भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 279, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 279

शब्दावली

(२६७)

सतगुरु दाय। और झूठ सब होय, काहेको भरमत फिरै॥ ११६ सतगुरु शरन न आवई, फिरि २ होय अकाज। जीव खोय सब जायँगे, काल तिहूँ पुर राज ॥ ११६ ॥ जो सतनाम समय, सतगुरुकी परतीति करि। यमको अमल मिटाय, हंस जाय सतलोक कहैं ॥ ११७ ॥ तत्त्व दर्शी जो होय, सो सत सार विचारई। पावै तत्त्व बिलोय, सतगुरुका चेला सोई ॥ ११८ ॥ जग भौसागर माहिं, कहो कैसे बूडत तरे। गहै नाम सतगुरु काहि, जो जल थल रक्षा करे॥ ११९ ॥ निज मत सतगुरु पास, जेहि पाय सब सुधि मिलै। जगत रहे उदास, ता कहैं क्यों नहिं खोजिये ॥ १२० ॥ यह सतगुरु उपदेश है, जो मानै परतीति। कर्म भर्म सब त्यागिके, चलै सो भव जल जीति ॥ १२१ ॥ सतगुरु तो सत भाव है, जो अस भेद बताय। धन्य शिष धन्य भाग तेहि, जो ऐसी सुधि पाय ॥ १२२ ॥

अथ 'गुरुमुख' लक्षण

गुरु मुख गुरु चित्तवत रहे, जैसे मणी भुवंग। कहैं कवीर बिसरे नहीं, यह गुरु मुखको अंग ॥ १२३ ॥ गुरु मुख गुरु चित्तवत रहे, जैसे शाह दिवान। और कर्वार नहिं देखता, है

१ जगतमें दो भाँतिके पुरुष होते हैं एक गुरु मुख, दूसरा मन मुख ॥

गुरु मुख वह है—जो अपने मनको सतगुरु सतपुरुषोंके आजा रीति भाँति चाल व्यवहारसे चलावे अर्थात् उनकी आजा और रीति यद्यपि प्रत्यक्षमें दुखदाई भी हो परंतु उसके अंतफलको सुखदायक समझके जेते हो सके वैसे मनको उनके अनुसार रखई ॥ इसमें कुछ सन्देह नहीं कि, सत्पुरुषोंके रीति उपदेश पर चलनेमें मन प्रथम कष्टको प्राप्त हो स्वच्छान्चारी बनना चाहिएा, परन्तु चलकरके मनको स्वतंत्रतासे रोक उसी तरफ लगाने फिर तो थोड़ेहो अभ्याससे मन चंचलताको छोड़ उसीमें प्रवृत्त होकर पूर्ण गुरुमुखताको धारण करेगा ॥

गुरु मुख बिना विचार नहिं करई।

जो कष्ट करै तासे नहिं टरई ॥

मन मत दो प्रकार घरम, है गृही अर साध।

दोहनको लाजिम है, गुरु मुख होहु अबाध ॥

परन्तु गुरु किते कहते हैं, यह भी सुनो कि जो शिष्यके शंकाओंको निवृत्त कर उतको उत्तम मार्ग पर लगाता हो तथा भयानक रोचक भूट बखेड़ोंमें फसाय केवल कानफूंक पूजा सालीनासे काम न रखता हो ॥