कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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(२२९)
॥ शब्द २६ ॥
मिहरवान है साहब मेरा । दिलभर दूरसन पाऊँ तेरा ॥ १ ॥ तुम दाता मैं सदा भिखारी । देव दीदार जाऊँ बलिहारी ॥ २ ॥ कहूँ बंदगी खिजमत दीजै । बकसो चूक दया बहु कीजै ॥ ३ ॥ सेवक ते बिगरे सौ बारा । सतगुरु साहेब लेह उबारा ॥ ४ ॥ औगुन सेवक साहेब जाने । साहेब मनमें ना गिलाने ॥ ५ ॥ धर्मदास लइ तुम्हरि पनाह । अगले पछिले बकसु गुनाह ॥ ६ ॥
स्तोत्र उर्दूभाषा ।
(स्वामी परमानन्दजी विरचित कबीर मन्त्रसे ॥ )
किया सब जानपर रहमत जहाँदार । तू पुरुष सत शब्द सतके अमाँदार ॥ पड़े हम भूल भवसागरमें आकर । न जाना भेद सत्पुरुष निराकार ॥ कहीं तीरथ कहीं मूरत पुजाया । कहीं खूनकतलका जारी हुआ कार ॥ कहीं हनुमानो भैरव भूत पूजा । कहीं शिवलिङ्ग औ चण्डी गर्मबाजार ॥ कहीं खञ्जर कहीं छूरी चलाया । कहीं मुजेंबह पै छूटीं खून पिचकार ॥ कहीं गरदन मरोड़ी झटका पटका । कहीं आतिशमें जलते बलते जाँदार ॥ कहीं है चक्र भैरवका तमाशा । कहीं बकरे पै घूँसोंकी पड़ी मार ॥ कहीं रोजः कहीं मैं भङ्ग बूजः । कहीं गलकट बरहमनबैठे खूँवार ॥ कहीं सुर्गा है बिस्मिल हाथ कस्साब । कहीं चीखें सुअर कालीके दरबार ॥ कहीं है ढोल बजता ओ नकारः । कहीं मजमः है मर्दोजन जनाकार ॥ कहीं अश्वमेध गोमैध हो अजामेध । कहीं अहरमन बरहमन मर्दुमाजार ॥ कहीं मुछा व काजी ले छुरा हाथ । कहीं गरदन कुशीको तेज तलवार । कहीं रहमत कहीं जहमत दिखाया । पड़े सब जीव धोखे धंधेके गार ॥ भरमका धर्म आलममें चलाया ।
१ जबह करनेकी जगह-कसाइखाना ।