भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(२३८)

कवीरपंथी—

ईश । सोलह कला सुभान गति, कोई कहे जगदीश ॥ ५ ॥ भगति सुक्ति ले ऊतरे, मेटन तीनों ताप । मोमिन घर डेरा लिया, कहे कवीरा बाप ॥ ६ ॥ दूध न पीवे नहीं अन्न भस्वे, नहीं पलने झूलन्त । अघर आसन है ध्यानमें, कमल खिला फूलन्त ॥ ७ ॥ कोई कहे छल, ईश्वर नहीं, कोई किन्नर कहलाय । कोई कहे गुण ईशका, ज्यों ज्यों मारे साय ॥ ८ ॥ काशीमें अचरज भया, गयी जगतकी निन्द । ऐसे दुल्हा ऊतरे, ज्यों कन्या बरविन्द ॥ ९ ॥ खलक मुलक देखन गया, राजा परजा रीति । जम्बूद्वीप जहानमें, उतरे शब्द अतीति ॥ १० ॥ दुनी कहे यह देव है, देव कहे यह ईश । ईश कहे परब्रह्म है, पूरन विस्वेवीस ॥ ११ ॥ काजी गये कुरान ले, घर लडकेको नाँउ । अच्छर अच्छरमें फुरे, धन्य कवीर बल जाउँ ॥ १२ ॥ सकल कुरान कवीर है, हरफ लिखे जो लेख । काशीके काजी कहें, गयी दीनकी टेक ॥ १३ ॥ शिव उतरे शिवपुरीसे, अविगत वदन विनोद । महके कमल खुशी भया, लिया ईशको गोद ॥ १४ ॥ नजर नजरसे मिल गयी, किया दर्श परनाम । धन्य मोमिन धन्य पूरना, धन्य काशीनिष्काम ॥ १५ ॥ सात बार चर्चा करे बोले बालक बैन । शिव सो कर मस्तक धन्यो, ला मोमिन यक घेनु ॥ १६ ॥ अनव्यावरको दुहतही, दूध दिया ततकाल । पियो बालक ब्रह्म गति, वहाँ शिव भये दयाल ॥ १७ ॥ षष्ठ मासके जब भये, नित दुनिया वर देहि । चरण चले तत पुरीमें, यहि शिक्षा निति लेहि ॥ १८ ॥

रामानन्द स्वामी और कवीर साहबकी वार्तालापका वृत्तान्त ।

भक्ति द्रावड देशथी, यहाँ नहीं यकर रख । ऊत भूतको ध्यावना, पारखण्ड और परपञ्च ॥ १९ ॥ रामानन्द अनन्द भये, काशी नगर मँझार । देश द्राविड छाडिके, आये पुरी विचार ॥ २० ॥ योग युक्ति