भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(२९०)

कवीरपंथी—

वही देशसे, भई परदेशी नार । वह मारगमें भूलिया, बिसर गई निज नाह ॥ जुगन जुगन भरमत फिरे, जमके हाथ बिकाय । करजोरि बिनती करो, माहि मिलके बिछुर मत जाव ॥ विषम नदी बिकराल है, वाहित करिया धार । मोह मगरके घाटमें, खाये सुर नर झार ॥ शब्द जहाज कवीरका, सतगुरु खेवनहार ॥ कोइ २ हंस उबारहीं, पलमें लेहिं गोहार ॥

साखी—चली जु पुतली नोनकी, थाह सिन्धुकी लैन । आपन गल पानी भई, उलट कहे को बैन ॥ ३ ॥

कौन मिलावै जोगिया, जोगिया विन रहो न जाय हो ॥ हों हरनीं पिय पारथी, मारा शब्दका बान । जाहि लगे सो जानिया, और दरद नहिं आन ॥ पिय कारन पियरी भई, लोग कहे तन रोग । जप तप लंघनमें करो, पिया मिलनके योग ॥ हुं तो प्यासी पीव की, रटों सदा पिव पीव । पिया मिले तो जीविहों, ना तो (सहजे) त्यागों जीव ॥ कहैं कवीर सुन जोगिनी, तनही में मनही समाय । पिछली प्रीतके कारने, (जोगी) बहुरि मिलेंगे आय ॥

साखी—अस बीरा प्रताप बल, प्रबल काल ते होय ।

जेह सतगुरु बहियां मिले, हंस न जाय बिगोय ॥ ४ ॥

हंसा डुरमत छोड़ दे तूं तो, निर्मल होय घर आव हो ॥ दूधहि से दधि होत है दधि, मथ माखन होय । माखनसे घृत होत है, बहुर न छाँछ समोय ॥ ऊँखहिसे गुड़ होत है, गुड़से खाँड होइजाय । सतगुरु मिल मिसरी भये, बहुरि न ऊँख समाय ॥ खाँड जो बगरी रेतमें गजमुख, चुनी न जाय । जात बरण कुल खांय के, चींटी होय चुन खाय ॥ दाग जो लागा नीलका, नौ मन साबुन धोय । कोट यतन परमोधिये, कागा हंस न होय ॥ कहैं कवीर सुन केशवा, तेरी गत अगम अपार । बाप बिनोरा हो रहे, पूत भये चौतार ॥