भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(२२३)

कवीरका, कटै कालकी पीर । दादू दिन दिन ऊपजे, परमानंद सुख सीर ॥ १३ ॥ दादू नाम कवीरका, जो कोइ लेय ओट । तिनको कबहुँ न लागई, काल वज्रकी चोट ॥ १४ ॥ और सन्त सब कूप हैं, केते सरिता नीर । दादू अगम अपार है, दरिया सत्यकवीर ॥ १५ ॥ हिन्दू अपनी हृद चले, मुसलमान हृद माँहि । दादू चाल कवीरकी, दोउ दीनमें नाहि ॥ १६ ॥ हिन्दूके सद्गुरु सही, मुसलमानके पीर । दादू दोनों दीनमें, अदली नाम कवीर ॥ १७ ॥ अबही तेरी सब मिटै, जन्म मरनकी पीर । सास उसासा सुमिरले, दादू नाम कवीर ॥ १८ ॥ कोई रीझा सगुनमें, कोइ निर्गुन ठहराय । दादू गति कवीरकी, मोते कही न जाय ॥ १९ ॥ भवजलतारन जीवको, खेवट आय कवीर । अनन्त कोट सुख भावसे, दादू उतरे तीर ॥ २० ॥

सुखसे ज्ञान कवीरका, कोई कह ससुझाय । दादू वाको चरणरज, लइहो शीश चढाय ॥ २१ ॥ नाम कवीर जो नर जपै, मैं बलिहारी ताहि । तन मन वारुँ तासु पर, दादू प्रान लगाय ॥ २२ ॥ सुमिरत नाम कवीरका, जिह्वा मोर सुखाय । विरह अग्नि तनमें तपै, दादू कौन बुझाय ॥ २३ ॥ दादू नाम कवीर का सुनिके काँपे काल । नाम भरोसे नर चले, बङ्ग न होवे बाल ॥ २४ ॥ जिन मोको निज नाम दर्ई, सद्गुरु सोइ हमार । दादू दूसर कौन है, कवीर सिरजनहार ॥ २५ ॥ कवीर साहब कह गये, ढोल बजाय बजाय । दादू दुनियाँ बावरी, ताके सङ्ग न जाय ॥ २६ ॥ दादू बैठि जहाज पर, गये समुद्र तीर । जलमें मच्छी जो रहैं, कहैं कवीर कवीर ॥ २७ ॥ स्वाती शब्द कवीरका, सुरति जो सीप विचार । दादू तन मन जोड़के, लेत बूँद अनुसार ॥ २८ ॥ स्वाती शब्द कवीरका, चात्रक मन बहु आस । दादू और पिवै नहीं, स्वाति बूँदकी प्यास ॥ २९ ॥ स्वाती शब्द कवीरका, सो हम पिया अघाय । मनकी