भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 244, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 244

(२३४)

कवीरपंथी—

प्यासा सब मिटी, दाढ़ रहे समय ॥३०॥ जैसे मिरगा नाद सुन, तन मन भूले प्रान । दाढ़ भूले देह गुन, सुनि कवीरको ज्ञान ॥३१॥ केवल नैन कवीरका, उज्ज्वल रूप अनूप । दाढ़ अन्तर निर्मला, देखे सहज सरूप ॥३२॥ शोभा देखि कवीरकी, नैन रहे ललचाय । कहा कहूँ छबि रूपकी, दाढ़ कही न जाय ॥ ३३ ॥ एकै रोम कवीरका, कोटिभानु छबि छाय । दाढ़ कौतुक चन्द ते, शीतलता अधिकाय ॥३४॥ बन्दौँ चरण कवीरके, कोटि बार पल माँहि । दाढ़ हवस मनमें रही, कोटिक रसना नाँहि ॥ ३५ ॥ कोटि कर्म पलमें कटैँ, नाम कवीर जो लेइ । दाढ़ सच्चे होत है, सुफल मनोरथ देइ ॥३६॥ परमारथके कारनै, आप स्वार्थी नाँहि । कवीर आये भगति लै, दाढ़ भवजल माँहि ॥ ३७ ॥ भगति करै संसारमें, युग युग नाम धराय । दाढ़ तारन जीवको, काशी प्रगटै आय ॥ ३८ ॥ बहुत जीव अटके रहे, बिन सदगुरु भव माँहि । दाढ़ नाम कवीर बिन, छूटे एको नाँहि ॥ ३९ ॥ सदगुरु बहियाँ जीवको, मंझधार भवसिन्ध । दाढ़ नाम कवीरका, छोड़ आवे भवफंद ॥४०॥ साचा शब्द कवीरका, मीठा लगै मोय । दाढ़ सन्ता परम सुख, कीता आनंद होय ॥ ४१ ॥ साचा शब्द कवीरका, सब सुखदाई सोय । दाढ़ गुरु परतापते, कित्ता भरोसा होय ॥४२॥ साचा शब्द कवीरका, सन्त सुनो चित लाय । दाढ़ भ्रम सब मिट गया, कर्मकाल नहिँ खाय ॥४३॥ साचा शब्द कवीरका, सबको होय सहाय । रोग दुःख त्रिताप सब, दाढ़ दूर पराय ॥ ४४ ॥ साचा शब्द कवीरका, तोल मोलमें नाँहि । दाढ़ दूसर ना मिलै, जो खोजे घट माँहि ॥ ४५ ॥ साचा शब्द कवीरका, युग युग अटल अभूल । दाढ़ पावे पारखू, परम पुरुष निजमूल ॥ ४६ ॥

कबीरपंथी शब्दावली · पृष्ठ 244, कुल 968 में से · BharatKosha