भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(२३५)

गरीबदासजीकी साखियाँ

नमो नमो सत्पुरुषको, नमस्कार गुरु कीन । सुरनर मुनि जन साधुवा, सन्तों सर्वश दीन ॥ १ ॥ पुर पट्टन सतलोक है, अदली सदगुरु सार । भगति हेत सो उत्तरे, पाया हम दीदार ॥ २ ॥ ऐसा सदगुरु हम मिला, सुन्न विदेशी आप । रोम रोम परकाश है, दीना अजपा जाप ॥ ३ ॥ ऐसा सदगुरु हम मिला, सुरत सिंधुके सेन । उर अन्तर परकाशिया, अजब सुनाये वैन ॥ ४ ॥ ऐसा सदगुरु हम मिला, सुरत सिंधुके नाल । गोन किया सतलोकसे, अनल पंखकी चाल ॥ ५ ॥ ऐसा सदगुरु हम मिला, सुरत सिंधुके तीर । सब संतन शिरताज है, सदगुरु अटल कवीर ॥ ६ ॥ ऐसा सदगुरु हम मिला, वे परवाह अबंध । परम हंस पूरन पुरुष, रोम रोम रविचंद ॥ ७ ॥ ऐसा सदगुरु हम मिला, है जिन्दा जगदीश । सुन्न विदेशी मिल गया, छत्र सुकूट है शीश ॥ ८ ॥ जिन्दा जोगी जगत गुरु, मालिक सुरशिद पीव । कालकरम लागै नहीं, संका नाहीं झीव ॥ ९ ॥ जिन्दा जोगी जगत गुरु, मालिक सुरशिद पीर । दुहुँ गरीब झगरा पडा, पाया नहीं शरीर ॥ १० ॥ ऐसा सदगुरु हम मिला, तेज पुंजको अङ्ग । झिलमिल नूर जहूर है, रूप रेख नहि रङ्ग ॥ ११ ॥ ऐसा सदगुरु हम मिला, खोले वज्रकपाट । अगम भूमिकी गम करे, उत्तरे औघट घाट ॥ १२ ॥ सदगुरु मारचो बान कसि, गहवर गाँसी स्वींच । करम भरम सबही लिये, ज्ञानीको बुधि ईंच ॥ १३ ॥ सदगुरु आय दया करि, ऐसे दीन दयाल । बन्दीछोर विरद किया, जठरअग्नि प्रतिपाल ॥ १४ ॥ यम जोरा जासे डरे, धरमराय धर धीर । ऐसा सदगुरु एक है, अदली अदल कवीर ॥ १५ ॥ यम जोरा जासे डरे, मिटे करमको रेख । अदली अदल कवीर है, कुलका सदगुरु एक ॥ १६ ॥