कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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बीरला, दाम देत नहीं सोय ॥२२४॥ मालिक हमारा नाम है, दरगाही परमान। शील संतोष आराम भौ, छाड़ि सकल अभिमान ॥२२५॥ यहि अवसर नहीं पाइहो, धरो नाव कडिहार। भवसागर तरिजाव तब, पलक न लगै बार॥२२६॥ आदि नाम बीरा अहै, जीव सकल ले बूझि। अमगवै सतलोक लै, यम नहि पावै सूझि ॥२२७॥ या धन सोई पाइहै, ज्ञान दृष्टि जेहि होय। ज्ञान बिना नहीं पावई, कोटि करै जो कोय ॥२२८॥ ज्ञान दीप प्रकाश करि, भीतर भवन जराय। बैठे सुमरे पुरुषको, सहज समाधि लगाय ॥२२९॥ अछय बृक्षकी डोर गहि, सो सतनाम समाय। सत्य शब्द प्रमाण है, सत्यलोक कहँ जाय ॥२३०॥ एक नामको जानिके, मेटै कर्मके अंक। तबही सो सचु पाइहै, जब जिव होय निशङ्क ॥२३१॥ कोइ न यम सो बाचिया, नाम बिना धरिखाय। जे जन विरही नामके, ताको देखि डराय ॥२३२॥ कर्म करै देही धरै, औ फिरि फिरि पछताय। बिना नाम बांचे नहीं, जिव यमरा लै जाय ॥२३३॥ नाम गहै धन धाम तजि, नरनारी जोकोइ। अविचल महिमायें बसै, अविचल आपैहोइ ॥२३४॥
सोठ्ठा ।
सतगुरु का उपदेश, सत्य नाम निज सार है। यहि निज मुक्ति संदेश, सुनो संत सत भावसे ॥२३५॥ तरे जो नाम समाय, बिन स्थिति सब जग बूढिया। उबरे एक उपाय सतगुरुके उपदेश गहि ॥२३६॥ क्यों छूटे जमजाल, बहु वन्दन जिव बांधिया। काटै दीनदयाल, कर्म फन्द एक नाम