कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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(२१९)
बहुत ज्ञान बहु गम्य, बहुत मूरतको पूजे। दीपक बेर अनेक, अंधको आंखि न सूझे। बहुतक जुग भरमत फिरै, कितहुँ न पावे दाद। सात द्वीप नौ खंडमें, सत्य नाम विनु बाद ॥ ९ ॥
सतगुरुका उपदेस, संत कोउ बिरला जानै। करे तत्त्वका खोज, बहुरि संकट नहि आनै॥ ऐसे सुरति लगाइये, जैसे चन्द्र चकोर। कठिन पड़े सुख दुख सहे, प्रीत निभावै और ॥ १० ॥
अविगति अगम अपार, और सब दोसै बाजी। पढ़ि पढ़ि बेद कितेब, भुले पंडिते औ काजी। अगम गम्य जानै नहीं, वीचहिं परे भुलाय। जैसे ज्वारी जुवा खेलिके, सबरसचले गँवाय॥ ११ ॥
नहिं सागर नहिं सिखर, नहीं तहँ पवन न पानी। नहिं धरती आकास, नहीं कछु और निसानी॥ चन्द्र सूर वा घर नहीं, नहीं दिवस नहिं राति। जहाँ पुरुष आपै बसै, तहँ कुल कर्म न पाँति ॥ १२ ॥
वहाँ नहीं तीरथ ब्रत, नहिं तहँ वेद बिचारा। नहिं देवी नहिं देव, नहीं कछु नेम अचारा॥ जरा मरन वा घर नहीं, नहीं लाभ नहिं हान। प्रेम मगन हंसा रहै, सो धरै पुरुषको ध्यान॥ १३ ॥
जहाँ पुरुष रहै आप, तहाँ हंसनको बासा। तहँ नहिं माया मोह, नहीं तहँ तृष्णा आसा। हर्ष शोक वा घर नहीं, नहीं कर्म व्यवहार। हंसा परम अनंद मय, छूटे भ्रम जंजार ॥ १४ ॥
चारों जुगके हंस, सत्य सतलोक सिधाये। भ्रमत फिरै सब काग, दूत बैठे रखवाये॥ सुनि पंडित जोगी जती, धरे कालको ध्यान। तीन लोकके बाहरे, कोई न पाये जान। ॥ १५ ॥
भ्रमत फिरै जुग चारि, रूप कीन्हा विस्तारा। अजहुँ न समुझे अंध, परे जम कालकी धारा॥ बहुत भाँति परमोधिा, कोइ कोइ लीन्हा मान। आदि अंतके हंस हैं, सो प्रगट भये हैं आन ॥ १६ ॥