भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(२११)

साखी-बीरा पद जिन जानहु, पुरुष नाम निजमूल । जा दिन हंसा तन तजै, मेटै संशय शूल ॥ ६ ॥

शब्दसनेही हंसा तुम, जग तज होहु न्यारा हो ॥ सतशब्द निज डोर है, तुम हंसा गहो बनाय । सतबीरा निज नाम है, (तुम) चाखतही घर जाव ॥ बिना बीज को जामि है, बिन अंकुरको झाड़ । बिन डोडी फल लागिया, कोइ साधू करे बिचार ॥ अजर केर अंकुरा भये, अजर केर लागी डार । अजर फूल फल लागिया, (कोइ) साधू करे अहार ॥ मोहि अजर कर जानहु, अमर देऊं बताय । जेहि भांडे निज साँच है, (हम) तामो रहें समाय ॥ कहें कवीर धर्मदास सो, बेग जाहु संसार । सोहँगमके बाँह से, (तुम) हंस उतारो पार ॥

साखी-उत्तर घाटी उत्तरे, पांजी बैठे जाय ।

तहवां सुर्त समावै, पुरुषके परसे पाय ॥ ६ ॥

चौपड़ ।

चल सखी चौपड़ खेलिये, तन मनसे बाजी लाय हो ॥ चौपड़ खेलौं सुन्नमें, खेलौं दिन औ रात । चल हंसा घर आपने, जहां तेरी उतपात ॥ चौपड़ खेलौं पीवसे, बाजी लगावों जीव । जो हारों तो पीव की, जो जीतों तो पीव ॥ चार गली घर एक है, चार बरन एक सार । पासो ढारा प्रेमका, जीत चली सोई नार ॥ चौपड़िया के खेलमें, जुग नाहनेको दाव । नरु अकेली हो रही, छिन पल खावे घाव ॥ चौरासी घर भस्मके, पौमें अटकी आय । अबकी पौं जो ना परे तो, फिर चौरासी जाय ॥ पगरासे बाजी लगी, परे अठारा दाव । सार गँवाई हाथसे, सिर पर लागे घाव ॥ जात बरन कुल मेटिके, पाये भक्ति अटूट । कहें कवीर धर्मदा- ससों, कोई न पकड़े खूट ॥