कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
चीन्ह हो ॥ ३ ॥ भयी है कलिविष दूर तनकी, गयी है तपन नसाय हो । अटल पंथ कवीर दीनो, धर्मदास लखाय हो ॥४॥
मङ्गल उछाह ॥
भल आय सतगुरु मैं बलि जावैं । आतम अन्ध जगाइया ॥८६॥ १॥ भूले आतमको भरम मिटाय । लख चौरासीको बन्द छुटाय ॥ २ ॥ आतम तब उत्तरन पाय । कोटि कर्म फन्द काटो आय ॥ ३ ॥ पूरन चन्दा सतगुरु परग आय । नौलख तारा गये छिपाय ॥ ४ ॥ पूरे गुरुकी पूरन कला । और कला न दीसे भला ॥ ५ ॥ और कला त्रिगुनकी ओप । सतगुरु कला परम संतोष ॥ ६ ॥ यहि कला मन राखो थीर । जनम जनमको मेटो पीर ॥ ७ ॥ दस मास जननी भरि बोझ । भक्ति विना भये बनके रोझ ॥ ८ ॥ कहै कवीर जग जीत ले साल । सतगुरु सुमिरो दीन दयाल ॥ ९ ॥
मंगल उछाह ॥
धन सतगुरु जिन दियो उपदेश । भव बूडन गहि राख्यो केश ॥ ८७ ॥ १ ॥ साकटसे गुरु वैष्णव कीया । सत्य नाम सुमिरनको दीया ॥ २ ॥ जाति वरन कुल भरम मिटाय । साधु मिले तब साधु कहाय ॥ ३ ॥ पारस परसे कंचन होय । वाको कहै न कोय ॥ ४ ॥ पारसके गुन देखो आय । कंचन महेगे मोल विकाय ॥ ५ ॥ स्वाति बुन्द के दलीमें परे । रूप रंग कछु औरहि धरे ॥ ६ ॥ नाम कपूर बासना होय । केदली वाको कहै न कोय ॥ ७ ॥ निसदिन सुमिरो एकै नाम । जा सुमिरेते दिठ होय करम ॥ ८ ॥ कहै कविर यह सांचो खेल । फूल तिलिल मिलि भयो फुलेल ॥ ९ ॥
मंगल उछाह ।
आजके दिवस को मैं वारने जाऊँ । वारने जाऊँ बलि हारने