कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
वाहीको ध्यान ॥ १२४ ॥ गुरुमुख गुरु आज्ञासे, छोड़ि देइ सब काम । कहे कवीर गुरुदेवको, तुरत करै परणाम ॥ १२५ ॥ उलटे सुलटे बचनको, शिष्य न माने दुःख । कहैं कवीर संसारमें, सो कहिय गुरुमुख ॥ १२६ ॥
अथ 'मनमुखका लक्षण ।
सेवक मुखहि कहावै, सेवामें टढ नाहि । कहैं कवीर सो सेवक, लख चौरासी मांहि ॥ १२७ ॥ फल कारण सेवा करे, निसदिन जांचे राम । कहै कवीर सेवक नहीं, चाहे चौगुन दाम ॥ १२८ ॥ सेवक स्वामी एक मत, जो मतिसे मति मिल जाय । चतुराई रीझे नहीं, रीझे मनके भाय ॥ १२९ ॥ सतगुरु शब्द उलंघिके, जो कोइ शिष्य जाय । जहां जायतहँ काल है, कहैं कवीर समझाय १३० गुरु सो करे कपट चतुराई । सो हँसा भव भरमे आई । जो जन गुरुकी निन्दा करई । झूकर स्वान गर्भमें परई ॥ १३१ ॥
अथ निगुराका लक्षण ।
नर निगुराके तीन गुण, भोपा भरडा भांड । रात राडाकी सेजमें, कहाँ पलापै राँड ॥ १३२ ॥ गुरु बिन माला फेरता, गुरु बिनु करता दान । गुरु बिन सब निष्फल गया, बूझो वेद पुराण ॥ १३३ ॥ जो निगुरा सुमरन करै, दिनमें सौ सौ बार । नगर नायका सत करै, जरे कौनकी लार ॥ १३४ ॥ गर्भ योगीश्वर गुरु बिना, लागा हरिके सेव । कहै कवीर बैकुण्ठसे, फेर दिया
१ मनमुख उसे कहते हैं कि, जो सतगुरु और महात्मा सत्पुरुषोंको बात कान न धर केवल मनके कहने पर चलता है और सत्पुरुषों को कृपासे विवेक उसे उन कर्मोंसे रोकता है तो भी उस पर ध्यान न देकर मन्द कर्मों में प्रवृत्त हो ही जात है । मन्द भोगोंमें प्रवृत्त रहनेवालोंको यदि वे भोग पहले कुछ कालतक अभूतके समान जान पड़ते हैं परन्तु पछोते वही अमृत विषरूप हो बिकराल दुःखरूपी राक्षसके स्वरूपको धारण कर पूर्ण नरका अनुभव कराते हैं और मनमुख पुरुष इन दुःखोंको देखता या अनुभव करता हुआ भी अपने मनके वश हुआ बारम्बार शिष्यासक्तिको प्राप्त होता है यन्मुख पुरुषको कुछ लज्जा, क्षय आदिक भी नहीं होते, कभी त्यागी, कभी गृही, कभी चोर, कभी साधु, कभी यति, कभी व्यभिचारी अनेक स्वार्थोंको धारण करता और अपनेको बड़ा बुद्धिमान्, न्यायी, धीर, साधु आदि विशेषणोंसे सम्पन्न जान अहंकारमें डूबा रहकर दूसरोंको निन्दा असुया किया करता है ।