कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
कहीं नेक और कहीं है बद ब किरदार ॥ हरी हर हर हरी हर कोई बोले । कोई कहता अहं ब्रह्म सबका सरदार ॥ कहांतक सो बयाँ कीजे सरापा । निरञ्जन खेलका नहिं वार औ पार ॥ यह तीनों देव देवी सबके दाता । इन्हींके मर्दोजन फरमान बरदार ॥ फँसे वेद और शरणमें जीव सारे । नहीं महरम न ढूँढे कोई शब्द सार ॥ दो लोक और वेद सूलीके सते हैं । लटकते उसके ऊपर जीव जम द्वारा ॥ कि ज्यों सावनके घासोंसे छिपे राह । पुरुष सत्पंथ यों रोके हैं मक्कार ॥ हमें रख लीजिये खुद जा पनहमें । तु बंदीछोड़ सब जीवनको आधार । बजुज सत्गुरु हमारे कौन दे दाद । तुही है बरतरी सब सिद्ध सालार ॥ तुही सत्पुरुष खुद धर देह आया । शरण अपनीमें रखिये हमको इसबार ॥ किया तदवीर सदहा योग जप हम । न छुटकारा हुआ अज दस्ते जन्वार । सिवा साया कदम तेरे न जाये । नहीं चारा कोई सूझे है नाचार ॥ तुही बन्दः नेवाजः बन्दः परवर । सिवा तेरे न रह कोई है जिनहार ॥ जियारत आपसे, यह संगे सोजा । हुआ हम सबके खातिर भिस्ल गुलजार ॥ बचालीजे बचालीजे बचाले । हम आजिज कालके फँदे गिरफ्तार ॥ कि सुन सत्गुरुका कलमः आब हैवाँ । हुए हैं जिन्दः हम सब जीव सुर्दार ॥ हुई शादी कदम कादिरकै देखे । बहर रूख होरही रहमत नमूदार ॥ कि जर्ः खाक पाये परतव अफगन । हुए जाहिर व बाहर इल्म आसार ॥ न तुझ-सा और कोई हर दो जहाँ में । तु आदमकी मुसीबतमें मददगार ॥ हुआ बद हाल मुतगैय्यर हमारा । खबर लेनेको आये आप करतार ॥ हुए हम भूलके मुजरिम तुम्हारे । गुनह वरुशो गुनह बखशिन्दः गफ्तार ॥ सुबुक कीजे हमें इस बोझसे अब । हमारे सिर गुनाहोंका है ँबार ॥ हमारे परदःको ढक मेह करके । तेराही नाम है मशहूर सत्तार ॥ हम आजिज खाक हैं पा पाक तेरे । गुरुकी मेह पावैं अस्ल इसरार ॥