भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 304, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 304

(२९२)

कवीरपंथी—

साखी—मैं कवीर बिचलों नहीं, शब्द मोर समरन्थ ।

जाको लोक पठाइया, चढे शब्दके रथ ॥ ७ ॥

ज्ञान रतनकी आंखिया, तुम देखो जमके जाल हो ॥ जमके फंदा काटो हंसा, जग तज होहु न्यार । सतगुरु दर्शन देयँगे, तुम उतरो भौजल पार ॥ जो तुम हंसा निर्गुन चाहो, सर्गुन करो बिचार । निर्गुन सर्गुन छोड़िके, ( तुम ) दोउ तज होहु न्यार ॥ अष्ट कमल दल ऊपरे, भँवर गुफाके घाट । सहस पंखुरीको कमल है, पश्चिम दिशाके बाट ॥ नौ खंड हेत बिसारो हंसा, शब्द सुरत चित धार । कहैं कवीर धर्मदाससों, तुम उतरो भौजल पार ॥

साखी—नाद संघाती कवीर हो, बिंदहि देहु न भार ।

जुग जुग हंस हिरम्मर, नाद उबारन हार ॥ ८ ॥

बीकाकी आरती ।

मंगलरूप आरती साजे, अभय निशान ज्ञान धुन गाजे ॥ टे० ॥ अक्षे वृक्षकी अमर छाया । प्रेम प्रताप अमृत फल पाया ॥ निसि बासर जहाँ सूर न चंदा । परम पुरुष जहाँ करत अनंदा ॥ तन मन धन जिन अर्पन कीन्हा । पुरुष पुरुष परमात्म चीन्हा ॥ जरा मरनकी संसे मेटो । सुरत संतायेन सतगुरु भेटो ॥ कहैं कवीर हिरंमर होई । निरख नाम निज चीन्हे सोई ॥

मंगल ।

बनजारिन बिनती करें सुन साजना । ( साधो ) नरियर लीन्हो हाथ संत सुन साजना ॥ बिना बीजको वृक्ष है सुन साजना । ( साधो ) बिन धरती अंकूर संत सुन साजना ॥ जाको मूल पताल है संत सुन साजना । ( साधो ) नरियर सीस अकाश संत सुन साजना ॥ बिना भेद जनि मोरहु सुन साजना । ( साधो ) जीव इकोतर हानि संत सुन साजना ॥ गुरुके शब्दले मोरहु सुन