भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(२७६)

कवीरपंथी—

सो ॥ २३७ ॥ मिटै कर्मको अंक, जब सतनाम ध्यावही । होय जीव निःशंक, सत्य बचन सतगुरु कहे ॥ २३८ ॥ छोड़हु यमके फन्द, जेहि फन्दे जग फँदिया । कटे तो होय आनन्द, नाम खडग सतगुरु दिये ॥ २३९ ॥ तजै काक की देह, हंस दशाकी सुरति पर । मुक्ति संदेशा ऐह, सतनाम प्रमाण अस ॥ २४० ॥ सतनाम विश्वास, कर्म भर्म सब परि हरे । सतगुरु पुरवे आस, जो निराश आशा करै ॥ २४१ ॥

गजल प्रार्थना ।

गुरु सेवामें अपनी लगालो मुझे । आवा गवनके दुखसे छुड़ा दो मुझे ॥ जन्म मरण गर्भ वासके, सहि दुख बारम्बार । न्या-कुल हो आयो शरण, मोहिं करो भव पार ॥ सतनाम कृपा कर सुना दो मुझे । गुरु सेवामें अपनी लगालो मुझे ॥ १ ॥ खान पान सुख भोगमें, मैं अरुझा अज्ञान । चञ्चल मन अस्थिर नहीं, केहि विधि हो कल्यान ॥ कोई योगकी युक्ति बता दो मुझे । गुरु सेवामें अपनी लगालो मुझे ॥ २ ॥ काम कोभ मद दंभ छल, झूट कपट व्यभिचार । इनसे मोहिं बचाइये, दीजे काज सुधार ॥ शुभ ज्ञान की नीति सिखा दो मुझे । गुरु सेवामें अपनी लगालो मुझे ॥ ३ ॥ साधु संतसे प्रीति हो विषय विकार हो नाश । सत्य ज्ञान हिरदे बसे, होय परख प्रकाश ॥ साधन चारों परि पूर्ण करा दो मुझे । गुरु सेवामें अपनी लगालो मुझे ॥ ४ ॥ भगवान्दास बिनती करे, प्रेम नयन वहे नीर । तुम