कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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होय निवारा ॥ २ ॥ पाँचके ऊपर पचिस महतिया, इन परंपंच पसारा । मन अदली जहँ अदल चलावै, कहा कर जीव विचारा ॥ ३ ॥ ना मोरी नाव नहिं खेवटिया, डर लागे मोहिं भारी । चौदह लोकमें कोई नहिं दीसै, तुम गुरु पार उतारी ॥ ४ ॥ धरमदास की यही बीनती, उरझेको निर्वारो । साहेब कवीर मिले गुरु समरथ, हमसे अधम उबारो ॥ ५ ॥
॥ शब्द १३ ॥
मैं तो तोरे भजन भरोसे अविनासी ॥ टेक ॥ तीरथ बरत कछू नहिं करहुँ, बेद पढौँ नहिं कासी ॥ १ ॥ जंत्र मंत्र टोटका नहिं जानौँ, निमु दिन फिरत उदासी ॥ २ ॥ यहि घट भीतर बधिक बसत है, दिये लोभ की टाटी ॥ ३ ॥ धरमदास बिनवै कर जोरी, सतगुरु चरनन दासी ॥ ४ ॥
॥ शब्द १४ ॥
साहेब बंदीछोर हमारे ॥ टेक ॥ ठाठे बैठे चलत निहारे, जागत साँझ सबारै । करुनासिंधु दयाके आगर, नैननके उजियारे ॥ १ ॥ बोलत बचन मीठ बहु लागे, पूरन पुरुष पियारे । उनकी रहनि गहनि जब पैहौं, होइ रहु सबसे न्यारे ॥ २ ॥ है बहु ज्ञान ध्यान बहुतेरो, खोलो गगन किवारै । दयास्वरूप बसै सिंधूमैं, हीरा लाल निकारे ॥ ३ ॥ साहेब कवीर सदाके सतगुरु, हंसनके रखवारै । धरमदास पर दाया कीन्हा, आया सरन तुम्हारे ॥ ४ ॥
॥ शब्द १५ ॥
साहेब मोरी ओर निहारो ॥ टेक ॥ परजा पुत्र अहौं मैं साहेब, बहुत बात मैं टारो ॥ १ ॥ हौं मैं कोटि जनमको पापी, मन बच करम असारो । एकौं कर्म छुटे ना कबहुँ, बहु विधि बात बिगारो ॥ २ ॥ हौं अपराधी बहुत जुगनको, नइया मोर उबारो । बंदीछोर
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कवीरपंथी शब्दावली ८