कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
॥ शब्द १० ॥
दीनानाथ दयाल, भक्तकी पछ क सरन आयेकी लाज, साहेब जनकी करौ ॥ १ ॥ नौ दरवाजे बिकार, धार नौका बंगै। मरी सुरत नहीं ठहराय, लगन कैसे लगै ॥ २ ॥ पाँच तत्त्व गुन तीनका, आदर साजिया। जम राखै बिलमाय, तो फन्द न फँदिया ॥ ३ ॥ तिर्गुन फाँसका फँदा, माया मद जालमें। भवसागरके बीच, महा जंजालमें ॥ ४ ॥ भक्ति मुक्ति देव दान, दया जन पर धरौ। नौका पार लगाय, दास अपनो करौ ॥ ५ ॥ साहेब कवीर बन्दीछोर, अरज यक मानिये। धर्मनि पतित उबारि, सरनमें आनिये ॥ ६ ॥
॥ शब्द ११ ॥
चरन छाड़ि प्रभु जावैं कहाँ, मोरे और न कोई। जगमें आपन कोई नहीं, देखा सब टोई ॥ १ ॥ मात पिता हित बन्धु तुम, कासे दुख रोई। सब कुछ तुम्हरे हाथ है, तुम्हरे सुख जोहां ॥ २ ॥ गुन तो मोरे है नहीं, औगुन बहुते होई। ओट लई तुम नामकी, राखो पत सोई ॥ ३ ॥ सतगुरु तुम चीन्हे बिना, मति बुधि सब खोई। सब जीवन के एक तुम, दूजा नहिं कोई ॥ ४ ॥ मैं गरजी अरजी करौं, मरजी जस होई। अरज बिपति लिखौं आपनी, राखौं नहिं गोई ॥ ५ ॥ धरमदास सत साहेबी, घट घटहिं समोई। साहेब कवीर सतगुरु मिले, आवागवन न होई ॥ ६ ॥
॥ शब्द १२ ॥
साई मैं असल गुलाम तिहारा ॥ टेक ॥ काया नगर बन्यो अति सुन्दर, मोहको लग्यो बजारा। कुमति कलोल करै दशाहों दिसि, लोभको डुक्यो नगारा ॥ १ ॥ मोह समुन्दर भरे अपरबल, भँवर भँवै' अति भारा। काम कोधकी लहर उठतु है, केहि बिधि
(१) बगद, बेटिकाने बहै।