय। फूटा नग ज्यों जोड़ि मन, सन्धे सन्धि मिलाय ॥ १८८ ॥ चित्त आग जो चमकिया, चहुँ दिशि लागी बाय। हरि सुमिरण हाथे घडा, वेगी लेहु बुझाय ॥ १८९ ॥ साच बिना सुमिरण नहीं, भेद विन भक्ति न सोय। पारसमें परदा रहा, लोह किमि कंचन होय ॥ १९० ॥ नाम विसारे देहकूँ, जीव दशा सब जाय। जबही छोड़े नामको, तबही लागे धाय ॥ १९१ ॥ कविरा सुमिरण सार है, और सकल जंजाल। आदि अंत मध सोधिया, दूजा देखा काल ॥ १९२ ॥ कंचन केवल हरि भजन, दूजा काँच कथीर। झूठा आल जंजाल तजि, पकड़ो साँच कवीर ॥ १९३ ॥ माला मोसे लड़ि पड़ा; क्या फेरत हो मोहि। मनका माला फेरिले, हरि मिलावै तोहि ॥ १९४ ॥ माला फेरत जुग गया, पाया न मनका फेर। करका मणिका छाड़िके; मनका मणिका फेर ॥ १९५ ॥ माला जपूँ न कर जपूँ, सुखसे कहुँ न राम। हरि मेरा सुमिरण

१ मेरा हरि मोको जप, में पाऊँ विश्वास।

शब्दावली

(२७३)

करै, मैं पाऊँ विश्राम ॥ १९६ ॥ राम नाम सतगुरु दर्दै, पवन सुरति सो पोय । बिन जिभ्या निशिदिन जपो, ब्रह्म जाप यों होय ॥ १९७ ॥ नाम लिया जिन सब लिया, सकल वेदका भेद । बिना नाम नरके पड़ा, पढ़ता चारू वेद ॥ १९८ ॥ ज्ञान कथी बक बक मरै, कहाँ करै उपाधि । सतगुरु हमसों यों कहा, सुमिरण करो समाधि ॥ १९९ ॥ राम सुमिरणी नामकी, मेरा मन मशगूल । छबि लागे निरखत रहौं, मिटि गा संशय शूल ॥ २०० ॥ राम नाम निज औषधी, सतगुरु दर्दै बताय । औषध खाय रु पथ रहै, ताको वेदन जाय ॥ २०१ ॥ यह औषध आगै लगी, केतिक उधरी देह । कोइक फेर कुपथ तना, ना तरि औषध एह ॥ २०२ ॥ पारस रूपी नाम है, लोह रूप संसार । पारस पाया पुरुषका, परखि परखि टकसार ॥ २०३ ॥ भजन भरोसे नामके, मगहर तज्यो शरीर । अविनासीके सेज पर, विलसे दास कवीर ॥ २०४ ॥ आदि नाम निज सार है, बूझि लेहु हो हंस । जिन जाना निज नामको, अमर भयो सो बंस ॥ २०५ ॥ आदि नाम निज मूल है, और मंत्र सब डार । कहै कवीर निज नाम बिन, बूडि सुआ संसार ॥ २०६ ॥ आदि नामको खोजहु, जो है सुकतिक मूल । ये जियरा जप लीजियो, सभै मता मत मूल ॥ २०७ ॥ कह कवीर निज नाम बिन, मिथ्या जन्म गवांय । निर्भय मुक्ति निःअक्षरा, गुरु विन कबहुँ न पाय ॥ २०८ ॥ पूंजी मेरी नाम है, जाते सदा निहाल । कविरा गरजै पुरुष बल, चोरी करै न काल ॥ २०९ ॥ जाके दिल अनुराग है, पावेगा नर सोय । विन अनुराग