भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(२८५)

मिष्टाँना । सत सवासा उत्तम पाना ॥ सात हाथ बस्तर परवाना । सो सतगुरुके आगे आना ॥ इतना होय और नहीं भाई । जासों काल दगा मिट जाई ॥ धन्य संत जिन आरति साजा । दुख- दारिद्र वाके घरसे भागा ॥ कहें कबीर सुनो धर्मदासा । ओहँ सोहँ शब्द प्रगासा ॥

साखी-चौका चन्दन कीजिये, मलयागिरको नाम ।

चारो कमल सुधारहू, मध्य ताहिको धाम ॥ १ ॥

उग्र ज्ञानका कहों संदेशा । धर्मदास मानो उपदेशा ॥ धर्मदास मानो चितलाई । रहो ठीका पर उचट न जाई ॥ अजर लोकमें आरती कीन्हा । सो आरती हम तुमको दीन्हा ॥ जा घर आरती नाहिन साजी । ता घर धर्मरायके बाजी ॥ जा घर आरती करो बनाई । निरभै हंस लोकको जाई ॥ कोटिन ज्ञान कथे नर लोई । बिन आरती बांचे नहि कोई ॥ अजर जोत आरती परकाशा । दूत भूत जम मानै त्रासा ॥ कहें कबीर सुनो धर्मदासा । हँसा पावे लोक निवासा ॥

साखी-कलस आरती दल शिला, नरियर पान मिष्ठान ।

पुंगी फलपुष्प लौंग लायची, शब्द भजन धुन ध्यान २॥

धर्मदास तुम पंथ उजागर । अरपो दल परसो सुखसागर ॥ चंदन चौका रचो बनाई । सत सुकृत जहां बैठे आई ॥ सतबारीकै फूल मँगावा । सो सतगुरुको आन चढावा ॥ धर्मदास उठ बिनती कीन्हा । हो सतगुरु हम तुमको चीन्हा ॥ जो तुम कहो मानलेउं सोई । तुम गुरुछोड और नहि कोई ॥ कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । बीरा नाम करो परकाशा ॥

सा०-लौंग इलायची नारियर, आरती धरो लेसाय ।

कहें कबीर धर्मदास सों, काल दगा मिट जाय ॥ ३ ॥