कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
शब्दावली
(२७५)
बीरला, दाम देत नहीं सोय ॥२२४॥ मालिक हमारा नाम है, दरगाही परमान। शील संतोष आराम भौ, छाड़ि सकल अभिमान ॥२२५॥ यहि अवसर नहीं पाइहो, धरो नाव कडिहार। भवसागर तरिजाव तब, पलक न लगै बार॥२२६॥ आदि नाम बीरा अहै, जीव सकल ले बूझि। अमगवै सतलोक लै, यम नहि पावै सूझि ॥२२७॥ या धन सोई पाइहै, ज्ञान दृष्टि जेहि होय। ज्ञान बिना नहीं पावई, कोटि करै जो कोय ॥२२८॥ ज्ञान दीप प्रकाश करि, भीतर भवन जराय। बैठे सुमरे पुरुषको, सहज समाधि लगाय ॥२२९॥ अछय बृक्षकी डोर गहि, सो सतनाम समाय। सत्य शब्द प्रमाण है, सत्यलोक कहँ जाय ॥२३०॥ एक नामको जानिके, मेटै कर्मके अंक। तबही सो सचु पाइहै, जब जिव होय निशङ्क ॥२३१॥ कोइ न यम सो बाचिया, नाम बिना धरिखाय। जे जन विरही नामके, ताको देखि डराय ॥२३२॥ कर्म करै देही धरै, औ फिरि फिरि पछताय। बिना नाम बांचे नहीं, जिव यमरा लै जाय ॥२३३॥ नाम गहै धन धाम तजि, नरनारी जोकोइ। अविचल महिमायें बसै, अविचल आपैहोइ ॥२३४॥
सोठ्ठा ।
सतगुरु का उपदेश, सत्य नाम निज सार है। यहि निज मुक्ति संदेश, सुनो संत सत भावसे ॥२३५॥ तरे जो नाम समाय, बिन स्थिति सब जग बूढिया। उबरे एक उपाय सतगुरुके उपदेश गहि ॥२३६॥ क्यों छूटे जमजाल, बहु वन्दन जिव बांधिया। काटै दीनदयाल, कर्म फन्द एक नाम
(२७६)
कवीरपंथी—
सो ॥ २३७ ॥ मिटै कर्मको अंक, जब सतनाम ध्यावही । होय जीव निःशंक, सत्य बचन सतगुरु कहे ॥ २३८ ॥ छोड़हु यमके फन्द, जेहि फन्दे जग फँदिया । कटे तो होय आनन्द, नाम खडग सतगुरु दिये ॥ २३९ ॥ तजै काक की देह, हंस दशाकी सुरति पर । मुक्ति संदेशा ऐह, सतनाम प्रमाण अस ॥ २४० ॥ सतनाम विश्वास, कर्म भर्म सब परि हरे । सतगुरु पुरवे आस, जो निराश आशा करै ॥ २४१ ॥
गजल प्रार्थना ।
गुरु सेवामें अपनी लगालो मुझे । आवा गवनके दुखसे छुड़ा दो मुझे ॥ जन्म मरण गर्भ वासके, सहि दुख बारम्बार । न्या-कुल हो आयो शरण, मोहिं करो भव पार ॥ सतनाम कृपा कर सुना दो मुझे । गुरु सेवामें अपनी लगालो मुझे ॥ १ ॥ खान पान सुख भोगमें, मैं अरुझा अज्ञान । चञ्चल मन अस्थिर नहीं, केहि विधि हो कल्यान ॥ कोई योगकी युक्ति बता दो मुझे । गुरु सेवामें अपनी लगालो मुझे ॥ २ ॥ काम कोभ मद दंभ छल, झूट कपट व्यभिचार । इनसे मोहिं बचाइये, दीजे काज सुधार ॥ शुभ ज्ञान की नीति सिखा दो मुझे । गुरु सेवामें अपनी लगालो मुझे ॥ ३ ॥ साधु संतसे प्रीति हो विषय विकार हो नाश । सत्य ज्ञान हिरदे बसे, होय परख प्रकाश ॥ साधन चारों परि पूर्ण करा दो मुझे । गुरु सेवामें अपनी लगालो मुझे ॥ ४ ॥ भगवान्दास बिनती करे, प्रेम नयन वहे नीर । तुम
शब्दावली
(२७७)
समान को जगतमें, करूणासिन्धु कवीर ॥ यही आस विश्वास दिखा दो मुझे । गुरु सेवामें अपनी लगालो मुझे ॥६॥
सद्गुरुस्तुतिः ।
सर्वमंगलमांगल्यं सर्वविघ्नविनाशनम् । अधमोद्धारणं देवं सद्गुरुं प्रणामाम्यहम् ॥ १ ॥ यं सर्वेश्वरदेवं ही स्तुवन्ति सततं सुराः । ध्यायन्ति मुनयश्चापि तं गुरुं प्रणामाम्यहम् ॥ २ ॥ शश्वज्जन्म-जरामयाधिनिधनेर्दुःखैः सदा पीडितान् दृष्ट्वा प्राणभूतः कुशेश-यदले स्वैरं च धृत्वा वपुः । शास्त्राणि प्रविगाह्य बीजकसुधा-ज्ञानं च तेभ्यो ददौ तं वन्दे शिरसा प्रणम्य चरणौ वीरं कवीरं गुरुम् ॥ ३ ॥ नित्यानन्दस्वरूपो यो मायातीतो महोदयः । सच्छास्त्रविषयः साक्षात्कवीरं प्रणतोऽस्म्यहम् ॥ ४ ॥ नमः श्रीधर्मदासाद्यमहासुन्यन्तसत्मान् । द्विचत्वारिंशदाचार्यान् भूतभ्यमविष्यतः ॥५॥ अकलितमहिमानं पूर्णकामं कृपालुं । धृतमनुजशरीरं भक्तसन्तारणाय ॥ सुरसुनिगणवन्धं दिव्यदेहा-भिरामं । हृदयतिमिरभानुं सत्कवीरं स्मरामः ॥ ६ ॥
अर्थ—अगणितमहिमावाले, पूर्णकाम, दयायुक्त, भक्तलोगोंके उद्धार करनेके लिये मनुष्यशरीर धारण करनेवाले, देवता और सुनिगणोंसे वंदनीय, दिव्यदेह करके मनोहर, हृदयान्धकारको नाश करनेके लिये सूर्य ऐसे सत्कवीर को हम लोग स्मरण करते हैं॥
इति श्रीकवीराश्रमाचार्य परमार्थो वैद्य भारतपथिक स्वामी श्रीयुगलानन्दविहारी निर्मित कवीरपथो शब्दावली अन्तर्गते स्तोत्रदर्शन द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
सत्यनाम
सत्यसुकृत आदि अदली अजर अचिन्त पुरुष मुनीन्द्र कृष्णमय कवीर सुरति योग सन्तायन धनी धर्मदास की दया सर्व सन्त महन्तोंकी दया ।
कवीरपंथी--शब्दावली ।
तीसरा खण्ड-अध्यात्म साधन ।
गुरुपूजा प्रकरण ।
वन्दौ सत्य कवीरके, युगल चरण शिरनाय । धर्मदास वन्दन करूं, सुकृतको बलपाय ॥ १ ॥ शब्दावलिको खण्ड यह, तीसर जान सुजान । गुरु पूजा चौका विधि, सबही करों बखान ॥ २ ॥
उछाह मङ्गल (पधराबनी) के शब्द ॥ मंगल ।
आज मेरे साहब आये मिहमान । तन मन जिव करूं कुर- बान ॥ टेक ॥ प्रेमको पलंगा बिछाऊँ आय । चरण पखारि चणों- मृत पाय ॥ १ ॥ भाव सहित भोजन कई सारा । तुरतहिं करूं लगे न बारा ॥ २ ॥ कहा करूं कुछ सर भर नाय । तीन- लोक पासंगमें जाय ॥ ३ ॥ ज्ञानकी पटरी सुरतकी डोर । आज मोरे सतगुरु झुले हिंडोर ॥ ४ ॥ धरमदास आमिन समुझाय । भगति करो तुम सुरत लगाय ॥ ५ ॥
मंगल (पधराबनी) ॥
आज मोरे सतगुरु आय मिहमान । तन मन जीव करूं कुरबान ॥ टेक ॥ सतगुरु आय मैं फूली न सामोंव । देखि
शब्दावली
(२७९)
दीदार मगन है जाँव ॥ १ ॥ प्रेमको पलंगा देउं विछाय । चरण परछालि चरणामृत पाय ॥ २ ॥ भाव सहित भोजन कहूं सार । तुरत करो कछु लागै न बार ॥ ३ ॥ चौका चन्दन तुरति बनाय । सतगुरु जहाँ बैठे आय ॥ ४ ॥ धर्मदास या मन समु- झाय । भक्ति करो तुम सुगति लगाय ॥ ५ ॥ कह कवीर सुनो धर्मदास । केवल नाम गहो विश्वास ॥ ६ ॥
मंगल उछाह ॥
मोरे जिवरे सुख परम अनन्द । आज साहब मोड आवैगे ॥ टेक ॥ सखी काहि आँगन लिपायऊ । काहिको सखी चौक पुरायऊ ? ॥ १ ॥ सखी आँगन चन्दन लिपायऊँ । गजमोति- यनको सखि चौक पुरायऊँ ॥ २ ॥ सखि काहेको डारो बैठनो । काहेको चरनामृत लेउ ? ॥ ३ ॥ तन मन डाहूं बैठना । चरन- नको चरनामृत लेउ ॥ ४ ॥ सखि आँगन बोऊँ इलायची । मोरे फलसे सुख अम्बर बेले ॥ ५ ॥ सखि उंची पाल समुद्रकी । तले बहे जमुना नीर ॥ ६ ॥ सखि ऊँचे चढ़ि देखहूँ । मोर साह- बको रथ केतिक दूर ॥ ७ ॥ सखि सब वृन्दावन हूँडिया । मोहि मिलिया त्रिकुटिके तीर ॥ ८ ॥ सखि भक्ति हेतुके कारने । मोपै दया करी बन्दीछोर कवीर ॥ ९ ॥
मङ्गल उछाह ॥
आज घडी हो मेरे आनंदकी । सतगुरु आये मोरे धाम ॥ टे० ॥ आइया गुरुदेव सजनी, भयो, हरष अपार हो । सकल सुन्दरि साज आरति, होत मंगल चार हो ॥ १ ॥ दियो दरस परभाव सतगुरु, सुना सखी अमोल हो । अच्छे छाया सघन घनकी, करत हंस किलोलहो ॥ २ ॥ दया करी नाह निरगुन, अपनी कर लीन हो । भक्ति मुक्ति सनेह सजनी, लीन प्रीतम
(२८०)
कवीरपंथी—
चीन्ह हो ॥ ३ ॥ भयी है कलिविष दूर तनकी, गयी है तपन नसाय हो । अटल पंथ कवीर दीनो, धर्मदास लखाय हो ॥४॥
मङ्गल उछाह ॥
भल आय सतगुरु मैं बलि जावैं । आतम अन्ध जगाइया ॥८६॥ १॥ भूले आतमको भरम मिटाय । लख चौरासीको बन्द छुटाय ॥ २ ॥ आतम तब उत्तरन पाय । कोटि कर्म फन्द काटो आय ॥ ३ ॥ पूरन चन्दा सतगुरु परग आय । नौलख तारा गये छिपाय ॥ ४ ॥ पूरे गुरुकी पूरन कला । और कला न दीसे भला ॥ ५ ॥ और कला त्रिगुनकी ओप । सतगुरु कला परम संतोष ॥ ६ ॥ यहि कला मन राखो थीर । जनम जनमको मेटो पीर ॥ ७ ॥ दस मास जननी भरि बोझ । भक्ति विना भये बनके रोझ ॥ ८ ॥ कहै कवीर जग जीत ले साल । सतगुरु सुमिरो दीन दयाल ॥ ९ ॥
मंगल उछाह ॥
धन सतगुरु जिन दियो उपदेश । भव बूडन गहि राख्यो केश ॥ ८७ ॥ १ ॥ साकटसे गुरु वैष्णव कीया । सत्य नाम सुमिरनको दीया ॥ २ ॥ जाति वरन कुल भरम मिटाय । साधु मिले तब साधु कहाय ॥ ३ ॥ पारस परसे कंचन होय । वाको कहै न कोय ॥ ४ ॥ पारसके गुन देखो आय । कंचन महेगे मोल विकाय ॥ ५ ॥ स्वाति बुन्द के दलीमें परे । रूप रंग कछु औरहि धरे ॥ ६ ॥ नाम कपूर बासना होय । केदली वाको कहै न कोय ॥ ७ ॥ निसदिन सुमिरो एकै नाम । जा सुमिरेते दिठ होय करम ॥ ८ ॥ कहै कविर यह सांचो खेल । फूल तिलिल मिलि भयो फुलेल ॥ ९ ॥
मंगल उछाह ।
आजके दिवस को मैं वारने जाऊँ । वारने जाऊँ बलि हारने
शब्दावली
(२८१)
जाऊँ ॥ टेक ॥ सतगुरु साहब आय मोरे पाहुन । घर आँगना मोहि लगे सोहाउना ॥ साधु संत मिलि लगे मंगल गावन ॥१॥ होय मगन गुरु चरनन पर छाँलूँ । चरन परछाँलूँ गुरु के वदन निहाँलूँ ॥ तन मन धन सतगुरु पर वारूँ ॥ २ ॥ जादिन आय साधु धन दिन सोई । होत आनन्द परम सुख होई ॥ सतगुरु मिलि मोरि डुरमत खोई ॥ ३ ॥ सुरति लगा सतनामकी आसा । कहैं कविर दासनके दासा ॥ साधु संत मिलि काटो जम फाँसा ॥ ४ ॥ ❁
मंगल उछाह ॥ धुन ॥
राग सारंग (समय मध्याह्न काल)
भाग जाके संत पाहुने आवे । द्वारे कथा कीरतन करहिं, हिलमिल मंगल गावें ॥ टे० ॥ काम कोध मद मान कल्पना, दुर्मति दूर बहावें ॥ राग द्वेष परनिन्दा तजिके सत उपदेश, दिखावें ॥ १ ॥ प्रथम लाभ चरनोदक लैकरि, जो कोई सीस चढावे ॥ कोटिन तीरथको फल सहजहिं, सो घर बैठे पावे ॥ २ ॥ खीर खाण्ड पकवान मिठाई, लखि नहिं हेत बढावें ॥ रुखा सूखा शाक पत्र अति, हितसे भोग लगावें ॥ ३ ॥ महाप्रसाद देवनको दुर्लभ, सन्त सदा सो दै पावे ॥ दुष्ट सदा दुर्मतिके घेरो, मिथ्या जन्म गवाँवें ॥ ४ ॥ गुरु प्रतापसे पूरवके सुकृत, कर्म उदय हो जावें ॥ कहैं कवीर साधु मूरति धरि, साहब दरश दिखावें ॥ ५ ॥
अथ छत्तीस गढी कामचलाक चौकी विधानकी पद ॥
शब्द व्यंजनभोग ।
सत्तनामको भोग लागे, शब्द अनाहद घंटा बाजेहो ॥ प्रेम सुरतिसे करो रसोई । अमृत भोजन पारस होई ॥ कंचन झारी अविगत थार । सत्यसुकृत जहाँ करै जेवनार ॥ जेवहि साहब संत सब संगा ।
• इस प्रकार सतगुरुकी पधरावनी आरतीसहित करना चाहिये । पश्चात् चरण पवार चरणामृत लेना चाहिये ॥
(२८२)
कवीरपंथी—
गावहिं दास जो परम अनंदा ॥ पाय प्रसाद जल अचवन कीन्हा। महाप्रसाद दासको दीन्हा ॥ जाते काल भयो आधीना ॥ जबसे हंस भये परवीना ॥ कहैं कवीर पूरन भये भाग । जब सतगुरु मस्तक दिये हाथ ॥
॥ धुन ॥
सतके भोग दयाके व्यंजन तुमको मालुम होय । महा पुरुष मानिये निज सोय ॥
इंगला पिंगला चौका पोते, छिमा मंत्र निज डार । बलकी फूंक अकलकी आंगी, चाहके चूल्ह सँवार ॥ दिलदायाकी दाल बनाये, लक्षके नोन मिलाय । मनसा हींग डार व्यंजनमें, चहुँ दिस बास उडाय ॥ भाव भक्ति घृत निर्मल नीरा, दिल गड़वा जल डार । सतसुकृत जहां भोजन पावैं, घर मानिक उजियार ॥ आसन मूल बैठ हठ अविचल, सुखमन बाव डोलाय । सुतं नितं दौय पाट सँवारे, संत परोसैं आय ॥ सकल संत मिल आरती उतारैं, गावैं मंगल चार । कहैं कवीर जिन सतगुरु सेवा, सो सतलोक सुधार ॥
शब्द गारी ।
देहु न देहु प्रभुजन अपनेको, समर्थके गुन गाऊँ केहांजू ॥ गगनमंडल मोरे सजन बसत हैं, उनहुँको नेवत बुलाऊँ केहांजू ॥ काम कोध मद लोभ पांवडे, भीतर भवन बिछाऊँ केहांजू ॥ नैननके जल चरन पखारों, चित चौकी बैठाऊँ केहांजू ॥ करनीके पातर कथनीके दोना, सारखीके सीक लगाऊँ केहांजू ॥ भावको भात औ दार दयाको, शब्दके बरा बनाऊँ केहांजू ॥ मनसा मांडे सरस बनाऊँ, प्रेमके घृत चुवाऊँ केहांजू ॥ सतके दूध करनीके खोवा, शक्रर सुमत मिलाऊँ केहांजू ॥ यह सुख पाय जेवैं सजन हमारे, स्वासाके बाव टुलाऊँ केहांजू ॥ सीसा सार भरे जल अमृत,
शब्दावली
(२८३)
सो अचवन करवाऊं केहांजू ॥ पांच पचीस पकर नौ नारी, सजनको गारी गवाऊं केहांजू ॥ तत्त्व तमोलिन सुधर सुमतिले, सजनको बिरियां खवाऊं केहांजू ॥ एकईस खंड महलके भीतर, निरभय पलंग बिछाऊं केहांजू ॥ शील संतो खवास हमारे, सजनके चरन दवाऊं केहांजू ॥ धर्मदास कहे साहब मोरे, मुक्ति मनोरथ पाऊं केहांजू ॥
शब्द अचवन ।
सेवक लिये प्रेम जलझारी, खरचा ब्रह्म ज्ञान । सो अचवन कीजे गुरु कृपा निधान ॥ भाव भक्तिसों बीरा लीजे संतन जीवन प्रान. महाप्रभु । अमी उगार दासको दीजे जिनको परम कल्यान ॥ सो अचवन कीजे गुरु कृपा निधान ॥ हृदयकमल बिच पलंग बिछाऊं पौढें पुरुषपुरान. महा० ॥ चरनकमलकी सेवा करिहों दासातन परमान । सो अचवन कीजे गुरु कृपा निधान ॥ सुरतके बिजना डोलाऊं मैं ठाडी । एक टक लागों ध्यान. महा० ॥ धर्मदास पर दायी कीजे पूरन पद निर्बान । सो अचवन कीजे गुरु कृपा निधान ॥
शब्द विजना ।
मेरे सतगुरु आये द्वारको रसको बिजना । काहेके बैठक देउं सुरत रसको बिजना ॥ चंदन पिठिया गुरु बैठका रसको बिजना । नीरन चरन पखारों सुरत रसको बिजना ॥ भात रिंधों रस दूधमें रसको बिजना । धोय मूंगके दार सुरत रसको बिजना ॥ काहेके थार परोसों हो रसको बिजना । काह कटोरन दूध सुरत रसको बिजना ॥ सोनेके थार परोसों हो रसके बिजना । रूप कटोरियन
(२८४)
कवीरपंथी-
दूध सुरत रसको बिजना ॥ जेईलेव सतगुरु पाहुना रसको बिजना । मुखभर देहु अशीस सुरत रसको बिजना ॥ पाथरको का पूजनी रसको बिजना । मुख बोले ना खाय सुरत रसको बिजना ॥ सांचे पूजहु साधुको रसको बिजना । मुख बोले ओ खाय सुरत रसको बिजना ॥ खाय पाय मुख सेजमें रसको बिजना । करले शब्द शृंगार सुरत रसको बिजना ॥ पानन बिरियां खवाऊं हो रसको बिजना । दोउ कर चरन दबाय सुरत रसको बिजना ॥ बिजना बिजना सब कोई कहे रसको बिजना । बिजना लखे न कोय सुरत रसको बिजना ॥ कहैं कवीर धर्मदाससों रसको बिजना । रहत अमरपुर छाय सुरत रसको बिजना ॥
भोगकी आरती ।
सुमरन भजन आरती पूजा, सनमुख करले सेव । सिर पर राखिये हो, सोई परम गुरुदेव ॥ अजपा जाप जपो बिन जिह्वा- मूलमंत्र आराधि । अस्थिर ध्यान अमर हृद अविचल, लागी सहज समाधि ॥ मानसरोवर मंजन करले, त्रिबेनीको घाट । अनहद धुन सुन पांचों मोहे, खुलगये ज्ञानकपाट ॥ बिन नदिया बिन नावरी, गुरु अघर उतारे पार । शब्द सिंढी ऊपर ले राखो, घरही है निज द्वार ॥ चांद सूर निसि वासर नाहीं, नाहिंन विद्या बेद । साहब कवीर भये जहां गुरुमुख, बिरले पावहि भेद ॥
चौकाकी रमनी ।
प्रथमहिं मंदिर चौक पुराये । उत्तम आसन श्वेत बिछाये ॥ हंसा पग आसन पर दीन्हा । सतकवीर कही कह लीन्हा ॥ नाम प्रताप हंस पर छाजे । हंसहि भार रती नहिं लागे ॥ भार उतार आप सिर लीन्हा । हंस छुडाय कालसों लीन्हा ॥ साधसंत मिलि बैठे आई । बहु बिध भक्ति करे चितलाई ॥ पान सुपारी नारियर केरा । लौंग लायची किसमिस मेवा ॥ सवा सेर आनो
शब्दावली
(२८५)
मिष्टाँना । सत सवासा उत्तम पाना ॥ सात हाथ बस्तर परवाना । सो सतगुरुके आगे आना ॥ इतना होय और नहीं भाई । जासों काल दगा मिट जाई ॥ धन्य संत जिन आरति साजा । दुख- दारिद्र वाके घरसे भागा ॥ कहें कबीर सुनो धर्मदासा । ओहँ सोहँ शब्द प्रगासा ॥
साखी-चौका चन्दन कीजिये, मलयागिरको नाम ।
चारो कमल सुधारहू, मध्य ताहिको धाम ॥ १ ॥
उग्र ज्ञानका कहों संदेशा । धर्मदास मानो उपदेशा ॥ धर्मदास मानो चितलाई । रहो ठीका पर उचट न जाई ॥ अजर लोकमें आरती कीन्हा । सो आरती हम तुमको दीन्हा ॥ जा घर आरती नाहिन साजी । ता घर धर्मरायके बाजी ॥ जा घर आरती करो बनाई । निरभै हंस लोकको जाई ॥ कोटिन ज्ञान कथे नर लोई । बिन आरती बांचे नहि कोई ॥ अजर जोत आरती परकाशा । दूत भूत जम मानै त्रासा ॥ कहें कबीर सुनो धर्मदासा । हँसा पावे लोक निवासा ॥
साखी-कलस आरती दल शिला, नरियर पान मिष्ठान ।
पुंगी फलपुष्प लौंग लायची, शब्द भजन धुन ध्यान २॥
धर्मदास तुम पंथ उजागर । अरपो दल परसो सुखसागर ॥ चंदन चौका रचो बनाई । सत सुकृत जहां बैठे आई ॥ सतबारीकै फूल मँगावा । सो सतगुरुको आन चढावा ॥ धर्मदास उठ बिनती कीन्हा । हो सतगुरु हम तुमको चीन्हा ॥ जो तुम कहो मानलेउं सोई । तुम गुरुछोड और नहि कोई ॥ कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । बीरा नाम करो परकाशा ॥
सा०-लौंग इलायची नारियर, आरती धरो लेसाय ।
कहें कबीर धर्मदास सों, काल दगा मिट जाय ॥ ३ ॥
(२८६)
कवीरपंथी-
धर्मदास तुम बीरा लेहू । जंबूद्वीपके जीवन देहू ॥ मैं का जानो पंथके आदी । जंबूद्वीप बसे बकबादी ॥ पढे वेद औ करे अचारा । वे नहि माने शब्द तुम्हारा ॥ जो नहि माने शब्द हमारा । सो चलि जैहै जमके द्वारा ॥ जो कोइ माने शब्द हमारा । सो चल अइहै लोक मंझारा ॥ अंतर कपट करे मन माहीं । ताको लोक पहुंच नहि जाहीं ॥ कहैं कवीर सुनो धर्मदासा । बीरा नाम करो परकाशा ॥
सा०—अंसरेख सुर सीखको, गुरु स्वांसा घर एक ।
तामो नरियर मोरहु, टूटे विघ्न अनेक ॥ ४ ॥
चौकाके पद ।
भक्ति सतगुरु आनी संतो, कोई बूझे पंडित ज्ञानी संतो ॥ पाहन फोर गंग एक निकसी, चहुँ दिस पानी पानी । वा पानी दोय पर्वत बूढे, दरिया लहर समानी ॥ उठ माखी तरवर पर बैठी, बोले अमृत बानी । वा माखीके मक्खा नाहीं, गर्भ रहा बिन पानी ॥ राई बरोबर वस्तु हमारा, अर्ध राई अस्थूला । लहर लहर वह घट बिच होवे, सोई पुरुष निज मूला ॥ नारी एक सकल जग जायो, ताते रहत अकेला । कहैं कवीर यह पद को बूझे, सो सतगुरुका चेला ॥ १ ॥
गुनका भेद न्यारा न्यारा, कोई जानेगा जाननहारा ॥ सोई सुन्दर जाके पियको, बरत है अज्ञाकारी होई ॥ और सकल सब श्वान कूकरी, सुंदर बदन ना होई ॥ सोई गजराज राजकुल मंडन, जाके मस्तक मोती ॥ और सकल सब भार लदनुवाँ, महिषासुरके गोती ॥ सोई भुजंग जाके मस्तक मनि, मनि उजियारे खेले ॥ और सकल सावनके केंचुवा, जगत पांउतर डोले ॥ सोई पर्वत
शब्दावली
(२८७)
सुमेर उजागर, अष्टौ धात निवासा ॥ और सकल पाखान बरोबर, टांकी अगिन प्रकाशा ॥ कहैं कवीर सोई जन गुरुवा, नाम भजन अधिकारी ॥ और सकल साहबका बाना, देखो तत्त्व विचारी ॥
साखी-जो रचना है लोकके, सो चौका विस्तार ।
की बैठे निज बिंदसुत, की पूरा कंडिहार ॥ २ ॥
चीन्हो रे नरलोई सतगुरु ।
जासों मिटे तेरो जनम जोयनी, आवागमन न होई ॥ गुरु जगतमें बहुत कहावै, मंत्र देत हैं काना ॥ उपजे बिनसे औसागरमें, भेद यरम नहि जाना ॥ बेद पुरान भागवत गीता, सब मिल रही डिठाई ॥ धन सोई जीवसुफल सोई प्रानी, निज पूरे गुरुपाई ॥ चौर औ साहु जगतमें व्यापे, जो लखपावै कोई ॥ सांचे मिलै तवै सुख उपजे, तनके तपन बुझाई ॥ सांचे एक जगतमें सतगुरु, भौतारन कंडिहारा ॥ कहैं कवीर सब जगके गुरुवा, मर मर ले औतारा ॥
साखी-द्वादश दल जहां रचिके, करहु प्रेम परकाश ।
मध्यक्षेत्र विस्तारहु, अंक नाम विश्वास ॥ ३ ॥
गगनमंडलका बासा संतो, जहां देखो अजब तमासा संतो ॥ गढ़ मेरो गगन सुरत मेरो चौका, चेतन चँवर डुरावै ॥ इंगला पिंगला सुषुमन नारी, अनहद बेन बजावै ॥ अष्ट कमल दल पंखुरी बिराजे, उलटा ध्यान लगावै ॥ पांचपचीस एक घर लावौ, तब धुनकी सुध पावैं ॥ त्रिकुटी घाट अस्नान जो करले, रबि शशि सुषमन होई ॥ हंसा केल करत राजन संग, एक महलमें दोई ॥ विन बादल जहां बिछुली चमके, बिना सीपके मोती ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू, निरखहु निरमल ज्योती ॥
(२८८)
कवीरपंथी—
साखी-जापर बसे निह अक्षर, ताहि पवनके नाम ।
शब्द सुधारस खान है, हम तुम ताही धाम ॥ ४ ॥
अब हम अविगतसे चलिआये । काहू भेद भरम नहीं पाये ॥ ना हम जनमें गरभ बसेरा, बालक होय खिलाये ॥ काशी शहर जलहि बिच डेरा, तहाँ जुलाहा पाये ॥ हते विदेह देहधर आये, काया कवीर कहाये ॥ बस हेत हंसनके कारन, रामानंद समुझाये ॥ ना मोरे गगन धाम कछु नाहीं, दीसत अगम अपारा ॥ शब्द स्वरूपी नाम साहबका, सोई नाम हमारा ॥ ना हमरे घर मात पिता है, नाहीं हमरे दासी ॥ जात जोलाहा नाम धराये, जगत कराये हांसी ॥ ना मोरे हाड चाम ना लोहू, हौ सतनाम उपासी ॥ तारन तरन अभय पद दाता, कहैं कवीर अविनासी ॥ ५ ॥
होत अनंद अनंद भजनमें ।
बरषत शब्द अमीकी बादर, भीजत हैं कोई संत ॥ अग्रवास जहाँ तत्त्वकी नदियाँ, मानो अठारा गंग । कर अस्नान मगन है बैठे, बढ़त शब्दके रंग ॥ पियत सुधारस लेत नामरस, चुवत अग्रके बुंद । रोम रोम सब अमृत भीजे, पारस परसत अंग ॥ श्वासा सार रचे मोरे साहब, जहाँ न माया मोहंग । कहैं कवीर सुनो भाई साधू, जपो सोहंग सोहंग ॥
साखी-रामनरायन जगत गुरु, करें बोध संसार ।
वचन प्रतापसे ऊबरे, भौजलमें कडिहार ॥ ६ ॥
दर्शन देहु कवीर अब मोहिं ।
अघ तम पुंज दहन रवि भासत, निरमल होत शरीर ॥ श्वेत कमल पुरयनपर चौका, कर्मके कागद चीर । सुमरन करके दल तहाँ धरिया, सीतल जल हल नीर ॥ हंस बोलाय पुरुष जब लीन्हा, दीन्हो अंमर चीर । अमृत भोजन हंसा पावे, शब्द दूधके खीर ॥
शब्दावली
( २८९ )
सेज्या पुष्प श्वेत सिंघासन, माथे छत्र मनि हीर । कहें कवीर सुनो भाई साधू, सुमरण करो अस्थीर ॥
साखी-चार गुरु संसारमें, धर्मदास बड़ अंस ।
मुक्तराज तुमको दिये , अटल बयालिस वंश ॥ ७ ॥
पदचोरी ।
शब्द सिंघासन पाटमें, तुम हंसा बैठो आये हो । कौन नाम मुक्तामनी, कौन नाम वे अंस । कौन नाम वे पुरुष हैं, कौन नाम वे हंस ॥ अजर नाम मुक्तामनि, उग्रनाम वे अंस । ज्ञानी नाम वे पुरुष हैं सुतं, नाम वे हंस ॥ मूलद्वीप निज द्वीप है, और सुनो हम पांह । बैठे हंस उबारही, सोहंगमके बांह ॥ जंबुद्वीपके हंसा भाई, पांजी बैठे आय । कहें कवीर धर्मदास सो, तुम लावहु बांह चढ़ाय ॥
साखी-हंसा छूटे बाज जों, कोट सिंघका जोर ।
सुमरन दीनदयालका, पहुँच गया निज ठौर ॥ १ ॥
नाम सनेह न छाड़िये, भावे तन मन धन जरजाय हो ॥ पानीसे पैदा किया, नख सिख सीस बनाय । वह साहबको विसारिया, तेरो गाढो होत सहाय ॥ महल चुने खाई खने, ऊंचे ऊंचे धाम । जब जम बैठे कंठमें तेरो, कोई न आवे काम ॥ मात पिता सुत बंधुवा, और दुलारी नार । यह सब हिलमिल बीछुरे, तेरी शोभा है दिन चार ॥ जैसे लागी औरसे, दिन दिन दूनी प्रीत । नाम कवीर न छाड़िये, भावे हार होयके जीत ॥
साखी-उनमुनि चढी अकाशमें, गई गगनमें छूट ।
हंस चलासो जात हैं, काल रहा सिरकूट ॥ २ ॥
अबकी बेर उबारिये मेरी अर्जी दीनदयाल हो ॥ आई थी
कवीरपंथी शब्दावली १ ०
(२९०)
कवीरपंथी—
वही देशसे, भई परदेशी नार । वह मारगमें भूलिया, बिसर गई निज नाह ॥ जुगन जुगन भरमत फिरे, जमके हाथ बिकाय । करजोरि बिनती करो, माहि मिलके बिछुर मत जाव ॥ विषम नदी बिकराल है, वाहित करिया धार । मोह मगरके घाटमें, खाये सुर नर झार ॥ शब्द जहाज कवीरका, सतगुरु खेवनहार ॥ कोइ २ हंस उबारहीं, पलमें लेहिं गोहार ॥
साखी—चली जु पुतली नोनकी, थाह सिन्धुकी लैन । आपन गल पानी भई, उलट कहे को बैन ॥ ३ ॥
कौन मिलावै जोगिया, जोगिया विन रहो न जाय हो ॥ हों हरनीं पिय पारथी, मारा शब्दका बान । जाहि लगे सो जानिया, और दरद नहिं आन ॥ पिय कारन पियरी भई, लोग कहे तन रोग । जप तप लंघनमें करो, पिया मिलनके योग ॥ हुं तो प्यासी पीव की, रटों सदा पिव पीव । पिया मिले तो जीविहों, ना तो (सहजे) त्यागों जीव ॥ कहैं कवीर सुन जोगिनी, तनही में मनही समाय । पिछली प्रीतके कारने, (जोगी) बहुरि मिलेंगे आय ॥
साखी—अस बीरा प्रताप बल, प्रबल काल ते होय ।
जेह सतगुरु बहियां मिले, हंस न जाय बिगोय ॥ ४ ॥
हंसा डुरमत छोड़ दे तूं तो, निर्मल होय घर आव हो ॥ दूधहि से दधि होत है दधि, मथ माखन होय । माखनसे घृत होत है, बहुर न छाँछ समोय ॥ ऊँखहिसे गुड़ होत है, गुड़से खाँड होइजाय । सतगुरु मिल मिसरी भये, बहुरि न ऊँख समाय ॥ खाँड जो बगरी रेतमें गजमुख, चुनी न जाय । जात बरण कुल खांय के, चींटी होय चुन खाय ॥ दाग जो लागा नीलका, नौ मन साबुन धोय । कोट यतन परमोधिये, कागा हंस न होय ॥ कहैं कवीर सुन केशवा, तेरी गत अगम अपार । बाप बिनोरा हो रहे, पूत भये चौतार ॥
शब्दावली
(२११)
साखी-बीरा पद जिन जानहु, पुरुष नाम निजमूल । जा दिन हंसा तन तजै, मेटै संशय शूल ॥ ६ ॥
शब्दसनेही हंसा तुम, जग तज होहु न्यारा हो ॥ सतशब्द निज डोर है, तुम हंसा गहो बनाय । सतबीरा निज नाम है, (तुम) चाखतही घर जाव ॥ बिना बीज को जामि है, बिन अंकुरको झाड़ । बिन डोडी फल लागिया, कोइ साधू करे बिचार ॥ अजर केर अंकुरा भये, अजर केर लागी डार । अजर फूल फल लागिया, (कोइ) साधू करे अहार ॥ मोहि अजर कर जानहु, अमर देऊं बताय । जेहि भांडे निज साँच है, (हम) तामो रहें समाय ॥ कहें कवीर धर्मदास सो, बेग जाहु संसार । सोहँगमके बाँह से, (तुम) हंस उतारो पार ॥
साखी-उत्तर घाटी उत्तरे, पांजी बैठे जाय ।
तहवां सुर्त समावै, पुरुषके परसे पाय ॥ ६ ॥
चौपड़ ।
चल सखी चौपड़ खेलिये, तन मनसे बाजी लाय हो ॥ चौपड़ खेलौं सुन्नमें, खेलौं दिन औ रात । चल हंसा घर आपने, जहां तेरी उतपात ॥ चौपड़ खेलौं पीवसे, बाजी लगावों जीव । जो हारों तो पीव की, जो जीतों तो पीव ॥ चार गली घर एक है, चार बरन एक सार । पासो ढारा प्रेमका, जीत चली सोई नार ॥ चौपड़िया के खेलमें, जुग नाहनेको दाव । नरु अकेली हो रही, छिन पल खावे घाव ॥ चौरासी घर भस्मके, पौमें अटकी आय । अबकी पौं जो ना परे तो, फिर चौरासी जाय ॥ पगरासे बाजी लगी, परे अठारा दाव । सार गँवाई हाथसे, सिर पर लागे घाव ॥ जात बरन कुल मेटिके, पाये भक्ति अटूट । कहें कवीर धर्मदा- ससों, कोई न पकड़े खूट ॥
(२९२)
कवीरपंथी—
साखी—मैं कवीर बिचलों नहीं, शब्द मोर समरन्थ ।
जाको लोक पठाइया, चढे शब्दके रथ ॥ ७ ॥
ज्ञान रतनकी आंखिया, तुम देखो जमके जाल हो ॥ जमके फंदा काटो हंसा, जग तज होहु न्यार । सतगुरु दर्शन देयँगे, तुम उतरो भौजल पार ॥ जो तुम हंसा निर्गुन चाहो, सर्गुन करो बिचार । निर्गुन सर्गुन छोड़िके, ( तुम ) दोउ तज होहु न्यार ॥ अष्ट कमल दल ऊपरे, भँवर गुफाके घाट । सहस पंखुरीको कमल है, पश्चिम दिशाके बाट ॥ नौ खंड हेत बिसारो हंसा, शब्द सुरत चित धार । कहैं कवीर धर्मदाससों, तुम उतरो भौजल पार ॥
साखी—नाद संघाती कवीर हो, बिंदहि देहु न भार ।
जुग जुग हंस हिरम्मर, नाद उबारन हार ॥ ८ ॥
बीकाकी आरती ।
मंगलरूप आरती साजे, अभय निशान ज्ञान धुन गाजे ॥ टे० ॥ अक्षे वृक्षकी अमर छाया । प्रेम प्रताप अमृत फल पाया ॥ निसि बासर जहाँ सूर न चंदा । परम पुरुष जहाँ करत अनंदा ॥ तन मन धन जिन अर्पन कीन्हा । पुरुष पुरुष परमात्म चीन्हा ॥ जरा मरनकी संसे मेटो । सुरत संतायेन सतगुरु भेटो ॥ कहैं कवीर हिरंमर होई । निरख नाम निज चीन्हे सोई ॥
मंगल ।
बनजारिन बिनती करें सुन साजना । ( साधो ) नरियर लीन्हो हाथ संत सुन साजना ॥ बिना बीजको वृक्ष है सुन साजना । ( साधो ) बिन धरती अंकूर संत सुन साजना ॥ जाको मूल पताल है संत सुन साजना । ( साधो ) नरियर सीस अकाश संत सुन साजना ॥ बिना भेद जनि मोरहु सुन साजना । ( साधो ) जीव इकोतर हानि संत सुन साजना ॥ गुरुके शब्दले मोरहु सुन
शब्दावली
(२९३)
साजना । ( साधो ) खुले जमको कपाट संत सुन साजना ॥ सखियाँ पाँच सहेलरी सुन साजना । ( साधो ) नौ नारी विस्तार संत सुन साजना । कहैं कवीर बचेलसे सुन साजना ॥ रानी इंद्रमती सदाँर संत सुन साजना ॥
नारियलका शब्द ॥
मोरहु नरियर मोरहु हो, आपन अंस बचाय । बिना शब्द जिन मोरहु, जिव परले तरजाय ॥ तीन अंश नरियर महाँ, तामों एक हमार । आपन अंस बचायके, जमके अंस निनार ॥ जमको अमल मिटावहू, पवन बतीस बिलोय । नीर नेह निवारहू, चलो महातम खोय ॥ धरती रेख सुधारहू, पौरुष पवन अमान । बिना भेद जिन मोरहु, जीव एकोतर हान ॥ सोई पवन निज गहि रहो, नरियर वास समोय । तो नौ तत्व सुधारहू, काल निकट नहि होय ॥ धरती गुन गहि प्रगटहू, करो शब्द परकाश । साहब कवीर कर दीहल, दृढ मानो धर्मदास ॥
भोगका शब्द ।
सत पुरुषको भोग लागे, सिंगी शब्द अनाहद बाजे हो ॥ कदली पत्र साजो पनवारा । सीतल शब्द जोत उजियारा ॥ नरियर मोरि खुरौरी कीन्हो । आद नाम अंतर घट चीन्हो ॥ सुघर मिठाई मधुर मिठाई । प्रीत भावसे संत मंगाई ॥ लौंग लायची किसमिस मेवा । सुघर मधुर रस दाख घनेवा ॥ सुख- सागरको निर्मल नीरा । जापर सतगुरु तृप्त शरीरा ॥ सतपुरुषको अर्पन कीन्हा ॥ शंख शब्द धुन बाजे बीना । सो पनवार दासको दीन्हा । जाते काल भयो आधीना ॥ पान पसाद जीव जो पावे । अंकुरी सतलोक सिधावे ॥ ऐसा भेद करो परकाश । सत्य शब्द मानो विश्वास ॥ कहैं कवीर सुनो धर्मदास । बीरानाम करो परकाश ॥
(२९४)
कबीरपंथी—
शब्द तिनूकाका ।
जमनियाके डार साहब तोड़ दीजे हो ॥
एक जमनियाकी चौदह डार, सार शब्द ले तोड़ दीजे हो ॥ सुरत हमारे अजब पियासै, प्रेम अमीरस घोर दीजे हो ॥ गुरु हमारे ज्ञान जौहरी, हीरा पदारथ अमोल दीजे हो ॥ यह संसार बिषैरस माते, भरम किंवरिया खोल दीजे हो ॥ धर्मदासकी अरज गोसाईं, जीवनको बंध छोर दीजे हो ॥
शब्द कंठीका ।
पायो निजनाम गलेको हरवा ॥
सतगुरु पटवा अजब लहरवा । छोटी मोटी डोलिया चार कहंरवा ॥ प्रेम प्रीतकी पहिर चुनरिया । निहुर नचो साहब दर- बरवा ॥ सतगुरु कूंची दर्ई महलमें । जब चाहो तब खोल केवरवा ॥ एही मेरो ब्याह यही मेरो गवना । कहैं कबीर बहुर नहिं अवना ॥ १ ॥
शब्द नामका ।
गुरु पईयां लागों नाम लखाय दीजो हो ॥
जुगन जुगनके सोये मनुवा । दे सत शब्द जगाय लीजेहो ॥ घट अँधियार कछू नहि सूझे । ज्ञानकी दृष्टि खुलाय दीजे हो ॥ विषकी लहर उठे घट भीतर । अमृत बुंद चुवाय दीजेहो ॥ गहरी नेदिया नाव पुरानी । खेयके पार लगाय दीजेहो ॥ धर्मदासकी अरज गोसाईं । जीवन बंध छोड़ाय दीजे हो ॥ २ ॥
शब्द दीहल प्रारम्भः ।
आमिन बिनती बिनवई, सुनहु हो बंदीछोर । भौसागर मोहिं तारहु, इतना मोर निहोर ॥ भौसागर अहैं भयावना, सूझे वार न पार । झंझर नाव पुरातमा, खेइ उतारो पार ॥ कोट कर्म छूटे नहीं, या जिव कीट समान । भुंगी होय गुरुतारहु, अधम उधारन मान ॥ आसन आदि पुरुषको, धर्मदासको दीन्ह । चार अंश