कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
अथ नामलीला ॥
साहेब अबिचल नाम, दया करि पाइये ॥८०॥ प्रथम बन्दों गुरु चरण, सीस संतनको नाऊँ । सतगुरु होयँ दयाल, तो नाम चरित्र सुनाऊँ ॥ सत सुकृत हिरदे बसै, कबहुँ ना आवै हारि । अविगतितसे परिचै भई, तो आवागवन निवारि ॥ १ ॥
कहा आनकी सेव, जीवको भर्म न भाजै । अलख सहूपी आप, तहाँ अनहद धुनि गाजै ॥ यह धुनि सुनि अबिचल रहो, इत उत मन नहिं जाय । अमृत केरी बुन्द है, सो अमृत माहिं समय ॥२॥
प्रथम पुरुष पग धरच्यो सत, सतजुगमें आये । परमारथके काज, जीवकी बन्दि छोड़ाये ॥ कागा तें हंसा किया; जाति बरन कुल खोय । जमसे तिलुका तोरिके, गंज न सकै कोय ॥ ३ ॥
सतजुग गयो व्यतीत, सुनो त्रेताकी बानी । धरच्यो सुनिन्द्रको रूप, आप सतसुकृत ज्ञानी ॥ हंसनको परमोधिके, आप रहो नीनार । नाम प्रतीत बसे जो जिवको, सो जन उतरे पार ॥४॥
त्रेता गयो व्यतीत, सुनो द्वापरकी बानी । करुणामय को रूप धरच्यो, सतसुकृत ज्ञानी ॥ चेतनहारा चेतियो, बहुरि न चेता जाय । सतसुकृत चीन्है बिना, काल सबनको खाय ॥ ५ ॥
कलिजुग प्रगट कबीर, कालको देखा जोरा । किये कासी अस्थान, आप भै बन्दीछोरा ॥ सुनि पंडित सब बादहीं, कोई न पहुँचे ज्ञान । निर्गुन लीला धारिके, आप पुरुष निर्बान ॥६॥
कलिजुग कर्म अपार, जीव कोई कहा न माने । सीखे साखी शब्द, उलटिके बाद बखाने ॥ बाद किये पहुँचे नहीं, मन ममताके जोर । लख चौरासी जिया जोनिमें, भर्म नरक अघोर ॥७॥
कठिन कालको रूप, अंत कोई जान न भाई । जब आवै मृतु अंध, जीव कहँ जाय पराई ॥ नाम बिना बाँचै नहीं, केतो करै उपाय । तीरथ जाय सकल भ्रमि आवै, जमको त्रास न जाय ॥८॥