कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
ऐसा सदगुरु हम मिला, भवसागरके बीच । खेवट सबको खेवता, क्या उत्तम क्या नीच ॥ १७ ॥ मायाको रस पीयके, डूब गये दो दीन । ऐसा सदगुरु हम मिला, ज्ञान योग परवीन ॥ १८ ॥ साहबसे सदगुरु भये, सदगुरुसे भय साथ । ये तीनों एक अङ्ग हैं, गति कुछ अगम अगाध ॥ १९ ॥ अंधे गूँगे गुरु घने, लोभी लँगडे लाख । साहबसे परिचय नहीं, काहि बनावैं साख ॥ २० ॥ ऐसा सदगुरु सेविये, शब्द समाना होय । भौसागरमें डूबते, पार लँघावैं सोय ॥ २१ ॥ सदगुरु पूर्ण ब्रह्म है, सदगुरु आप अलेख । सदगुरु रमता राम है, यामें मीन न मेख ॥ २२ ॥ बङ्गनालके अन्तरे, तिरवेणीके तीर । जहाँ सुहि सदगुरु ले गया, बन्दीछोड कवीर ॥ २३ ॥ शून्यमण्डल अनुराग है, शून्यमण्डल रह थीर । दास गरीब उधारिया, बन्दीछोड कवीर ॥ २४ ॥ या सुखते सुख संख गुण, ब्रह्म शब्दके माँहि । सदगुरु मिले कवीरसे सत्यलोक ले जाँहि ॥ २५ ॥ जैसे बादल गगनमें, चलते हैं बिन पाँय । ऐसे पुरुष कवीर हैं, शून्यमें रहे समय ॥ २६ ॥ गगनमण्डलसे ऊतरे, साहब पुरुष कवीर । चोला धरा खवासका, तोडे यम जञ्जीर ॥ २७ ॥ आदौ आदि कवीर है, चौदह भुवन विशाल । हीरे मोती बहुत हैं, कवीर लालनके लाल ॥ २८ ॥ ऐसा निर्मल ज्ञान है, निर्मल करे शरीर । और ज्ञान मण्डल सबै, चक्के ज्ञान कवीर ॥ २९ ॥
चौपाई ।
दास गरीब कवीर को चेरा । सत्य लोक अमरपुर डेरा । अमृत पान अमिय रस चोखा । पीवे हंसा नाही धोखा ॥
गोसाई गरीब दासजीकी श्रुतवेदी ।
नमो नमो सत पुरुषको, नमस्कार गुरु कीन्ह । सुरनर सुनिजन