भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

शब्दावली

(२२३)

कवीरका, कटै कालकी पीर । दादू दिन दिन ऊपजे, परमानंद सुख सीर ॥ १३ ॥ दादू नाम कवीरका, जो कोइ लेय ओट । तिनको कबहुँ न लागई, काल वज्रकी चोट ॥ १४ ॥ और सन्त सब कूप हैं, केते सरिता नीर । दादू अगम अपार है, दरिया सत्यकवीर ॥ १५ ॥ हिन्दू अपनी हृद चले, मुसलमान हृद माँहि । दादू चाल कवीरकी, दोउ दीनमें नाहि ॥ १६ ॥ हिन्दूके सद्गुरु सही, मुसलमानके पीर । दादू दोनों दीनमें, अदली नाम कवीर ॥ १७ ॥ अबही तेरी सब मिटै, जन्म मरनकी पीर । सास उसासा सुमिरले, दादू नाम कवीर ॥ १८ ॥ कोई रीझा सगुनमें, कोइ निर्गुन ठहराय । दादू गति कवीरकी, मोते कही न जाय ॥ १९ ॥ भवजलतारन जीवको, खेवट आय कवीर । अनन्त कोट सुख भावसे, दादू उतरे तीर ॥ २० ॥

सुखसे ज्ञान कवीरका, कोई कह ससुझाय । दादू वाको चरणरज, लइहो शीश चढाय ॥ २१ ॥ नाम कवीर जो नर जपै, मैं बलिहारी ताहि । तन मन वारुँ तासु पर, दादू प्रान लगाय ॥ २२ ॥ सुमिरत नाम कवीरका, जिह्वा मोर सुखाय । विरह अग्नि तनमें तपै, दादू कौन बुझाय ॥ २३ ॥ दादू नाम कवीर का सुनिके काँपे काल । नाम भरोसे नर चले, बङ्ग न होवे बाल ॥ २४ ॥ जिन मोको निज नाम दर्ई, सद्गुरु सोइ हमार । दादू दूसर कौन है, कवीर सिरजनहार ॥ २५ ॥ कवीर साहब कह गये, ढोल बजाय बजाय । दादू दुनियाँ बावरी, ताके सङ्ग न जाय ॥ २६ ॥ दादू बैठि जहाज पर, गये समुद्र तीर । जलमें मच्छी जो रहैं, कहैं कवीर कवीर ॥ २७ ॥ स्वाती शब्द कवीरका, सुरति जो सीप विचार । दादू तन मन जोड़के, लेत बूँद अनुसार ॥ २८ ॥ स्वाती शब्द कवीरका, चात्रक मन बहु आस । दादू और पिवै नहीं, स्वाति बूँदकी प्यास ॥ २९ ॥ स्वाती शब्द कवीरका, सो हम पिया अघाय । मनकी

(२३४)

कवीरपंथी—

प्यासा सब मिटी, दाढ़ रहे समय ॥३०॥ जैसे मिरगा नाद सुन, तन मन भूले प्रान । दाढ़ भूले देह गुन, सुनि कवीरको ज्ञान ॥३१॥ केवल नैन कवीरका, उज्ज्वल रूप अनूप । दाढ़ अन्तर निर्मला, देखे सहज सरूप ॥३२॥ शोभा देखि कवीरकी, नैन रहे ललचाय । कहा कहूँ छबि रूपकी, दाढ़ कही न जाय ॥ ३३ ॥ एकै रोम कवीरका, कोटिभानु छबि छाय । दाढ़ कौतुक चन्द ते, शीतलता अधिकाय ॥३४॥ बन्दौँ चरण कवीरके, कोटि बार पल माँहि । दाढ़ हवस मनमें रही, कोटिक रसना नाँहि ॥ ३५ ॥ कोटि कर्म पलमें कटैँ, नाम कवीर जो लेइ । दाढ़ सच्चे होत है, सुफल मनोरथ देइ ॥३६॥ परमारथके कारनै, आप स्वार्थी नाँहि । कवीर आये भगति लै, दाढ़ भवजल माँहि ॥ ३७ ॥ भगति करै संसारमें, युग युग नाम धराय । दाढ़ तारन जीवको, काशी प्रगटै आय ॥ ३८ ॥ बहुत जीव अटके रहे, बिन सदगुरु भव माँहि । दाढ़ नाम कवीर बिन, छूटे एको नाँहि ॥ ३९ ॥ सदगुरु बहियाँ जीवको, मंझधार भवसिन्ध । दाढ़ नाम कवीरका, छोड़ आवे भवफंद ॥४०॥ साचा शब्द कवीरका, मीठा लगै मोय । दाढ़ सन्ता परम सुख, कीता आनंद होय ॥ ४१ ॥ साचा शब्द कवीरका, सब सुखदाई सोय । दाढ़ गुरु परतापते, कित्ता भरोसा होय ॥४२॥ साचा शब्द कवीरका, सन्त सुनो चित लाय । दाढ़ भ्रम सब मिट गया, कर्मकाल नहिँ खाय ॥४३॥ साचा शब्द कवीरका, सबको होय सहाय । रोग दुःख त्रिताप सब, दाढ़ दूर पराय ॥ ४४ ॥ साचा शब्द कवीरका, तोल मोलमें नाँहि । दाढ़ दूसर ना मिलै, जो खोजे घट माँहि ॥ ४५ ॥ साचा शब्द कवीरका, युग युग अटल अभूल । दाढ़ पावे पारखू, परम पुरुष निजमूल ॥ ४६ ॥

शब्दावली

(२३५)

गरीबदासजीकी साखियाँ

नमो नमो सत्पुरुषको, नमस्कार गुरु कीन । सुरनर मुनि जन साधुवा, सन्तों सर्वश दीन ॥ १ ॥ पुर पट्टन सतलोक है, अदली सदगुरु सार । भगति हेत सो उत्तरे, पाया हम दीदार ॥ २ ॥ ऐसा सदगुरु हम मिला, सुन्न विदेशी आप । रोम रोम परकाश है, दीना अजपा जाप ॥ ३ ॥ ऐसा सदगुरु हम मिला, सुरत सिंधुके सेन । उर अन्तर परकाशिया, अजब सुनाये वैन ॥ ४ ॥ ऐसा सदगुरु हम मिला, सुरत सिंधुके नाल । गोन किया सतलोकसे, अनल पंखकी चाल ॥ ५ ॥ ऐसा सदगुरु हम मिला, सुरत सिंधुके तीर । सब संतन शिरताज है, सदगुरु अटल कवीर ॥ ६ ॥ ऐसा सदगुरु हम मिला, वे परवाह अबंध । परम हंस पूरन पुरुष, रोम रोम रविचंद ॥ ७ ॥ ऐसा सदगुरु हम मिला, है जिन्दा जगदीश । सुन्न विदेशी मिल गया, छत्र सुकूट है शीश ॥ ८ ॥ जिन्दा जोगी जगत गुरु, मालिक सुरशिद पीव । कालकरम लागै नहीं, संका नाहीं झीव ॥ ९ ॥ जिन्दा जोगी जगत गुरु, मालिक सुरशिद पीर । दुहुँ गरीब झगरा पडा, पाया नहीं शरीर ॥ १० ॥ ऐसा सदगुरु हम मिला, तेज पुंजको अङ्ग । झिलमिल नूर जहूर है, रूप रेख नहि रङ्ग ॥ ११ ॥ ऐसा सदगुरु हम मिला, खोले वज्रकपाट । अगम भूमिकी गम करे, उत्तरे औघट घाट ॥ १२ ॥ सदगुरु मारचो बान कसि, गहवर गाँसी स्वींच । करम भरम सबही लिये, ज्ञानीको बुधि ईंच ॥ १३ ॥ सदगुरु आय दया करि, ऐसे दीन दयाल । बन्दीछोर विरद किया, जठरअग्नि प्रतिपाल ॥ १४ ॥ यम जोरा जासे डरे, धरमराय धर धीर । ऐसा सदगुरु एक है, अदली अदल कवीर ॥ १५ ॥ यम जोरा जासे डरे, मिटे करमको रेख । अदली अदल कवीर है, कुलका सदगुरु एक ॥ १६ ॥

( २३६ )

कवीरपंथी—

ऐसा सदगुरु हम मिला, भवसागरके बीच । खेवट सबको खेवता, क्या उत्तम क्या नीच ॥ १७ ॥ मायाको रस पीयके, डूब गये दो दीन । ऐसा सदगुरु हम मिला, ज्ञान योग परवीन ॥ १८ ॥ साहबसे सदगुरु भये, सदगुरुसे भय साथ । ये तीनों एक अङ्ग हैं, गति कुछ अगम अगाध ॥ १९ ॥ अंधे गूँगे गुरु घने, लोभी लँगडे लाख । साहबसे परिचय नहीं, काहि बनावैं साख ॥ २० ॥ ऐसा सदगुरु सेविये, शब्द समाना होय । भौसागरमें डूबते, पार लँघावैं सोय ॥ २१ ॥ सदगुरु पूर्ण ब्रह्म है, सदगुरु आप अलेख । सदगुरु रमता राम है, यामें मीन न मेख ॥ २२ ॥ बङ्गनालके अन्तरे, तिरवेणीके तीर । जहाँ सुहि सदगुरु ले गया, बन्दीछोड कवीर ॥ २३ ॥ शून्यमण्डल अनुराग है, शून्यमण्डल रह थीर । दास गरीब उधारिया, बन्दीछोड कवीर ॥ २४ ॥ या सुखते सुख संख गुण, ब्रह्म शब्दके माँहि । सदगुरु मिले कवीरसे सत्यलोक ले जाँहि ॥ २५ ॥ जैसे बादल गगनमें, चलते हैं बिन पाँय । ऐसे पुरुष कवीर हैं, शून्यमें रहे समय ॥ २६ ॥ गगनमण्डलसे ऊतरे, साहब पुरुष कवीर । चोला धरा खवासका, तोडे यम जञ्जीर ॥ २७ ॥ आदौ आदि कवीर है, चौदह भुवन विशाल । हीरे मोती बहुत हैं, कवीर लालनके लाल ॥ २८ ॥ ऐसा निर्मल ज्ञान है, निर्मल करे शरीर । और ज्ञान मण्डल सबै, चक्के ज्ञान कवीर ॥ २९ ॥

चौपाई ।

दास गरीब कवीर को चेरा । सत्य लोक अमरपुर डेरा । अमृत पान अमिय रस चोखा । पीवे हंसा नाही धोखा ॥

गोसाई गरीब दासजीकी श्रुतवेदी ।

नमो नमो सत पुरुषको, नमस्कार गुरु कीन्ह । सुरनर सुनिजन

शब्दावली ।

(२३७)

साधवा, संतो सर्वस दीन्ह ॥ अनंत कोट ब्रह्माण्डमें, बन्दीछोर कहाय । सो तो पुरुष कवीर है, जननी जनी न माय ॥

ब्रह्म वेदी ।

गैबी ख्याल विशाल सतगुरु, अचल दिगम्बर थीर है । भक्त हेत काया धरि आये, अविचल सत्य कवीर है ॥ १ ॥ नानक दाढ़ अगम अगाधू, तरे जहाज खेवट सही । सुख सागरके हंस आये, भक्त हिरम्बर उर गही ॥ २ ॥ कोटि भान परकाश पूरन, हम हमकी लार है । अचल अभंगी है सत्संगी, अविगतका दीदार है ॥ ३ ॥ धन सतगुरु उपदेश देवा, चौगसी भ्रम भेटई । तेज पुंज तन देह धरिके, इस विधि हमको भेटई ॥ ४ ॥ सबद निवास अकास वानी, यह सतगुरुका रूप है । चन्द सूर नहि पवन पानी, ना जहैं छाया धूप है ॥ ५ ॥ रहिता रमिता राम साहब, अविचल अलह अलेख है । भूले पंथ विटम्बवादी, कुलका खाविंद एक है ॥ ६ ॥ रोम रोममें जाप जपिले, अष्ट कमल दल मेल है । सुरत निरतके कमल बैठो, जहाँ दीपक बिन तेल है ॥ ७ ॥ हरदम खोज हनोज हाजिर, तिरखेनीके तीर है । दास गरीब तबीन सतगुरु, बन्दीछोर कवीर है ॥ ८ ॥

गरीबदासजीकी पारखमझकी कुछ साखियाँ ।

काशीपुरको कस्द किया, उतरे अघर अधार । मोमिनका मुजरा हुआ, जंगलमें दीदार ॥ १ ॥ कोटि किरन शशि भानु सुधि, आसन अघर विमान । परसत पूरण ब्रह्मको, शीतल पिण्ड औ प्रान ॥ २ ॥ गोद लिया सुख चूमके, हेम रूप झलकन्त । जगर मगर काया करे, दमके पद्म अनन्त ॥ ३ ॥ काशी उमडी गुल भया, मोमिनका घर घेर । कोई कह ब्रह्मा विष्णु है, कोई कह इन्द्र कुबेर ॥ ४ ॥ कोई कह वरुण धरमराय है, कोइ कोइ कहता

(२३८)

कवीरपंथी—

ईश । सोलह कला सुभान गति, कोई कहे जगदीश ॥ ५ ॥ भगति सुक्ति ले ऊतरे, मेटन तीनों ताप । मोमिन घर डेरा लिया, कहे कवीरा बाप ॥ ६ ॥ दूध न पीवे नहीं अन्न भस्वे, नहीं पलने झूलन्त । अघर आसन है ध्यानमें, कमल खिला फूलन्त ॥ ७ ॥ कोई कहे छल, ईश्वर नहीं, कोई किन्नर कहलाय । कोई कहे गुण ईशका, ज्यों ज्यों मारे साय ॥ ८ ॥ काशीमें अचरज भया, गयी जगतकी निन्द । ऐसे दुल्हा ऊतरे, ज्यों कन्या बरविन्द ॥ ९ ॥ खलक मुलक देखन गया, राजा परजा रीति । जम्बूद्वीप जहानमें, उतरे शब्द अतीति ॥ १० ॥ दुनी कहे यह देव है, देव कहे यह ईश । ईश कहे परब्रह्म है, पूरन विस्वेवीस ॥ ११ ॥ काजी गये कुरान ले, घर लडकेको नाँउ । अच्छर अच्छरमें फुरे, धन्य कवीर बल जाउँ ॥ १२ ॥ सकल कुरान कवीर है, हरफ लिखे जो लेख । काशीके काजी कहें, गयी दीनकी टेक ॥ १३ ॥ शिव उतरे शिवपुरीसे, अविगत वदन विनोद । महके कमल खुशी भया, लिया ईशको गोद ॥ १४ ॥ नजर नजरसे मिल गयी, किया दर्श परनाम । धन्य मोमिन धन्य पूरना, धन्य काशीनिष्काम ॥ १५ ॥ सात बार चर्चा करे बोले बालक बैन । शिव सो कर मस्तक धन्यो, ला मोमिन यक घेनु ॥ १६ ॥ अनव्यावरको दुहतही, दूध दिया ततकाल । पियो बालक ब्रह्म गति, वहाँ शिव भये दयाल ॥ १७ ॥ षष्ठ मासके जब भये, नित दुनिया वर देहि । चरण चले तत पुरीमें, यहि शिक्षा निति लेहि ॥ १८ ॥

रामानन्द स्वामी और कवीर साहबकी वार्तालापका वृत्तान्त ।

भक्ति द्रावड देशथी, यहाँ नहीं यकर रख । ऊत भूतको ध्यावना, पारखण्ड और परपञ्च ॥ १९ ॥ रामानन्द अनन्द भये, काशी नगर मँझार । देश द्राविड छाडिके, आये पुरी विचार ॥ २० ॥ योग युक्ति

शब्दावली

(२३९)

प्राणायाम करि, जीता सकल शरीर । तिरवेणीके घाटमें, अटक रहै बलबीर ॥ २१ ॥ तीरथ वरत इकादशी, गंगोदक अस्नान । पूजा विधि विधानसो, सर्व कलासों गान ॥ २२ ॥ करे मानसी सेव नित, आत्मतत्त्वको ध्यान । षट पूजा आदि भेद गति, धूप औ दीप विधान ॥ २३ ॥ चौदह सौ चेले किये, काशीनगर मैझार । चार सम्प्रदा चलत हैं, औरो बावन द्वार ॥ २४ ॥ पांच बरसके जब भये, काशी माहिं कवीर । दास गरीब अजीब कला, ज्ञान ध्यान गुण थीर ॥ २५ ॥ गुल काशीपुरिमें भया, अटपट वैन विहंग । दास गरीब गुणी थके, सुनि जोलहा परसंग ॥ २६ ॥ रामानन्द अधिकार है, सुनि जोलहा जगदीश । दास गरीब विलंबना, ताहि नवावत शीश ॥ २७ ॥ रामानन्दको गुरु कहै, तनसे नहीं मिलाय । दास गरीब दरस भये, पैयन लगी जो लाय ॥ २८ ॥ पन्थ चलत ठोकर लगे, राम नाम कहि दीन । दास गरीब कसर नहीं, सीख लिये परवीन ॥ २९ ॥ आडा परदा देइके, रामानन्द बुझन्त । दास गरीब उलंग छबि, अधर डाक कूदन्त ॥ ३० ॥ कौन जाति कुल पन्थ है, कौन तुम्हारा नाउँ । दास गरीब अधीन गति, बोलतही बलि जाउँ ॥ ३१ ॥ जाति हमारी जगदगुरु, परमेश्वर पद पन्थ । दास गरीब लिखत परे, नाम निरञ्जन कन्थ ॥ ३२ ॥ रे बालक दुर्बुद्धि सुनु, घट मठ तन आकार । दास गरीब दर दर लगे, बोले सिरजनहार ॥ ३३ ॥ तू मोमिनके पालुवा, जुलहेके घर बास । दास गरीब अज्ञान गति, एता हठ विश्वास ॥ ३४ ॥ मान बढाई छाड़िके, बोलौ बालक बैन । दास गरीब अधम सुखी, इतना तुम घर फैन ॥ ३५ ॥ कलियुग क्षेतरपाल है, क्या भैरो कोई भूत । दास गरीब विडंबना, गया जगत सब ऊत ॥ ३६ ॥ मनी मगज माया तजो, तजिये मान गुमान । दास गरीब सो बात कहि

( २४० )

कवीरपंथी—

नहीं पावेगो जान ॥ ३७ ॥ हे बालक बुधि तोरि गति, कौडी साखन भौड । दास गरीबहि हदेसकरि, नहीं लेवेंगे डाँड ॥ ३८ ॥ शाह सिकन्दरके बघे, पग ऊपर तर शीश । दास गरीब अगाध गति, तोर कहा जगदीश ॥ ३९ ॥ कान काट बूचा करे, नली भरत रे नीच । दास गरीब जहानमें, तुम सर जोरा मीच ॥ ४० ॥ मरत मरत सब जग सुवा, लखै न इस्थिर ठौर । दास गरीब जहानमें, तुमसा नीच न और ॥ ४१ ॥ नादविन्दकी देहमें, येता गर्व न कीन । दास गरीब पलक फना, जैसे बुद बुद लीन ॥ ४२ ॥ तिर कतलोंसे बोलते, रामानन्द सुजान । दास गरीब कुजाति है, आखिर नीच निदान ॥ ४३ ॥ नीच मीचसे ना डरे, काल कुल्हाड अशीश । दास गरीब अदत्त है, तैं जो कहा जगदीश ॥ ४४ ॥ जड़िहों हाथ हथकडी, गले तौक जझीर । दास गरीब परख विना, यह वाणी गुणगीर ॥ ४५ ॥ परख निरख नहीं तोहिको, नीच कुलीन कुजात । दास गरीब अकल विना, वू जो कह यह बात ॥ ४६ ॥ हे बालक नीची कला, तुमही बोलो ऊँच । दास गरीब पलक धरि, खबर नहीं हम कूँच ॥ ४७ ॥ महुँके वरन खलास करि, सुन स्वामी परवीन । दास गरीब मनी मरी, मैं आजिज आधीन ॥ ४८ ॥ मैं अविगत गतिसे परे, चारवेदसो दूर । दास गरीब दशो दिशा, सकल सिंधु भरपूर ॥ ४९ ॥ सकल सिंधु भरपूर हूँ, खालिक हमरो नाउँ । दास गरीब अजात हूँ, तेजि कहा बलि जाउँ ॥ ५० ॥ जात पाँत मेरे नहीं, नहीं बस्ती नहीं गाउँ । दास गरीब अनन्य गति, नहीं हमारे नाउँ ॥ ५१ ॥ नाद विन्द मेरे नहीं, नहीं गोद नहीं गात । दास गरीब शबद सजग, नहीं किसीका साथ ॥ ५२ ॥ सब सङ्ग विछुरू नहीं, आदि अन्त बहु जाँहि । दास गरीब सकल बसौं, बाहर भीतर

शब्दावली

(२४१)

माँहि॥५३॥ हे स्वामी मैं सृष्टिमें, सृष्टि हमारे तीर। दास गरीब अधर बसुँ, अविगत पुरुष कवीर॥५४॥ अनन्त कोटि सलिता बड़ो, अनन्त कोटि घर ऊँच। दास गरीब सदा रहँ, नहीं हमारे कूँच॥५५॥ पुहमी धरनी अकाशमें, मैं व्यापक सब ठौर। दास गरीब न दूसरा, हम समतूल नहिँ और॥५६॥ मैं माया मैं काल हूँ, मैं हँसा मैं वंस। दास गरीब दयाल हेम, हमहीं करे विध्वंस॥५७॥ ममता माया हम रची, काल जाल सब जीव। दास गरीब प्राण पद, हम दासातन पीव॥५८॥ हम दासनके दास हैं, कर्ता पुरुष करीम। दास गरीब अवधूत हम, हम ब्रह्मचारी सीम॥५९॥ हम मौला सब मुल्कमें, मुल्क हमारे माँहि। दास गरीब दलाल हम, हम दूसर कछु नाहिँ॥६०॥ हम मोती मुक्ताहल, हम दरिया दरवेश। दास गरीब हम नित रहँ, हम तजि जात हमेश॥६१॥ हमहीं लाल गुलाल हैं, हम पारस पद सार। दास गरीब अदालतंग, हम राजा संसार॥६२॥ हम पानी हम पवन हैं, हमहीं धरणि अकाश। दास गरीब तत्त्वपंजमें, हमहीं शब्द निवास॥६३॥ सुन स्वामी सत भाषहँ, झूठ न हमरो रक्ष। दास गरीब हम रूप विन, और सकल परपक्ष॥६४॥ हम रोवत हैं सृष्टिको, जो रोवति है मोहिँ। दास गरीब वियोगको, और न बूझै कोइ॥६५॥ मैं बूझूँ मैंही कहूँ, मैंही किया वियोग। गरीब दास गलतान हम, शब्द हमारा योग॥६६॥ चारो रूकुनमें हम फिरें, नहिँ आवें नहिँ जावैं। गरीब दास गुरु भेदसे, लखे हमारा ठावैं॥६७॥ रजगुण सतगुण तमगुण, रजबीरज हम कीन्ह। गरीबदास हम सकलमें, हम दुनियाँ हम दीन॥६८॥ लगी महम गनीम पर, काल कटक कटकन्त। गरीबदास निर्भय कहैं, जो कोइ नाम जपन्त॥६९॥ मैं बालक मैं बृद्ध हूँ, मैंही

(२४२)

कबीरपंथी—

जवान जमान । गरीबदास निज ब्रह्म हूँ, हमहीं चारों खान ॥७०॥ गगन सुन्य गुप्ता रहूँ, हम परगट परवाह । गरीबदास घट घट बसूँ, विकट हमारी राह ॥ ७१ ॥ आवत जात न दीसहूँ, रहता सकल समीष । गरीबदास जल तरङ्ग ज्यों, हमहीं सायर सीप ॥ ७२ ॥ गोता लाऊँ स्वर्गमें, फिर पैट्टू पाताल । गरीबदास दूँदत फिहूँ, हीरे माणिक लाल ॥ ७३ ॥ इस दरिया कङ्कर बहुत, लाल कहीं कहि ठाउँ । गरीबदास माणिक चुगूँ, हम मरजीवा नाउँ ॥ ७४ ॥ बोले रामानन्दजी हम घर बड़ा सुकाल । गरीबदास पूजा करें, सुकुट फई जद माल ॥ ७५ ॥ सेवा करो सम्हालके, सुन स्वामी सुरज्ज्ञान । गरीबदास सिरधर सुकुट, माला अटकी जान ॥ ७६ ॥ स्वामी घुण्डी खोलके, फिर माला गर डार । गरीबदास इस भजनको, जानत है करतार ॥ ७७ ॥ क्योटी परदा दूरकर, लीना कण्ठ लगाय । गरीबदास गुजरी बहुत, बदनन बदन मिलाय ॥ ७८ ॥ मनकी पूजा तुम लखी, सुकुट माल परवेश । गरीबदास किनको लखे, कौन वरन क्या भेष ॥ ७९ ॥ यह तो तुम शिक्षा दयी, मान लिये मन मोर । गरीबदास कोमल पुरुष, हमरो बदन कठोर ॥ ८० ॥ हे स्वामी तुम स्वर्गको, छाडो आशा रीत । गरीबदास तुम कारणे, उतरे शब्द अतीत ॥ ८१ ॥ सुन बच्चा मैं स्वर्गकी, कैसे छाई रीत । गरीबदास गुदडी लगी, जन्म जात है बीत ॥ ८२ ॥ चार मुक्ति वैकुण्ठमें, जिनकी मोरे चाह । गरीबदास घर अगमके, कैसे पाऊँ थाह ॥ ८३ ॥ हेम रूप जहाँ धरणि है, रत्न जड़े बहु सोभ । गरीबदास वैकुण्ठको, तन मन हमरो लोभ ॥ ८४ ॥ शंख चक्र गदा पद्म है, मोहन मदन सुरारि । गरीबदास सुरली बजै, स्वर्ग लोक दरबार ॥ ८५ ॥ दूधोंकी नदियाँ बहैं, श्वेत वृक्ष शोभान । गरीबदास मन्दिर सुकुट,

शब्दावली

(२४३)

स्वर्गपुरी अस्थान ॥ ८६ ॥ रतन जडाऊ मनुष सब, गण गंधर्व सब देव । गरीबदास उस धामकी, कैसे छाँहूँ सेव ॥ ८७ ॥ चारवेद गावैं उसे, सुरनर मुनी मिलाप । गरीबदास ध्रुव पुर जस, मिटिगये तीनों ताप ॥ ८८ ॥ नारद ब्रह्मा यश रटें, गावैं शेष गणेश । गरीबदास वैकुण्ठसे, और परे को देश ॥ ८९ ॥ सुनु स्वामी निज मूल गति, कहि समझाऊँ तोय । गरीबदास भगवानको, राखा जगत समोय ॥ ९० ॥ तीनलोकके जीव सब, विषय वासना भाय । गरीबदास हमको जपैं, तिसको धाम दिखाय ॥ ९१ ॥ कृष्ण विष्णु भगवानके, जहाँ गये हैं जीव । गरीबदास त्रिलोकमें, काल कर्म सर शीव ॥ ९२ ॥ सुनु स्वामी तो सौ कहूँ, अगम द्वीपकी सैल । गरीबदास डूबे परे, पुस्तक लादे बैल ॥ ९३ ॥ कहु स्वामी कहैं रहोगे, चौदह भुवन बिहण्ड । गरीबदास बीजक कहाँ, चलत प्राण औ पिण्ड ॥ ९४ ॥ बोलत रामानन्दजी, सुन कवीर करतार । गरीबदास सब रूपमें, तुमहीं बोलनहार ॥ ९५ ॥ तुम साहब तुम सन्त हो, तुम सदगुरु हम हंस । गरीबदास तुम रूप बिनु, और न दूजो बंस ॥ ९६ ॥ मैं भक्ता सुक्ता भया, किया कर्म कुलनाश । गरीबदास अविगत मिले, मेटी मनकी प्यास ॥ ९७ ॥ दोनहु ठौरमें एक तू, भया एकसे दोय । गरीबदास हम कारने, उतरे मगहर जोय ॥ ९८ ॥ बोले रामानन्दजी, सुन कवीर सुजान । गरीबदास मुक्त भयो, उधरे पिंड औ प्रान ॥ ९९ ॥ गुष्ठी रामानन्दसे, काशी नगर मैझार । गरीबदास जिंद पीरकी, हम पाये दीदार ॥ १००

कवीर उक्ति धर्मदासप्रति ।

(गो. गरीबदास वचन ।)

हम साहब सतपुरुष हैं, यह सब रूप हमार । जिन्द कहें धर्मदाससे, सत्य शब्द घनसार ॥ १०१ ॥ सकल सृष्टिमें रमि रहा, हूँ सब जात अजात । गरीबदास जिन्दा कहे, मेरे दिवस

(२४४)

कवीरपंथी-

न रात ॥ १०२ ॥ बोले जिन्द कवीरजी, सुनु वानी धर्मदास । हम खालिक हम खलक हैं, सकल हमार प्रकास ॥ १०३ ॥ गरुडबोध बेदी रची, रामकृष्ण हैरान । लंकापर धाये जबे, तबका कहूँ बखान ॥ १०४ ॥ दुर्वास सुनि इन्द्रको, हुआ ज्ञान सम्वाद । दत्त तत्त्वमें मिल गये, जाघर वेद न वाद ॥ १०५ ॥ सिखबन्दी सतगुरुसही, चकवेज्ञानअमान । शीशकटा मन्सूरका, फेर दिया जिवदान ॥ १०६ ॥ नाभाको सतगुरु मिले, देवल नेका फेर । पिंडा तो इतही रहा, शब्द कहा हम टेरे ॥ १०७ ॥ रवी रसायन पीवते, झूले धरे अनन्त । चलत बार पाये नहीं, धन सतगुरु भगवन्त ॥ १०८ ॥ ऐसी संगति जो मिले, भक्ति गही प्रह्लाद । नारदसे सतगुरु मिले, सूझी अगम अगाध ॥ १०९ ॥ चार मुक्ति वैकुंठ बट, सप्तपुरी सैलान । आगे धाम कवीरका, हंस न पावें जान ॥ ११० ॥ काया काशी मन मगहर, दोउके मध्य कवीर । काशी तज मगहर गये, पाया नहीं शरीर ॥ १११ ॥ काया काशी मन मगहर, दोउके वीच मुकाम । जहाँ जुलहदी घर किया, आदि अंत विसराम ॥ ११२ ॥ नौलख नानक नादमें, दसलख गोरख तीर । लाख दत्त संगत सदा, चरनो चरच कवीर ॥ ११३ ॥ नौलख नानक नादमें, दसलख गोरख पास । अनंत संत पदमें मिले, कोटि तैरे रैदास ॥ ११४ ॥ रामानन्दसे लक्ष गुरु, तारे शिष्यके भाय । चेलाकी गिन्ती नहीं, पदमें रहे समाय ॥ ११५ ॥ खोजी खालकमें मिले, ज्ञानीके उपदेश । सतगुरु पीर कवीर है, सब काहू परवेश ॥ ११६ ॥ मीरा बाई पद मिली, सतगुरु पीर कवीर । देहछताँ लौलीनहुइ, पाया नहीं शरीर ॥ ११७ ॥

शब्दावली

(२४५)

सद्गुरुकी स्तुति ।

मुसद्दस ।

मालूम हुआ वेद व कुरआँकी रकमसे । जाहिर है तेरी हमद वसना अहले कलमसे॥ क्या किलक लिखे हीमःगो वागे अरमसे । दुनियामें न कोई वाकिफ है वस्ले सनमसे॥ जो कुछ नजर आता है सो तेरेही करमसे । सब इल्मो अमल बरकत सद्गुरुके कदमसे १

जुजसायःकदम तेरे न इनसाँ का गुजारा । तदबीर नहीं तेरे शरणका है सहारा ॥ लिखते तेरी औसाफ लगे वहा किनारा । दिलदिदः रौशन करे मजम्हू हमारा ॥ पैदा कलम हरकत तुझ दीदः दमसे । सब इल्म व अमल बर्कत सतगुरुकी कदमसे॥२॥

है कौनसा बाजार तेरा इश्क जहां है । है कौन फिरोशिन्दः खरिदार कहाँ है ॥ हमराज कोई आशिके जाँबाज वहां है । जिस रम्ज की फहमीदको सर सिदकः शहाँ है ॥ सो हाथ लगे कोई न दीनार दिरम है । सब इल्मो अमल बर्कत सतगुरुकी कदमसे ॥ ३ ॥

आई है जहां जेठ सो खुरशैद झलक है । सब तार फना जर्ः पा नूर झलक है॥ उमीद न कुछ आदम और जिन्नो मलिक है । है जाँ अमाँ बरुश तुही फितनः फलक है ॥ जुज तेरे न महरम कोई इन्सानके धरमसे । सब इल्मों अमल बरकत सद्गुरु की कदमसे ॥ ४ ॥ तू रहबर हो जिसकी करे रहनुमाई । फिलफौर सोई खुदमें लिया देख खुदाई ॥ हरजा तू है तुही है तुही अर्ज समावी । सदहा खाते गोता न इसरार सो पाई ॥ है फजल तेरा आजिजकी दीदः नम से । सब इल्म व अमल बर्कत सतगुरुकी कदमसे ॥ ५ ॥

( २४६ )

कवीरपंथी—

गजल प्रारम्भः ।

बुल बुल्लों सुजदए बहार आया । इसके साथही पयाम यार आया ॥ आह व नालेके दिन गये हैं गुजर । दिल परागन्दा बरकरार आया ॥ खुल्द और जन्नते जिन्नों क्या जान । दिन बशाशतका बेशुमार आया ॥ शोर बरूतीके दिन गये हैं गुजर । नेकबरूतीका रोजगार आया ॥ मिहर सुरझद कवीर जिस पर हो । उसको है भेद वार पार आया ॥ फिर न कोई दवा दविश आजिज । हाथमें अपने जब शिकार आया ॥ १ ॥

नखले मुहब्बतका समर मुझको दिखा ऐ बागवाँ । तेरे बागमें उल्फते शिजर मुझको दिखा ऐ बागवाँ ॥ शफ़कत किया जो निहाल पर ताजा किया तो पालकर । भूला करम क्यों टालकर मुझको बता ऐ बागवाँ ॥ सब खारो खसको खींचकर पाला है तूने सींचकर । बैठो क्यों आंखे मींचकर मुझको बता ऐ बागवाँ ॥ खुद बागमें शामिल किया और पालकर कामिल किया । फिर काटना क्यों दिल दिया मुझको बता ऐ बागवाँ ॥ आजिज पडा आजिज पडा ऊँधा हुआ पानी घडा । तुझ बिन भरे फिर कौन आ मुझको बता ऐ बागवाँ ॥ २ ॥

बागवाँ बाग कुहनमें तेरे अशजार जिते । कोई है समर बरूश हैं पुर खार किते ॥ तुही खालिक तुही मालिक सभी तहरीक तेरी । तू शाहनशाह जहाँ फौजके सरदार किते ॥ सभी महकूम तेरे हाकिमे आला है तूही । तुही सरकार बडा छोटे हैं सरकार किते ॥ है हयात अबदी उनको जिसे तू बरूश अमाँ । जिन्दा है कोई कोई और हैं मुरदान किते ॥ आलमोंका तु खुदाबन्द फिक् सबकी तुझे । सबका दिलवर है तुही और हैं दिलदार किते ॥ नाम लेते हैं बहुत लोग तेरी दुनियामें । हंस है कोई कोई और

शब्दावली

(२४७)

बूतेमार किते ॥ आसमाँ और जमीँ काँपते कवीर कहे । आशि- कको खबर गो कि खबरदार किते ॥ पेशकश हाथ सर अपना ले गली यारमें आ । बेकीमतके वस्ल खरीदार किते ॥ जिस्को तू अमल बरुश है अलमस्त सोई । बे नशः के छूटे हैं सरशार किते ॥ सबका है खुदा तुही खुदाबन्दा नेक । बे बहा तू है समर बरुश समर बार किते ॥ आजिजको चखा लज्जते उल्फत ऐ गुल । गोबुलबुलो सद जानिवे हरचार किते ॥ ३ ॥

बुलबुलो खिजाँ गया अब आया है दिन बहार । गा गीत चहचहे सदा कर लै लोनेहार ॥ गुल्शनमें जाके मगज मुअत्तर कर अपनेको । क्या क्या है हुस्न खूब खिले गुल हैं पुर कत्तार ॥ कह जाग बूम झूम से अब दूर भागजा । खूबोंकी खूबियाँ तेरी आँखोंमें लगते खार ॥ वह वक्त क्या सुवारक व सायत सईद है । खुद वक्त बरुश आशिको माशूक दर किनार ॥ साहब कवीर होवे मिहबाँ जिस ऊपर । बे मिहनत सो आजिज हो दरिया पार ॥ ४ ॥

तुम साहब रहमान हो अगली मिहर मत छोड़िये । दया धरमके खान हो अगली मिहर मत छोड़िये ॥ हम तो हैं दायम पुर खता इल्मो अमल कीजे अता । दुनियाँ व दीन सुल्तान हो अगली मिहर मत छोड़िये ॥ हम इल्मो अकुमें हेच हैं जम कालके दर पेच हैं । तुम जछेआलीशान हो अगली मिहर मत छोड़िये ॥ जान बरुश मुर्दा लाशका पर्दः ढकें कल्लाशका । तुम आलमीं खाकान हो अगली मिहर मत छोड़िये ॥ नाचार आजिज जिऊ हम सामाँ नहीं कोई बहम । तुम साहबे सामान हो अगली मिहर मत छोड़िये ॥ ५ ॥

दुशमन दिले शहजोर है छलबल भरा सो चोर है । निस दिन

(२४८)

कवीरपंथी

भरोसा तोर है सद शुक्र बन्दीछोरका ॥ जब गिरियः और जारी हुई जम जातना भारी हुई । तब आपकी यारी हुई सदा शुक्र बन्दीछोरका ॥ दारा सिकन्दर कुट गये सूफी कलन्दर लुट गये । कोई हंस तुझसे जुट गये सद शुक्र बन्दीछोरका ॥ दरियाय दिलकी लहरमें सब बह गये इस बहरमें । पहुँचे कोई तेरे शहरमें सद शुक्र बन्दीछोरका ॥ जिसक यह तीनों भौन है उससे बचे कह कवन है । तूही सकल दुख दवन है सद शुक्र बन्दीछोरका ॥ जग जीवको मारा झुला जाहिद व आबिद सब भुला । अब मुक्तिका द्वारा खुला सद शुक्र बन्दीछोरका ॥ अगला न रिश्ताः तोड़िये अपने कदमसे जोड़िये । आजिजका हाथ न छोड़िये सद शुक्र बन्दीछोरका ॥ ६ ॥

सामा न सरे देखिये इस अहद हमारे । सब फितनः भरे देखिये इस अहद हमारे ॥ कोई न सुने पन्द न पहचान न देखे । अन्धे भरे देखिये इस अहद हमारे ॥ इल्म न अमल सब है अबस बादफरोशी । गोया घिरे देखिये इस अदह हमारे ॥ है कौन गुरु और कहाँ धर्म खुदा है । कोई न डरे देखिदे इस अहद हमारे ॥ नेकीसे भगे सारे है बेपार बदीका । जम सबको घेरे देखिये इस अहद हमारे ॥ इस अहदके आदमके अमल पर जो नजर कर । कोई न तरे देखिये इस अदद हमारे ॥ आई जो खिजा बाद गुलिस्तां में सब गुल । पजमुर्दा पड़े देखिये इस अहद हमारे ॥ जब आकर अब्र तेरी बारिशे बारों । सूखे लहर देखिये इस अहद हमारे । आजिजको बशारत हैं यह सतगुरुके शब्दसाख । सब खुशक हरे देखिये इस अहद हमारे ॥ ७ ॥

शम्बरवल्ली

(२४९)

मुबन्धनस

जुज मिहर तुम्हारी कहीं आराम न होवे । इस द्वार फना नेक सरन्जाम न होवे ॥ तदबीर व तकदीरसे कुछ काम न होवे । जिस जायमें इकता वह गुलन्दाम न होवे ॥ दोजख है सरापा जहाँ सत्तनाम न होवे ॥ १ ॥ जब किशबरे हस्तीसे चले हन्स अदमको । किस शान व शौकतसे लिये शब्द अलमको ॥ तब ब्रह्म विचारा फिर जा चूम कदमको । बाजारमें आकरके जो पहचान सनमको ॥ फिर आशिके सौदा यह कभीखाम न होवे ॥ दोजख है सरापा जहाँ सत्तनाम न होवे ॥ २ ॥ बहदत है तुझे और नहीं कोई है सानी । सब ओर भ्रम लअवत इस देर दुखानी । गह खुशक गहे सञ्ज गहे सुबक गिरानी । वे वर्गसमर बाम चले बाद खिजानी ॥ पुर खार वह गुल्शन जहाँ गुल्फाम न होवे ॥ दोजख है सरापा जहाँ सत्तनाम न होवे ॥ ३ ॥

गलतान सदहा बिसमिले नखचीरमें देखे । सुरगां बकफस जेरके जंजीरमें देखे ॥ जर्ब व जखम व कारी इस तीरमें देखे । तासीर अजब जालिमें रहगीरमें देखे ॥ वह राह था मुझको जहाँ दाम न होवे ॥ दोजख है सरापा जहाँ सत्तनाम न होवे ॥ ४ ॥

ऐ मेरे खिजर हाथ पकड़ आन हमारा । जुज तेरे करम फजल नहीं हमको सहारा ॥ है तेरी पनह आजिजे मिसकी विचारा । दिन गुजर गया यों है न कुछ काम सिधारा ॥ रुख अपना दिखा जल्दतर शाम न होवे ॥ दोजख है सरापा जहाँ सत्तनाम न होवे ॥ ५ ॥

अव नसियां करम तेरे असर है कि नहीं । सदफे बाहर तेरे कोई गोहर है कि नहीं ॥ बागबां बागमें उल्फत का शजर है कि नहीं । कोई नखले मुहब्बतमें समर है कि नहीं ॥ मन मिस की तरफ तेरी नजर है कि नहीं ॥ १ ॥

( २५० )

कवीरपंथी—

टूँढे मुल्क आदम और जिन्नो परी । तुझ बिन नहीं चैन सद आफत भरी ॥ शबे फुरकत न कटी हाय कटी उग्र मेरी । बस्लकी रात की हयहात न तू बातकरी ॥ इस शबे हिजका आखिर को तो सेहू है कि नहीं ॥ २ ॥

गौवास जो सद गीतः लगातेही सुआ । मुहरा हाथ लगा और न कुछ काम हुआ ॥ जब बहर करम लुत्फ तेरा मौजमें आया । बैठेही साहिल पर न सो नअम इनआम दिया ॥ दिल दरियामें तेरे कोई लहर है कि नहीं ॥ ३ ॥

ऐबरुत बरुखाव होवे बेदार कभी । मुझगहगारको हो यार की दीदार कभी ऐ परदःनशी राज कर अफशार कभी निगह नेक होवे सोई गिरफ्तार कभी ॥ इस बन्देपर अगली सी मिहर है कि नहीं ॥ ४ ॥

दरपेशा सफर मुझको वफाकेश जता । शाफी मेरे हामी मेरे कर इल्म अता ॥ मुजरिम हूँ तेरा गरक गुनहगार खता । ऐ चश्मए फैज व रहमत मुझको बता ॥ आजिजका तेरी राहमें गुजर है कि नहीं ॥ ५ ॥

तरकीबबन्द ।

जबान मेरी बयान नुत्क असरदे । बदीद जाहिर व वातिन बसर दे ॥ न भूलूँ एक पल तुझ रह तेरी याद । शबो रोज हर शमो सहरदे ॥ जो नेमत दो जहां सो सब खदफ कर दिल सदफ नाम गोहरदे ॥ न सदीं दिनबदिन गर्मी तरकी। मुहब्बत मुर्शिदे अब्दुल देहदे ॥ खुदीको भूलकर बाखुद हूँ सरमस्त । शराबे इश्कका अपने खुमरदे । न जाहिर जिलवः दिखलाता परीह । उठाता इश्क आतश बोल परदे ॥ रुख खुर छिप रहा है अब कन्दर । खुश आँ वकतेके बुरकःदौर दिहरदे । न मुझसा

शब्दावली

(२५१)

और नालायक व नादार। तु सब लायक है खाली पूर करदे ॥ हमारे बद अमल पर मत नजर कर। सरन और नाम अपनेका अजरदे ॥ बहुत दिनका सगे दर हूँ मैं तेरा। न दुर दुर कर न दुर कर पेट भरदे ॥ ना जाऊँ दर बदर इक दरे उम्मीद। बचाले जान और जिवदान बरदे। मिहरकी बहर तू बेहद न पायान। मिहर कीजे मिहर कीजे अपनी लहरदे ॥ सगे दरको फिरा हरगिज न दर दर। मिहर कीजे मिहर कीजे मिहरकर॥१॥

तुही कुनसे किया कूनों मकाँको। तुही बरपा किया सब जिस्म व जाँको ॥ तुही सतपुर्ण ज्ञानी नाम तेरा। तुही बतला दिया नामे निशाँको ॥ किया तुहीने मलकुल मौत पैदा। तुही भेजा है सुरशिव मिहवाँको ॥ कहरेके वास्ते कर काल ज्वार। मिहर कर फिर किया अमनो अमाँको ॥ बनजमे इस जहाँ निर- गुन बनाना। किया पैदा हरी हर वेदरुवाँको। किय मकबूल और मकरुह व मरदूद। तुही खूबी दिया जन्नत जनाँको ॥ तेरे सब नाम हैं आराम बरुशें। वले सब वरुफ सतनाम सुबहाँको ॥ तेरे औसाफ लायक न मलायक। है क्या इमकान इन्साँकी जबाँको ॥ न जाना भेद कुछ हम्दे सरायां। बयों किस तौर कीजे लाबयाँको ॥ तुही बेमिस्ल साहब सबका सरदार। तुही बरुशे अद् और दोस्ताँको ॥ अलख तुही है कोई लख न पाया। ना जाने भेद तुझ राजे निहाँको ॥ तुही सब कुछ किया है सबमें मौजूद। तुही देता है हरकस हर जमाँको ॥ बहर खानो बहर शानो बहरशे। तुही था और तुही होगा तुही है ॥ २ ॥

हजारों पीर गैगाँबर बनाये। जुदा सब मजहबो मिह्वत चलाये ॥ नहीं वह नूर सद मासूर तारे। मिहर तुझ रुख मिहर दैजूर जाये ॥ नहीं लमअ सौसद शमअ शविस्तां। कि बरकत

(२५२)

कबीरपंथी—

तेरी दिन मशअल जलाये । शरीअत शाखकर शारी मुखालिफ नजाते राह इन्साँकों बताये ॥ नबी पीरों फकीरों कैल फरजन्द। सभी औतार धर अछह जताये ॥ सभोंमें बरतरी हैं राम और कृष्ण । निरंजन राय खुद धर देह आये ॥ जिते मजहब हैं इस आलममें जारी । न राहे रुस्तगारी कोई दिखाये ॥ नहीं मज- हब सो सारे कालके जाल । किया मंसूख इक दूजा चलाये ॥ किया सुरगाने जेरक दर कफस बन्द । जो दानांकी तरपा दिल को झुकाये ॥ फँसे उसदाममें आराम जानाँ । जपे सब रामनहि सतनाम पाये पड़ीं सब गाय दरकाबू कसाई । जिधर जावें उधर छूरी उठाये ॥ किया तब रहम तू शुशैद हकीकी । जो साहब था सो सत सुकृत कहाये ॥ करे सब जीवके दुख दन्द तू दूर । तेरा है नाम बन्दी छोर मशहूर ॥ ३ ॥

तेरे मस्तोंकी मस्तीको न जाना । हुआ मदहोश बे खुद और दीवाना ॥ अनलहक भी न पहुँचे अपने हकको । हुआ था यह अनलहकका बहाना ॥ कोई नागा कोई भागा बियाबाँ । कोई अन्दर जमीके जा छिपाना ॥ कोई गावे बजावे तान तोडे । नकल भांडोंकी सबने अकू ठाना ॥ हुए बेगानः सब अपने अमलसे । न पहचाने कोई अपनायगाना ॥ तेरे प्यालेसे इक कतरा जो पीया लिया सो जान मुर्दोंका जिलाना ॥ नहीं भगवा तिलक कन्ठी न माला । निराला भेष धर तुझमें समाना ॥ हुआ जब अरुल से वह वरुल अपने । हुआ तब कतरये दरिया जमाना ॥ तेरी बेमिस्ल सागर मुश्कबूसे । रहे क्या अकू आदमके ठिगाना ॥ मुअत्तर मगज-उसबूसे हुआ जब । तो दानाईको खो बैठे हैं दाना ॥ हुए बेखुद खुदीको खोय बैठे । अब तक तीर पहुँचा बरनिशाना ॥