कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 286, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(२७४)
कवीरपंथी—
न पाइये, बूढ़ि मरै सब कोय ॥ २१० ॥ कविरा हमारे नाम बल, सात द्रौप नौ खंड । जम डरपे सब भय करै, गाजि रहै ब्रह्मण्ड ॥ २११ ॥ काल फिरि शिर ऊपरै, काल नजर नहि आय । कह कवीर गुरु शब्द गहू, यमसे जीव बचाय ॥ २१२ ॥ काल फिरि शर साँधिके, हाथ गहे कमान । कह कवीर गहि नाम निज, छाड़ु मान अभिमान ॥ २१३ ॥ आदि नाम निज पुरुषकी, सुनतहि तजु अभिमान । कह कवीर सुनु संत हो, तजो नरककी खान ॥ २१४ ॥ कोटि नाम संसारमें, ताते मुक्ति न होय । आदि नाम गुरु जाप जो, बूझै विरला कोय ॥ २१५ ॥ सोइ नाम संसारमें, उदित अमोल अपार । ता विन पार न पावई, बूढ़ि मुये संसार ॥ २१६ ॥ जस देखि फनपति मंत्र, राखै फनहि सिकोरि । तैसे बीरा नामते, कालरहै मुख मोरि ॥ २१७ ॥ जो जन होवे जौहरी, सो धन ले विलगाय । सोहं सोहं जपि मुये, मिथ्या जन्म गँवाय ॥ २१८ ॥ साखी पद संसारमें, कहन सुननको कीन्ह । चिट्ठी आई मूलते, सो धन लैहै चीन्ह ॥ २१९ ॥ सबको नाम सुनावहू, जो आवे तुव पास । शब्द हमारो सत्य है, दिठ राखो विश्वास ॥ २२० ॥ होय विवेकी शब्दका, जाय मिलै परिवार । नाम गहे सो पहुँचिहैं, मानहु कहा हमार ॥ २२१ ॥ आदि नाम पारस अहै, मनहै मैला लोह । परसतही कंचन भया, छूटा बंधन मोह ॥ २२२ ॥ सुरति समावे नामसे, जगसे रहै उदास । कहै कवीर गुरु चरणमें, दृढ राखै विश्वास ॥ २२३ ॥ यहि विधि करै किसानिया, पोता तलब न होय । भक्त मिलै कोइ