कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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(२२१)
॥ शब्द २ ॥
साहेब साहेबी तन हेरो ॥ टेक ॥
चञ्च पंख बिन जटा पखेहू, मम गति समझ सवेरो । अब जनितजो मोहिं यह खण्डा, तुम सतलोक बसेरो ॥ १ ॥ निस बासर मोहिं संशय व्यापै, काम क्रोध मद घेरो । यासे नाम लेन नहिं पाऊँ, धिग जीवन जग मेरो ॥ २ ॥ प्रभु पद भिन्न भयो मैं जबसे, देह धरे बहुतेरो । त्रिविधि ताप दुख सहे निरंतर, कबहुँ न भयो सुखेरो ॥ ३ ॥ ममहित जानि प्रान-पति सतगुरु, जुगन जुगन तुम टेरो । मैं अचेत प्रीति मोह बस, तुम तजि भयो अनेरो ॥ ४ ॥ मैं हौं जीव तुम्हार दया-निधि, आदि अंतको चेरो । अब मोहिं लेहु छुडाइ कालसे, औगुन मेटो मेरो ॥ ५ ॥ बंदीछोर सुनो करुना-मय, करो हिये बिच डेरो । धर्मदास पर दाया कीजै, चौरासीसे फेरो ॥ ६ ॥
॥ शब्द ३ ॥
साहेब दीनबंधु हितकारी ॥ टेक ॥
कोटिन औगुन बालककरई, मातपिता चित एक न धारी ॥ १ ॥ तुम गुरु मात पिता जीवनके, मैं अति दीन दुखारी ॥ २ ॥ प्रनत-पाल करुना-निधान प्रभु, हमरी ओर निहारी ॥ ३ ॥ जुगन जुगनसे तुम चलि आये, जीवनके हितकारी ॥ ४ ॥ सदा भरोसे रहूँ तुम्हारे, तुम प्रतिपाल हमारी ॥ ५ ॥ मोरे तुमहीं सत्त सुकृत हो, अंतर और न धारी ॥ ६ ॥ जानत हौं जनके तन मनकी, अब कस मोहिं बिसारी ॥ ७ ॥ जो कहि सकै तुम्हारी महिमा, केहि न दिह्यो पद भारी ॥ ८ ॥ धरमदास पर दाया कीन्ही, सेवक अहौं तुम्हारी ॥ ९ ॥