भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(२२७)

लेखा माँगे जम फुरमावै, तीन लोक ले डारा । उपजत विनसत जनम बीतिगै, चौरासीकी धारा ॥ ३ ॥ गगन मैदिलमें सतगुरु बोले, सुनि ले शब्द सम्हारा । धरमदास चरनन पर विनवै, अबकी अरज हमारा ॥ ४ ॥

॥ शब्द १९ ॥

अब मोहिं दरसन देहु कवीर ॥ टेक ॥ तुम्हरे दरससे पाप कटत है, निरमल होत सरीर ॥ १ ॥ अमृत भोजन हंसा पावै, शब्द धुननकी खीर ॥ २ ॥ जहँ देखों जहँ पाट पटंबर, ओढन अंबर चीर ॥ ३ ॥ धरमदासकी अरज गोसाँई, हंस लगावो तीर ॥ ४ ॥

॥ शब्द २० ॥

साहेब मोहिं दरसन दीजे हो । कहना निधि मेहर करीजे हो । पपिहाके चित स्वाति बसै, भावै नहिं जल दूजा हो । जैसे काग जहाज चढे, वाको और न सूझा हो ॥ १ ॥ बार बार विनती कहै, मेरी अरज सुनीजे हो । भवसागरसे काठिके, अपना करि लीजे हो ॥ २ ॥ सत् लोक से सुरत करी, तब जगमें आये हो । जमसे जीव छोडाइके, धर्मनि मन भाये हो ॥ ३ ॥

॥ शब्द २१ ॥

मोर मन लागा साहेबसे, बन्दीछोर कवीरा ॥ टेक ॥ सतगुरु सरनै मैं गई, सब दुख हरि लीन्हा । करम भरम सब मेटिके, निरमल करि दीन्हा ॥ १ ॥ तीन लोकके बीचमें, जम कातर चीन्हा । तासे मोहिं छुडाइके, आपन करि लीन्हा ॥ २ ॥ सतगुरु शब्द सुनाइके, पारस करि दीन्हा । कागा बरन मिटाइके, हंसा करि लीन्हा ॥ ३ ॥ काम क्रोध सब त्यागिके, बन हंस गँभीरा । शब्द हमारा मानि ले, गुरु कहत कवीरा ॥ ४ ॥ धरमदासकी बीनती, संतन महँ हेरा । जाति बरन कुल त्यागिके, सत् लोक बसेरा ॥ ५ ॥