भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी-

दूध सुरत रसको बिजना ॥ जेईलेव सतगुरु पाहुना रसको बिजना । मुखभर देहु अशीस सुरत रसको बिजना ॥ पाथरको का पूजनी रसको बिजना । मुख बोले ना खाय सुरत रसको बिजना ॥ सांचे पूजहु साधुको रसको बिजना । मुख बोले ओ खाय सुरत रसको बिजना ॥ खाय पाय मुख सेजमें रसको बिजना । करले शब्द शृंगार सुरत रसको बिजना ॥ पानन बिरियां खवाऊं हो रसको बिजना । दोउ कर चरन दबाय सुरत रसको बिजना ॥ बिजना बिजना सब कोई कहे रसको बिजना । बिजना लखे न कोय सुरत रसको बिजना ॥ कहैं कवीर धर्मदाससों रसको बिजना । रहत अमरपुर छाय सुरत रसको बिजना ॥

भोगकी आरती ।

सुमरन भजन आरती पूजा, सनमुख करले सेव । सिर पर राखिये हो, सोई परम गुरुदेव ॥ अजपा जाप जपो बिन जिह्वा- मूलमंत्र आराधि । अस्थिर ध्यान अमर हृद अविचल, लागी सहज समाधि ॥ मानसरोवर मंजन करले, त्रिबेनीको घाट । अनहद धुन सुन पांचों मोहे, खुलगये ज्ञानकपाट ॥ बिन नदिया बिन नावरी, गुरु अघर उतारे पार । शब्द सिंढी ऊपर ले राखो, घरही है निज द्वार ॥ चांद सूर निसि वासर नाहीं, नाहिंन विद्या बेद । साहब कवीर भये जहां गुरुमुख, बिरले पावहि भेद ॥

चौकाकी रमनी ।

प्रथमहिं मंदिर चौक पुराये । उत्तम आसन श्वेत बिछाये ॥ हंसा पग आसन पर दीन्हा । सतकवीर कही कह लीन्हा ॥ नाम प्रताप हंस पर छाजे । हंसहि भार रती नहिं लागे ॥ भार उतार आप सिर लीन्हा । हंस छुडाय कालसों लीन्हा ॥ साधसंत मिलि बैठे आई । बहु बिध भक्ति करे चितलाई ॥ पान सुपारी नारियर केरा । लौंग लायची किसमिस मेवा ॥ सवा सेर आनो