कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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स्वर्गपुरी अस्थान ॥ ८६ ॥ रतन जडाऊ मनुष सब, गण गंधर्व सब देव । गरीबदास उस धामकी, कैसे छाँहूँ सेव ॥ ८७ ॥ चारवेद गावैं उसे, सुरनर मुनी मिलाप । गरीबदास ध्रुव पुर जस, मिटिगये तीनों ताप ॥ ८८ ॥ नारद ब्रह्मा यश रटें, गावैं शेष गणेश । गरीबदास वैकुण्ठसे, और परे को देश ॥ ८९ ॥ सुनु स्वामी निज मूल गति, कहि समझाऊँ तोय । गरीबदास भगवानको, राखा जगत समोय ॥ ९० ॥ तीनलोकके जीव सब, विषय वासना भाय । गरीबदास हमको जपैं, तिसको धाम दिखाय ॥ ९१ ॥ कृष्ण विष्णु भगवानके, जहाँ गये हैं जीव । गरीबदास त्रिलोकमें, काल कर्म सर शीव ॥ ९२ ॥ सुनु स्वामी तो सौ कहूँ, अगम द्वीपकी सैल । गरीबदास डूबे परे, पुस्तक लादे बैल ॥ ९३ ॥ कहु स्वामी कहैं रहोगे, चौदह भुवन बिहण्ड । गरीबदास बीजक कहाँ, चलत प्राण औ पिण्ड ॥ ९४ ॥ बोलत रामानन्दजी, सुन कवीर करतार । गरीबदास सब रूपमें, तुमहीं बोलनहार ॥ ९५ ॥ तुम साहब तुम सन्त हो, तुम सदगुरु हम हंस । गरीबदास तुम रूप बिनु, और न दूजो बंस ॥ ९६ ॥ मैं भक्ता सुक्ता भया, किया कर्म कुलनाश । गरीबदास अविगत मिले, मेटी मनकी प्यास ॥ ९७ ॥ दोनहु ठौरमें एक तू, भया एकसे दोय । गरीबदास हम कारने, उतरे मगहर जोय ॥ ९८ ॥ बोले रामानन्दजी, सुन कवीर सुजान । गरीबदास मुक्त भयो, उधरे पिंड औ प्रान ॥ ९९ ॥ गुष्ठी रामानन्दसे, काशी नगर मैझार । गरीबदास जिंद पीरकी, हम पाये दीदार ॥ १००
कवीर उक्ति धर्मदासप्रति ।
(गो. गरीबदास वचन ।)
हम साहब सतपुरुष हैं, यह सब रूप हमार । जिन्द कहें धर्मदाससे, सत्य शब्द घनसार ॥ १०१ ॥ सकल सृष्टिमें रमि रहा, हूँ सब जात अजात । गरीबदास जिन्दा कहे, मेरे दिवस