कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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(२८१)
जाऊँ ॥ टेक ॥ सतगुरु साहब आय मोरे पाहुन । घर आँगना मोहि लगे सोहाउना ॥ साधु संत मिलि लगे मंगल गावन ॥१॥ होय मगन गुरु चरनन पर छाँलूँ । चरन परछाँलूँ गुरु के वदन निहाँलूँ ॥ तन मन धन सतगुरु पर वारूँ ॥ २ ॥ जादिन आय साधु धन दिन सोई । होत आनन्द परम सुख होई ॥ सतगुरु मिलि मोरि डुरमत खोई ॥ ३ ॥ सुरति लगा सतनामकी आसा । कहैं कविर दासनके दासा ॥ साधु संत मिलि काटो जम फाँसा ॥ ४ ॥ ❁
मंगल उछाह ॥ धुन ॥
राग सारंग (समय मध्याह्न काल)
भाग जाके संत पाहुने आवे । द्वारे कथा कीरतन करहिं, हिलमिल मंगल गावें ॥ टे० ॥ काम कोध मद मान कल्पना, दुर्मति दूर बहावें ॥ राग द्वेष परनिन्दा तजिके सत उपदेश, दिखावें ॥ १ ॥ प्रथम लाभ चरनोदक लैकरि, जो कोई सीस चढावे ॥ कोटिन तीरथको फल सहजहिं, सो घर बैठे पावे ॥ २ ॥ खीर खाण्ड पकवान मिठाई, लखि नहिं हेत बढावें ॥ रुखा सूखा शाक पत्र अति, हितसे भोग लगावें ॥ ३ ॥ महाप्रसाद देवनको दुर्लभ, सन्त सदा सो दै पावे ॥ दुष्ट सदा दुर्मतिके घेरो, मिथ्या जन्म गवाँवें ॥ ४ ॥ गुरु प्रतापसे पूरवके सुकृत, कर्म उदय हो जावें ॥ कहैं कवीर साधु मूरति धरि, साहब दरश दिखावें ॥ ५ ॥
अथ छत्तीस गढी कामचलाक चौकी विधानकी पद ॥
शब्द व्यंजनभोग ।
सत्तनामको भोग लागे, शब्द अनाहद घंटा बाजेहो ॥ प्रेम सुरतिसे करो रसोई । अमृत भोजन पारस होई ॥ कंचन झारी अविगत थार । सत्यसुकृत जहाँ करै जेवनार ॥ जेवहि साहब संत सब संगा ।
• इस प्रकार सतगुरुकी पधरावनी आरतीसहित करना चाहिये । पश्चात् चरण पवार चरणामृत लेना चाहिये ॥