भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी—

अनेक युग जो पुण्य करै, नहीं नाम बिन ठाम ॥ १८१ ॥ कवीर हरिके नाम से, कोटि विघ्न टरि जाय। राई समान वसंदरा, केता काठ जलाय ॥ १८२ ॥ होय नाम जो एक रती, पाप जु रती हजार। अर्द्ध नाम घट संचरै; जारि करै सब छार ॥ १८३ ॥ सत्य नामको खोजिले, जाते अग्नि बुझाय। बिना नाम बांचे नहीं, धरमराय धरि खाय ॥ १८४ ॥ गुण गाया गुण ना कटे, रटै न राम वियोग। अहि निशि हरि ध्यावै नहीं, क्यों पावै दुर्लभ योग ॥ १८५ ॥ कविरा कठिनाई खरी, लेता हरिको नाम। सूली ऊपर सेज है, गिरे तो नहीं ठाम ॥ १८६ ॥ कविरा रामहि ध्याइले, मन करि प्रेम प्रतीति। हरि सागर जनि बीसरे, छीलर देखु अनोति ॥ १८७ ॥ कविरा राम रिझायले, मनहीमें गुण गाय। फूटा नग ज्यों जोड़ि मन, सन्धे सन्धि मिलाय ॥ १८८ ॥ चित्त आग जो चमकिया, चहुँ दिशि लागी बाय। हरि सुमिरण हाथे घडा, वेगी लेहु बुझाय ॥ १८९ ॥ साच बिना सुमिरण नहीं, भेद विन भक्ति न सोय। पारसमें परदा रहा, लोह किमि कंचन होय ॥ १९० ॥ नाम विसारे देहकूँ, जीव दशा सब जाय। जबही छोड़े नामको, तबही लागे धाय ॥ १९१ ॥ कविरा सुमिरण सार है, और सकल जंजाल। आदि अंत मध सोधिया, दूजा देखा काल ॥ १९२ ॥ कंचन केवल हरि भजन, दूजा काँच कथीर। झूठा आल जंजाल तजि, पकड़ो साँच कवीर ॥ १९३ ॥ माला मोसे लड़ि पड़ा; क्या फेरत हो मोहि। मनका माला फेरिले, हरि मिलावै तोहि ॥ १९४ ॥ माला फेरत जुग गया, पाया न मनका फेर। करका मणिका छाड़िके; मनका मणिका फेर ॥ १९५ ॥ माला जपूँ न कर जपूँ, सुखसे कहुँ न राम। हरि मेरा सुमिरण

१ मेरा हरि मोको जप, में पाऊँ विश्वास।