कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
टूँढे मुल्क आदम और जिन्नो परी । तुझ बिन नहीं चैन सद आफत भरी ॥ शबे फुरकत न कटी हाय कटी उग्र मेरी । बस्लकी रात की हयहात न तू बातकरी ॥ इस शबे हिजका आखिर को तो सेहू है कि नहीं ॥ २ ॥
गौवास जो सद गीतः लगातेही सुआ । मुहरा हाथ लगा और न कुछ काम हुआ ॥ जब बहर करम लुत्फ तेरा मौजमें आया । बैठेही साहिल पर न सो नअम इनआम दिया ॥ दिल दरियामें तेरे कोई लहर है कि नहीं ॥ ३ ॥
ऐबरुत बरुखाव होवे बेदार कभी । मुझगहगारको हो यार की दीदार कभी ऐ परदःनशी राज कर अफशार कभी निगह नेक होवे सोई गिरफ्तार कभी ॥ इस बन्देपर अगली सी मिहर है कि नहीं ॥ ४ ॥
दरपेशा सफर मुझको वफाकेश जता । शाफी मेरे हामी मेरे कर इल्म अता ॥ मुजरिम हूँ तेरा गरक गुनहगार खता । ऐ चश्मए फैज व रहमत मुझको बता ॥ आजिजका तेरी राहमें गुजर है कि नहीं ॥ ५ ॥
तरकीबबन्द ।
जबान मेरी बयान नुत्क असरदे । बदीद जाहिर व वातिन बसर दे ॥ न भूलूँ एक पल तुझ रह तेरी याद । शबो रोज हर शमो सहरदे ॥ जो नेमत दो जहां सो सब खदफ कर दिल सदफ नाम गोहरदे ॥ न सदीं दिनबदिन गर्मी तरकी। मुहब्बत मुर्शिदे अब्दुल देहदे ॥ खुदीको भूलकर बाखुद हूँ सरमस्त । शराबे इश्कका अपने खुमरदे । न जाहिर जिलवः दिखलाता परीह । उठाता इश्क आतश बोल परदे ॥ रुख खुर छिप रहा है अब कन्दर । खुश आँ वकतेके बुरकःदौर दिहरदे । न मुझसा