भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कबीरपंथी—

जवान जमान । गरीबदास निज ब्रह्म हूँ, हमहीं चारों खान ॥७०॥ गगन सुन्य गुप्ता रहूँ, हम परगट परवाह । गरीबदास घट घट बसूँ, विकट हमारी राह ॥ ७१ ॥ आवत जात न दीसहूँ, रहता सकल समीष । गरीबदास जल तरङ्ग ज्यों, हमहीं सायर सीप ॥ ७२ ॥ गोता लाऊँ स्वर्गमें, फिर पैट्टू पाताल । गरीबदास दूँदत फिहूँ, हीरे माणिक लाल ॥ ७३ ॥ इस दरिया कङ्कर बहुत, लाल कहीं कहि ठाउँ । गरीबदास माणिक चुगूँ, हम मरजीवा नाउँ ॥ ७४ ॥ बोले रामानन्दजी हम घर बड़ा सुकाल । गरीबदास पूजा करें, सुकुट फई जद माल ॥ ७५ ॥ सेवा करो सम्हालके, सुन स्वामी सुरज्ज्ञान । गरीबदास सिरधर सुकुट, माला अटकी जान ॥ ७६ ॥ स्वामी घुण्डी खोलके, फिर माला गर डार । गरीबदास इस भजनको, जानत है करतार ॥ ७७ ॥ क्योटी परदा दूरकर, लीना कण्ठ लगाय । गरीबदास गुजरी बहुत, बदनन बदन मिलाय ॥ ७८ ॥ मनकी पूजा तुम लखी, सुकुट माल परवेश । गरीबदास किनको लखे, कौन वरन क्या भेष ॥ ७९ ॥ यह तो तुम शिक्षा दयी, मान लिये मन मोर । गरीबदास कोमल पुरुष, हमरो बदन कठोर ॥ ८० ॥ हे स्वामी तुम स्वर्गको, छाडो आशा रीत । गरीबदास तुम कारणे, उतरे शब्द अतीत ॥ ८१ ॥ सुन बच्चा मैं स्वर्गकी, कैसे छाई रीत । गरीबदास गुदडी लगी, जन्म जात है बीत ॥ ८२ ॥ चार मुक्ति वैकुण्ठमें, जिनकी मोरे चाह । गरीबदास घर अगमके, कैसे पाऊँ थाह ॥ ८३ ॥ हेम रूप जहाँ धरणि है, रत्न जड़े बहु सोभ । गरीबदास वैकुण्ठको, तन मन हमरो लोभ ॥ ८४ ॥ शंख चक्र गदा पद्म है, मोहन मदन सुरारि । गरीबदास सुरली बजै, स्वर्ग लोक दरबार ॥ ८५ ॥ दूधोंकी नदियाँ बहैं, श्वेत वृक्ष शोभान । गरीबदास मन्दिर सुकुट,