कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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अथ स्मरणका लक्षण और साहाय्य ।
सुमिरण मारग सहजका, सतगुरु दिया बताय । साँस उस्वाँस संभालता, यक दिन मिलसी आय ॥ १६६ ॥ माला स्वाँस उस्वाँस को, करै कोइ निजदास । चौरासी भरमें नहीं, कटे कर्मकी फाँस ॥ १६७ ॥ मन माला तन मेखला, भवकी करी बभूत । राम मिला सब देखता, सो योगी अवभूत ॥ १६८ ॥ अजपा सुमिरण घट विघै, दीना सिरजन हार । रण रोही संग्राम में, रहगई मारा मार ॥ १६९ ॥ बाहर क्या दिखलाइये, अन्तर जपिये राम । कैसा मोहिला खल्क स्रुं, सरे धनीको काम ॥ १७० ॥ सतगुरुका सारा नहीं, शब्द न लागा अंग । कोरा रहिगौ स दड़ा, सदा तेलके संग ॥ १७१ ॥ कविरा माला काठकी, बहुत जतनका फेरु । माला फेरो स्वाँसकी, जामे गाँठ न मेरु ॥ १७२ ॥ स्वासा सुमिरण होत है, ताहि न लगै बार । पल पल बन्दगी साधना, देखो दृष्टि पसार ॥ १७३ ॥ ओठ कण्ठ हालै नहीं, जिह्वा नहीं उचार । गुप्त वस्तुको जो लखै, सोई हंस हमार ॥ १७४ ॥ शून्य मंडलमें घर किया, बाजा शब्द रसाल । रोम रोम दीपक भया, प्रकटे दीन दयाल ॥ १७५ ॥ तूत करता तू भया, सुझमें रही न हूं । बारी तेरे नामकी, जित देखूं तित तू ॥ १७६ ॥ तूत करता तू मिला, तुझमें रहा समय । तुझही माहीं मिलि रहा, अब मन अन्त न जाय ॥ १७७ ॥ पाँच सखी पिव पिव करे, छट्टा सुमरे मन्न । आई सुरति कवीरकी, पाया नाम रतन्न ॥ १७८ ॥ चिंता तो यह नामकी, और न चितवै दास । जो कुछ चितवै नाम विनु सोई कालकी फाँस ॥ १७९ ॥ पहिले बुरा कमायके, बांधा विषको पोट । कोटि करम क्षणमें कटे, आया हरिकी ओट ॥ १८० ॥ कोटि कर्म फल पलकमें, रंचक आवै नाम ।