भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(२९३)

साजना । ( साधो ) खुले जमको कपाट संत सुन साजना ॥ सखियाँ पाँच सहेलरी सुन साजना । ( साधो ) नौ नारी विस्तार संत सुन साजना । कहैं कवीर बचेलसे सुन साजना ॥ रानी इंद्रमती सदाँर संत सुन साजना ॥

नारियलका शब्द ॥

मोरहु नरियर मोरहु हो, आपन अंस बचाय । बिना शब्द जिन मोरहु, जिव परले तरजाय ॥ तीन अंश नरियर महाँ, तामों एक हमार । आपन अंस बचायके, जमके अंस निनार ॥ जमको अमल मिटावहू, पवन बतीस बिलोय । नीर नेह निवारहू, चलो महातम खोय ॥ धरती रेख सुधारहू, पौरुष पवन अमान । बिना भेद जिन मोरहु, जीव एकोतर हान ॥ सोई पवन निज गहि रहो, नरियर वास समोय । तो नौ तत्व सुधारहू, काल निकट नहि होय ॥ धरती गुन गहि प्रगटहू, करो शब्द परकाश । साहब कवीर कर दीहल, दृढ मानो धर्मदास ॥

भोगका शब्द ।

सत पुरुषको भोग लागे, सिंगी शब्द अनाहद बाजे हो ॥ कदली पत्र साजो पनवारा । सीतल शब्द जोत उजियारा ॥ नरियर मोरि खुरौरी कीन्हो । आद नाम अंतर घट चीन्हो ॥ सुघर मिठाई मधुर मिठाई । प्रीत भावसे संत मंगाई ॥ लौंग लायची किसमिस मेवा । सुघर मधुर रस दाख घनेवा ॥ सुख- सागरको निर्मल नीरा । जापर सतगुरु तृप्त शरीरा ॥ सतपुरुषको अर्पन कीन्हा ॥ शंख शब्द धुन बाजे बीना । सो पनवार दासको दीन्हा । जाते काल भयो आधीना ॥ पान पसाद जीव जो पावे । अंकुरी सतलोक सिधावे ॥ ऐसा भेद करो परकाश । सत्य शब्द मानो विश्वास ॥ कहैं कवीर सुनो धर्मदास । बीरानाम करो परकाश ॥

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