भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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( २७० )

कबीरपंथी—

मानो भरम सँदेश ॥ १५० ॥ कर जोडे बिनती कहूँ, भवसागर आपार । बन्दा ऊपर मिहर करो, आवा-गवन निवार ॥ १५१ ॥ अन्तर््यामी एक तू, आत्मके आधार । जो तुम छोड़ो साथको, कौन उतारे पार ॥ १५२ ॥ भव सागर भारा महा, गहिरा अगम अथाह । तुम दयाल दया करो, तब पाऊँ कछु थाह ॥ १५३ ॥ साहेब तुम्ही दयाल हो, तुम लग मेरी दौर । जैसे काग जहाजको, सूझै और न ठौर ॥ १५४ ॥ साईं तेरा कुछ नहीं, मेरा होय अकाज । बिरद तुम्हारे लाजकी, शरण परेकी लाज ॥ १५५ ॥ मेरा मन जो तोहि से, यों जो तेरा होय । अहिरण ताता लोह ज्यों, संधि लखै नहिं कोय ॥ १५६ ॥ मेरा मन जो तुझसे, तेरा मन कहिं और । कह कबीर कैसे निभै, एक चित्त दुइ ठौर ॥ १५७ ॥ मुझ अवगुण तुझ गुण घणा, तुझ गुण अवगुण मुझ ॥ जो मैं बिसरूँ तुझको, तू नहिं बिसरो मुझ ॥ १५८ ॥ तुझ विसारा सैर नहीं, किसके शरणें जाहि । शिव विरंचि मुनि नारदा, सो न हिरदय समाहि ॥ १५९ ॥ मैं अपराधी जनमका, नख शिख भरा विकार । दया करो तुम राम जी, तो मैं उतरूँ पार ॥ १६० ॥ साईं मेरा सावधान है, मैहीं भया अचेत । मन बच कर्म न हरि भजा, ताते निष्फल हेत ॥ १६१ ॥ मन प्रतीति न प्रेम रस, ना कोइ तनमें ढंग । ना जावूँ उस पीवसे, क्योंकर रहसी रंग ॥ १६२ ॥ जिनको साईं रंग दिया, कवहुँ न होय कुरंग । दिन दिन बाणी आगरी, चढ़ै सवाया रंग ॥ १६३ ॥ साईं जो मुझको मिलै, पूछैंगे कुशलात । आदि अन्त की सब कहूँ, उर अन्तर की बात ॥ १६४ ॥ कविरा तू तो गारुआ, हलकी अपनी चाल । रंग कुरंगी रंगिया, किया और लगवार ॥ १६५ ॥