कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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सेज्या पुष्प श्वेत सिंघासन, माथे छत्र मनि हीर । कहें कवीर सुनो भाई साधू, सुमरण करो अस्थीर ॥
साखी-चार गुरु संसारमें, धर्मदास बड़ अंस ।
मुक्तराज तुमको दिये , अटल बयालिस वंश ॥ ७ ॥
पदचोरी ।
शब्द सिंघासन पाटमें, तुम हंसा बैठो आये हो । कौन नाम मुक्तामनी, कौन नाम वे अंस । कौन नाम वे पुरुष हैं, कौन नाम वे हंस ॥ अजर नाम मुक्तामनि, उग्रनाम वे अंस । ज्ञानी नाम वे पुरुष हैं सुतं, नाम वे हंस ॥ मूलद्वीप निज द्वीप है, और सुनो हम पांह । बैठे हंस उबारही, सोहंगमके बांह ॥ जंबुद्वीपके हंसा भाई, पांजी बैठे आय । कहें कवीर धर्मदास सो, तुम लावहु बांह चढ़ाय ॥
साखी-हंसा छूटे बाज जों, कोट सिंघका जोर ।
सुमरन दीनदयालका, पहुँच गया निज ठौर ॥ १ ॥
नाम सनेह न छाड़िये, भावे तन मन धन जरजाय हो ॥ पानीसे पैदा किया, नख सिख सीस बनाय । वह साहबको विसारिया, तेरो गाढो होत सहाय ॥ महल चुने खाई खने, ऊंचे ऊंचे धाम । जब जम बैठे कंठमें तेरो, कोई न आवे काम ॥ मात पिता सुत बंधुवा, और दुलारी नार । यह सब हिलमिल बीछुरे, तेरी शोभा है दिन चार ॥ जैसे लागी औरसे, दिन दिन दूनी प्रीत । नाम कवीर न छाड़िये, भावे हार होयके जीत ॥
साखी-उनमुनि चढी अकाशमें, गई गगनमें छूट ।
हंस चलासो जात हैं, काल रहा सिरकूट ॥ २ ॥
अबकी बेर उबारिये मेरी अर्जी दीनदयाल हो ॥ आई थी
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