कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 236, कुल 968 में से
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कवीरपंथी-
सकल सुखदाता, करूनामय करत पुकारों ॥ ३ ॥ सीस चढ़ाइ पापकी मोटरी, आयो तुम्हरे द्वारो । को अस हमरे भाव उतारे, तुमहीं हेतु हमारो ॥ ४ ॥ धरमदास यह बिनती बिनवै, सतगुरु मो को तारो । साहेब कवीर हंसके राजा, अमर लोक लै धारो ॥ ५ ॥
॥ शब्द १६ ॥
साहेब मोरी बहियाँ सम्हारि गही ॥ टेक ॥ गहिरी नदिया नाव झाँझरी, बोझा अधिक भई । मोह लोभकी लहर उठत है, नदिया झकोर बही ॥ १ ॥ तुमहिं बिगारो तुमहिं सँवारो, तुमहिं भँडार भरी । जब चाहो तब पार लगावो, नहिं तो जात बही ॥ २ ॥ कुमति काटिके सुमति बढावो, बल बुधि ज्ञान दर्ई । मैं पापी बहु बेरी चूकूँ, तुम मेरी चूक सही ॥ ३ ॥ धरमदास सरन सतगुरुके, अब धुनि लाग रही । अमर लोकमें डेरा परिगै, समरथनाम सही ॥ ४ ॥
॥ शब्द १७ ॥
साहेब कौन कमी घर तेरो ॥ टेक ॥ भूखे अन्न पियासे पानी, कपडासे तन चेरो । जो कछु न्यामत सबै महल में, खरच खजाना ढेरो ॥ १ ॥ खाकसे पाक कियो पल माहीं, हे समरथ बल तेरो । भवसे काठि कियो तँरनी पर, खेइ लगावो सवेरी ॥ २ ॥ रहे न घाम छौंह दुनियामें, रहे न जमको चेरो । रावसे रंक रंकसे राजा, छिनमें होवत हेरो ॥ ३ ॥ मानो सत् झूठ जनि जानो, सत् बचन है सूरो । धर्मदास चरनन पर बिनवै, तुम गति सब भरपूरों ॥ ४ ॥
॥ शब्द १८ ॥
साहेब खेइ लगावो पारा ॥ टेक ॥ असी कोसमें झील अरू झाँकर, असी कोस अंधियारा । असी कोस बैतरनी नदिया, जहाँवाँ हंस उतारा ॥ १ ॥ बड़े बड़े सिकारी जोधा, आगेहीं पग डारा । खाल खैँचि जम भुसा भरावै, ऐँचि लेहि जस आरा ॥ २ ॥
१ हितकरी ।
२ नाव ।