कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें(२२२)
कवीरपंथी—
॥ शब्द ४ ॥
साहेब मेटो चूक हमारी ॥ टेक ॥ बार बार मोहिं दंड भयो है, चूक भई अति भारी । अब हम आये निकट तुम्हारे, अब मो तनहिं निहारी ॥ १ ॥ करुनामय तुम नाम धराये, तुम समरथ अब मेरो । ऐसो बिपति भई मोहिं ऊपर, कोई ना हीतै हमारो ॥ २ ॥ तरसत जीव रहै निस बासर, जानि जनहिं तुम दौरी । अबकी चूक छिमाकर साहेब, अब सन्मुख है हेरो ॥ ३ ॥ तुम सतगुरु सकल सुख दाता, शब्द पान दे तारो । धरमदास बिनवै कर जोरी, करौ बंदगी तेरो ॥ ४ ॥
शब्द ५
सुरति पर सतगुर धरि दियो बाठ ॥ टेक ॥ घरमाँ रहौं रहन नहिं पावौं, घरके लोग मोहिं देहिं निकार ॥ १ ॥ बाहर जावैं डाइन इक लागै, सुनि पावै जिय डारे मार ॥ २ ॥ ऐसी बाठ धरो मोरे साहेब, जहैं मारौं तहैं पछे पार ॥ ३ ॥ धरमदास पर दाय़ा कीजै, साहेब कवीर दुख मेटनहार ॥ ४ ॥
शब्द ६
बंदी-छोर बिनती सुनि लीजै ॥ टेक ॥ कपट कुटिल अपराधी द्रोही, ठहराई मन लीजै । नाम तुम्हारा अधम उधारन, ताकी दिच्छा दीजै ॥ १ ॥ पाप पुत्र नहिं जाँचन कीजै, काटि फंद अब दीजै । माँगूँ अपन सुभाव दयानिधि, सुनि अनुमान न कीजै ॥ २ ॥ बिषे बिनाश रहूँ निसु बासर, यह तन छिन छिन छीजै । साठ जन्मको हौं अपराधी, अबकी छिमा प्रभु कीजै ॥ ३ ॥ सतगुरु नाम मुनींद्र कहाये, साहेब कवीर सुनि लीजै । धरमपास बिनवै कर जोरी, काटि चौरासी दीजै ॥ ४ ॥
१ हितकारी ।