कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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करै, मैं पाऊँ विश्राम ॥ १९६ ॥ राम नाम सतगुरु दर्दै, पवन सुरति सो पोय । बिन जिभ्या निशिदिन जपो, ब्रह्म जाप यों होय ॥ १९७ ॥ नाम लिया जिन सब लिया, सकल वेदका भेद । बिना नाम नरके पड़ा, पढ़ता चारू वेद ॥ १९८ ॥ ज्ञान कथी बक बक मरै, कहाँ करै उपाधि । सतगुरु हमसों यों कहा, सुमिरण करो समाधि ॥ १९९ ॥ राम सुमिरणी नामकी, मेरा मन मशगूल । छबि लागे निरखत रहौं, मिटि गा संशय शूल ॥ २०० ॥ राम नाम निज औषधी, सतगुरु दर्दै बताय । औषध खाय रु पथ रहै, ताको वेदन जाय ॥ २०१ ॥ यह औषध आगै लगी, केतिक उधरी देह । कोइक फेर कुपथ तना, ना तरि औषध एह ॥ २०२ ॥ पारस रूपी नाम है, लोह रूप संसार । पारस पाया पुरुषका, परखि परखि टकसार ॥ २०३ ॥ भजन भरोसे नामके, मगहर तज्यो शरीर । अविनासीके सेज पर, विलसे दास कवीर ॥ २०४ ॥ आदि नाम निज सार है, बूझि लेहु हो हंस । जिन जाना निज नामको, अमर भयो सो बंस ॥ २०५ ॥ आदि नाम निज मूल है, और मंत्र सब डार । कहै कवीर निज नाम बिन, बूडि सुआ संसार ॥ २०६ ॥ आदि नामको खोजहु, जो है सुकतिक मूल । ये जियरा जप लीजियो, सभै मता मत मूल ॥ २०७ ॥ कह कवीर निज नाम बिन, मिथ्या जन्म गवांय । निर्भय मुक्ति निःअक्षरा, गुरु विन कबहुँ न पाय ॥ २०८ ॥ पूंजी मेरी नाम है, जाते सदा निहाल । कविरा गरजै पुरुष बल, चोरी करै न काल ॥ २०९ ॥ जाके दिल अनुराग है, पावेगा नर सोय । विन अनुराग