कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 238, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(२२८)
कवीरपंथी—
॥ शब्द २२ ॥
साहेब कौन देस मोहिं डारा ॥ टेक ॥ वह तो देस अमर हंसनको, यहि जग काल पसारा ॥ १ ॥ देवहु शब्द अजर हंसनको, बहुरि न है अवतारा ॥ २ ॥ निरगुन सरगुन दुंद पसारा, परि गइ कालकी धारा ॥ ३ ॥ जहाँ देस है सत्त पुरुषका, अजर अमी आहारा ॥ ४ ॥ धरमदास बिनवै कर जोरी, अबकी अरज हमारा ॥ ५ ॥
॥ शब्द २३ ॥
साहेब लेइ चलो देस अपना ॥ टेक ॥ जमकी त्रास सही नहिं जाई, केहि विधि धरौं मैं ध्याना ॥ १ ॥ माया मोह भरमकी मोटरी, यह सब काल कल्पना ॥ २ ॥ माया मोह भरम सब काटो, दीजै पद निरवाना ॥ ३ ॥ अमर लोक वह देस सुहेला, हंसा कीन्ह पयाना ॥ ४ ॥ धरमदास बिनवै कर जोरी, आवागवन नसाना ॥ ५ ॥
॥ शब्द २४ ॥
तुम सतगुरु हम सेवक तुम्हरे ॥ टेक ॥ जो कोइ मारै औ गरियावै, दाद फिरियाद करब तुमहींसे ॥ १ ॥ सोवत जागतके रछपाला, तुमहीं छोंड़ि भजौं नहिं औरै ॥ २ ॥ तुम धरनीधर शब्द अनाहद, अमृत भाव करो प्रभु सगरे ॥ ३ ॥ तुम्हरी बिनय कहाँ लगि बरनौं, धरमदास पद गहे है तुम्हरे ॥ ४ ॥
॥ शब्द २५ ॥
जमुनियाँकी डारि सोरी तोड़ देव हो ॥ टेक ॥ एक जमुनियाँके चौदह डारि, सार शब्द लेके मोड़ देव हो ॥ १ ॥ काया कंचन अजब पियाला, नाम बूटी रस घोर देव हो ॥ २ ॥ सुरत सुहागिन गजब पियासी, अमृत रसमें बोरे देव हो ॥ ३ ॥ सतगुरु हमरे ज्ञान जौहरी, रतन पदारथ जोरि देव हो ॥ ४ ॥ धरमदासकी अरज गुसाई, जीवनकी बंदी छोर देव हो ॥ ५ ॥